मेवाड़ के गौरव-254

श्री दयालचन्द्र सोनी
मेवाड़ की वीर धरा पर जिस व्यक्ति ने अपने सार्थक प्रयत्नों से गांधी जी के विचारों की शिक्षा का श्रीगणेश किया, जिस व्यक्ति ने झोपड़ियों में रहने वाले गरीब, निरक्षर प्राणियों को सहृदय होकर साक्षर किया तो वह एक ही नाम है दयालचन्द्र सोनी-िशक्षा के लिये समर्पित व्यक्तित्व, एक सरल, सहज, स्वाभिमानी निरहंकारी पुष्ट व्यक्तित्व जो हमेशा खद्दर के कुर्ते और पायजामे में रहा करते थे।
श्री दयाल जी का जन्म एक सामान्य सोनी परिवार में 28 जुलाई सन् 1919 के दिन श्रीमती नाथीबाई के गर्भ से हुआ। आपके पिताजी श्री हीराचन्द्र उदयपुर से 70 कि.मी. दक्षिण में स्थित सलूम्बर के निवासी थे। बाल्यकाल से ही दयाल जी कुशाग्र थे। छठी कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करने पर सलूम्बर के तत्कालीन रावत खुमानसिंह जी ने इन्हें पांच रूपए की छात्रवृत्ति देकर उदयपुर के प्रतिष्ठित विद्यालय विद्याभवन में प्रवेश दिलवाया। इसकी प्रतिभा को देखते हुए डा. मेहता ने इसका मासिक व छात्रावास शुल्क भी माफ कर दिया। शैक्षिक क्षेत्र में अपना विकास करते हुए सोनी जी सन् 1936 में मेट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करने वाले पहले छात्र थे। इनकी प्रतिभा को देखकर डा. मेहता ने इन्हें जूनियर कक्षाओं के लिये हिन्दी विषय का अध्यापक नियुक्त किया। उन्हें 20 रू. मासिक वेतन और आवास की सुविधा दी गई थी। यह शिक्षक का कार्य आपने बड़ी तन्मयता के साथ 5 वर्ष तक किया। सन् 1941 में बुनियादी शिक्षा का दायित्व भी श्री दयाल जी को सौंपा गया जिसके प्रशिक्षण के लिये आपको दिल्ली के जामिया मिलिया भेजा गया। जहां प्रशिक्षण के साथ-साथ उन्होंने उर्दू भाषा में भी महारत हासिल की। इससे पूर्व सन् 1940 में आपका विवाह बेदला के श्री डालचन्द्र जी की पुत्री श्रीमती रायकुंवर से हुआ। उस समय आपकी आयु इक्कीस वर्ष की थी।
दयाल जी ने बुनियादी शिक्षा के मर्म को समझा और उसे छात्रों और अभिभावकों के मन-मस्तिस्क में सही तरीके से पहुंचाया। इस निपुणता के कारण मेवाड़ सरकार ने बुनियादी शिक्षा सरकारी शिक्षा सरकारी स्कूलों में शुरू कर उसका दायित्व भी दयाल जी को सौंप दिया। इसके लिये आपने सरकारी अध्यापकों को मनोयोग पूर्वक बुनियादी शिक्षा में निपुण किया। सन् 1945 में बुनियादी शिक्षा के विशेष अध्ययन के लिये आप सेवाग्राम-वर्धा गये जहां इन्हें गांधी और विनोबा जी के साथ रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। सन् 1954 में `डेनिश फोक हाई स्कूल की भारत में उपयोगिता’ का अध्ययन करने हेतु भारत सरकार द्वारा तीन माह के लिये श्री दयाल जी को 18 सदस्यीय दल में एल्सीमोर-डेनमार्क भेजा गया।
