मेवाड़ के गौरव-239

पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा
मेवाड़ और सिरोही राज्य की सीमा पर एक गांव है रोहिड़ा। अरावली श्रृंखला के पश्चिम में तलहटी में बसा यह गांव उस दिन धन्य हो गया जिस दिन हीराचन्द ओझा के घर पुत्र रत्न ने पदार्पण किया, वह दिन था मंगलवार भाद्रपद सुदि पंचमी सं. 1920 तदनुसार 15 सितम्बर 1863 ई.। अति सामान्य ब्राह्मण परिवार में जन्म होने के कारण प्रारम्भिक शिक्षा उस छोटे से गांव में ही हुई। संस्कृत भाषा का अध्ययन गौरीशंकर ने अपने पिता के पास रहकर किया। बाद में 1877 में मात्र 14 वर्ष की आयु में उच्च शिक्षा के लिये वे मुम्बई गये जहां 1885 में एलफिंस्टन हाईस्कूल से मेट्रिक्यूलेशन की परीक्षा उत्तीर्ण की। रोगग्रस्त हो जाने के कारण वे इन्टरमीडियेट की परीक्षा न दे सके और गांव लौट आये। (राजस्थान के इतिहासकार – सं. 31. हुकमसिंह भाटी पृ. 104 डा.)।
रोहिड़ा आने पर उन्हें राजपूताने के इतिहास के बारे में जानने की इच्छा हुई इस संदर्भ में उन्होंने “टॉड” की पुस्तक का अध्ययन किया। इस ग्रंथ ने उन्हें बहुत प्रेरणा दी। वे सच्चे ब्राह्मण की तरह अपने देश और मातृभूमि के अध्ययन के लिये प्रवृत्त हुए। आर्थिक और सामाजिक प्रलोभनों से आंखें मूंदकर अपनी पत्नी को साथ लेकर सिरोही से गोगुन्दा के रास्ते पैदल चलते हुए मेवाड़ के अनेक छिपे हुए और अप्रसिद्ध ऐतिहासिक एवं पुरातत्व की दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थानों को खोज खोज कर उनकी तीर्थ यात्रा करते हुए 1888 में उदयपुर पहुंचे। (हमारा राजस्थान-पृथ्वीसिंह मेहता पृ. 262)
उदयपुर में आपका सम्पर्क कविराजा श्यामलदास से आया। उनकी पैनी दृष्टि ने ओझा की प्रतिभा को तुरंत पहचान लिया। उनकी विद्वत्ता से वे प्रभावित भी हुए। कविराजा के आग्रह पर ही महाराणा फतहसिंह ने उसे इतिहास विभाग में रख दिया। उस समय तक “वीर विनोद” के लेखन का कार्य लगभग समाप्त हो चुका था। अतः ओझाजी को विक्टोरिया हाल के सार्वजनिक पुस्तकालय व संग्रहालय का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। उन्हें हिन्दी में लेखन कार्य करने की प्रेरणा “िवनायक शात्री बेताल” से मिली। इसी काल में ओझा जी ने भारतीय लिपियों का गहनता से अध्ययन किया। यूरोपीय विद्वान वुर्हलर की लिपि संबंधित पुस्तक का भी अध्ययन किया। ओझा जी से पूर्व भारतीय लिपि के बारे में यह धारणा थी कि भारतीय लिपि का विकास मिश्रा, हिब्रू के मिश्रण से हुआ है और वह भी ईसा पूर्व पांचवी शताब्दी में। (हमारा राजस्थान-पृ. 262-63)
सन् 1894 ई. में “भारतीय प्राचीन लिपि माला” नामक पुस्तक लिखकर  भाषा और लिपि के क्षेत्र में क्रान्ति ला दी। उन्होंने बुइलर को पत्र लिखकर अपने तर्कों और प्रमाणों के आधार पर उनके द्वारा स्थापित विचार को निर्मूल सिद्ध किया। तब से दुनिया ने उनके सिद्धान्त को प्रतिष्ठा प्रदान की। आज यह पुस्तक सं.रा. संघ के उन पुस्तकों में है जो विश्व की निधि घोषित किये गये हैं। (वही पृ. 263)।इस पुस्तक के माध्यम से ओझा जी ने संसार के समक्ष यह विचार रखा कि ब्राह्मी लिपि समझने के पश्चात् दूसरी लिपियों को आसानी से समझा जा सकता है। क्योंकि दूसरी लिपियों में थोड़ा बहुत अन्तर पड़ता जाता है। ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपि की उत्पत्ति पर भी आपने इस पुस्तक में प्रकाश डाला है। बाद में शिलालेखों, ताम्रपत्रों, सिक्कों व दानपत्रों पर उत्कीर्ण ब्राह्मी, गुप्त, कुटिल, नागरी, शारदा, बंगला, पश्चिमी, मध्यप्रदेशी, तेलगू, कन्नड़ी, कलिंग, तमिल, खरोष्ठी आदि लिपियों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दी है। इसके लिये ओझाजी ने विविध 45 लिपिपत्र तैयार कर अलग अलग भाषाओं में अक्षरों का बोध कराया। उसके पश्चात भारतवर्ष की लिपियों और अंकों की उत्पत्ति के बारे में उल्लेखनीय जानकारी दी। ( राजस्थान के इतिहासकार-पृ. 107)
सन् 1894 के बाद ओझाजी राजस्थान के इतिहास के मनन, पुनः शोधन व संकलन में लग गये। उनके अध्ययन की गंभीरता को पहचानते हुए विद्या विशारद जर्मन विद्वान कील हार्न ने सच ही लिखा था कि  `ओझा से अधिक अपने देश के इतिहास को कौन जानता है।’ सन 1902 में लार्ड कर्जन दिल्ली दरबार में उपस्थित रहने के लिये महाराणा फतहसिंह को स्वयं निमंत्रण देने आये। रेजीडेण्ट के माध्यम से भारत सरकार को यह सूचना मिली थी कि महाराणा 1903 के दिल्ली दरबार में नहीं आयेंगे। इसलिये आग्रह करने स्वयं वायसराय उदयपुर आये थे। वहीं उनका परिचय ओझा जी से आया। उनकी विद्वत्ता और लगन से वे बड़े प्रभावित हुए। भारत के बारे में विशेष जानकारी के लिये उत्तर भारत का केन्द्र वे अजमेर को बनाना चाहते थे। ओझाजी से मिल कर उन्हें लगा कि पुरातात्विक कार्य के लिये यही व्यक्ति उपयुक्त हैं अतः उन्होंने ओझा जी के सम्मुख भारत के पुरातत्व के उच्च पद का प्रस्ताव रखा। पर उन्होंने इस पद को अस्वीकार कर दिया क्योंकि वे मेवाड़ में रहकर ही उसकी सेवा करना चाहते थे।
कुछ वर्ष पश्चात सन 1908 में लार्ड मिण्टो ने लार्ड कर्जन की योजना अनुसार `राजपूताना पुरातत्व संग्रहालय’ की स्थापना अजमेर में की। इसके पालक के रूप में ओझाजी को बुलावा आया। वे मेवाड़ नहीं छोड़ते पर विद्वत सम्मान के प्रति महाराणा फतहसिंह की उदासीनता के कारण सन 1908 में वे उदयपुर छोड़कर अजमेर आ गये। (हमारा राजस्थान- पृ. 472-73) (क्रमशः)

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