सन् 1956 में ऐसे समर्पित कार्यकर्ता को कथित अनुशासनहीनता के आरोप लगाकर सेवा मुक्त कर दिया गया जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। स्वाभिमानी दयाल जी ने आय के लिये अन्य कही नौकरी न कर लेखन, ट्यूशन व टाइपिंग का काम अपने स्तर पर शुरू किया। इससे भी जब पूर्ति नहीं हुई तो देवाली गांव में उन्होंने आटा चक्की लगाई जिससे निरन्तर आमदनी होती रही। पत्नी भी उनका साथ देने में पीछे नहीं रही। बच्चों को तैयार कर स्कूल भेजने के पश्चात नियमित रूप से वह सिलाई का काम करती थी जिससे कुछ आय हो जाती थी। उनके तीन लड़के ज्ञान, विनोद और गणपत तथा तीन लड़कियां करूणा, मालती और पद्मा सभी घर की स्थिति को समझते हुए व्यवहार करते थे। दयाल जी ने अपनी सभी संतानों को इस संघर्ष की घड़ी में भी पूर्ण शिक्षा दी। यह स्थिति लगभग 13 वर्ष तक रही।
सन् 1969 में डा. मोहनसिंह मेहता वर्षों बाद जब उदयपुर आये और उन्हें वास्तविकता का ज्ञान हुआ तो उन्होंने उसे पुन: विद्याभवन में नियुक्त कर दिया। बाद में दयाल जी ने सेवा मन्दिर संस्था के गठन के समय से ही ग्रामीण क्षेत्र में प्रौढ़ शिक्षा के प्रसार का कार्य किया। इस क्षेत्र में भी उन्होंने मौलिक प्रयोग किये। सन् 1973 से सन् 1977 तक `वर्ल्ड लिटरेसी आफ कनाडा’ टोरेन्टो द्वारा आर्थिक सहायता से साक्षरता प्रसार में लगी हुई भारत की विभिन्न संस्थानों के काम की देखरेख की जिम्मेदारी का निर्वाह आपने किया और लगभग पूरे भारत में यात्राएं की। सन् 1977 से 1988 तक अपनी बस्ती देवाली में ही श्री जयप्रकाश नारायण के आह्वान पर लोकशक्ति और लोकानुशासन के जागरण का कार्य किया। सन् 1988 से 1994 तक डा. मेहता के आग्रह पर आप सेवा मन्दिर संस्था में लोकवाणी और लोक संस्कृति के पोषण के कार्य हेतु पुन: सेवारत रहे।
अपने अनुभवों को समय-समय पर आपने लिख कर पुस्तक का आकार दिया। ग्रामीणों के लिये आपने स्थानीय भाषाओं में प्रवेशिकाएं बनाई। `अनौपचारिक शिक्षा का सही स्वरूप’ नामक पुस्तक पं. मदन मोहन मालवीय पुरस्कार से पुरस्कृत हुई। इसके अतिरिक्त वर्तमान प्रौढ़ शिक्षा की चुनौती मत्स्यबकुलीकरणोपाख्यान, कक्षा छ: और सात कक्षाओं के लिये सामाजिक ज्ञान, बुनियादी शिक्षा क्यों और कैसे?, मूल उद्योग-खेती और खादी, सहजीवी गांव इजराइल का एक प्रयोग, अक्षर दात्री मां वेल्दी फिशर, अनौपचारिक शिक्षा-संकल्पनाएं व दिशाएं, अनौपचारिक शिक्षा की रामकथा, बाबा आमटे, स्वराज की प्रौढ़ शिक्षा-लोकानुशासन आदि लिखी है। मेवाड़ी भाषा में भी आपने साहित्य सृजन किया है इनमें प्रमुख हैं- शिक्षांजलि, नारी महिमा मंजरी, लोकनुशासन री भूमिका, शिक्षा रा तीन डग तथा म्हूं अणभण्यो शिक्षित हूं।
इस प्रकार दयाल जी का पूरा जीवन शिक्षा के लिये समर्पित रहा विशेषकर प्रौढ़ शिक्षा, अनौपचारिक शिक्षा और साक्षरता को। ऐसे समर्पित व्यक्तित्व का 15 मार्च 2008 को देहावसान हो गया। शिक्षा जगत में कार्यरत सभी लोगों को आपका जीवन हमेशा कर्म करने की प्रेरणा देता रहेगा।
(उक्त समस्त जानकारियां उनके पुत्र श्री ज्ञान जी सोनी तथा सुपुत्री श्रीमती करूणा सोनी से प्राप्त हुई है-प्रात:काल परिवार का आभार) (क्रमश:)
दिनांक 5 अप्रेल 2009 से नया धारावाहिक – `मेवाड़ की धरोहर’ प्रारम्भ किया जा रहा है जिसमें प्राकृतिक, ऐतिहासिक व सांस्कृतिक धरोहरों का लेखन होगा। सं. प्रात:काल

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