मेवाड़ के गौरव-238

कविराजा श्यामलदास
महाराणा सज्जन सिंह के देहावसान के बाद श्यामलदास का अधिकांश समय `वीर विनोद’ के लेखन में ही गया । आवश्यकता पड़ने पर वे राणा का राजकार्य में सहयोग भी करते थे अतः महाराणा फतहसिंह जी भी उनके व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित थे, उनका आदर भी करते थे, उनकी बात मानते भी थे । उनकी स्पष्टवादिता पर तो वे कायल थे ।
वि.स. 1941 में जब महाराणा गद्दी पर बैठे उस से प्रायः एक वर्ष पूर्व उनके पुत्र भोपालसिंह का जन्म हो चुका था अतः वह महाराजकुमार की दृष्टि से ही गद्दी पर आया था । छोटा बालक और फिर महाराणा का पुत्र होने के कारण हर कोई उसे गोद में उठाता था। बालक को वैसे भी गोद में उठाने की इच्छा स्वाभाविक होती है पर यहां तो खुशामद करने के लिये हर कोई उसे गोद में उठाता था । स्थित ऐसी हो गई कि जनानी ड्योढी के अन्दर और बाहर बालक भोपालसिंह के कदमों ने धरती को नहीं छुआ । यह प्यार का अतिरेक बालक के शारीरिक विकास में बाधक पड़ सकता था । यह बात कविराजा को अच्छी नहीं लगी । उन्होंने यह बात महाराणा से भी कही- और निवेदन किया राजकार्य की तरह महाराज कुमार के लालन पालन व उसके विकास पर भी आप ध्यान दें । महाराणा ने उनकी बात को स्वीकारते हुए यह कार्य करने की बात कही । पर खुशामदी लोग बहाना बनाकर भी उसे गोद में ले लिया करते थे । कविराजा ने इस बात को कभी पसन्द नहीं किया ।
(क्रांतिकार बारहठ केसरीसिंह- पृ. 277)
महाराणा फतहसिंह शिकार के बड़े शौकीन थे । शेर की खबर सुनकर उनका नित्यक्रम भी छूट जाता था । एक दिन उन्हें सूचना मिली कि उदयपुर के पास की पहाड़ियों में शेर घुस आया है । यह समाचार उन्हें रात के बारह बजे मिला । रात को तीन बजे हरकारा पहुंचा कि ठीक चार बजे अमुक स्थान पर शिकारी कपड़े पहनकर पहुंच जाओ । धीरे-धीरे पुत्रोत्सव की सी खुशी से बड़े-बड़े महकमों के अफसर, उमराव, सामन्त व अन्य वहां जमा हो गये । शिकारी वेश में उमरावों-सरदारों का दरीखाना लग गया । आठ सौ नौकरिया (िशकार में हांका देने वाले भील) हाथ मे बल्लम लिये शिकार के स्थान पर पहुंच गये और सारा मगरा घेर लिया । कविराजा नित्य के अनुसार समय पर वहां आ पहुंचे । उनके बैठते ही महाराणा ने उत्साह भरे स्वर में बधाई के तौर पर कहा “कविराजा जी । आज शेर उदयपुर के पास ही आ गया।” तब कविराजा ने गंभीर स्वर में कहा- हजूर ! यह शेर आपको खुश करने के लिये इन जंगलों में नहीं आया है यह तो भटकता हुआ यहां आया है । मगर इन खुशामद खोरों को मालूम नहीं मालिक को एक दुर्व्यसन से मना करने के बजाय उनमें धकेलने से वे राज्य का कितना अहित कर रहे हैं । इधर इन्साफ के लिये मिसलों का ढेर लगा हुआ सड़ रहा है, गरीब प्रजा धूप, भूख व प्यास का कष्ट सहन कर न्याय के लिये कोसों से आकर निराश लौट रहे हैं और यहां शिकार का आनंद लिया जा रहा है । इस निरीह जानवर से तो ये बैठे हुक्काम ज्यादा खुंखार है जो मालिक की आंखों में धूल झोंक कर दिन दहाड़े गरीब प्रजा का खून चूस रहे है ।” (वही- पृ. 279) ये बातें सुन कर चारों ओर सन्नाटा छा गया । पांच मिनट बाद महाराणा ने आज्ञा दी- “ठीक है शिकार नहीं जायेंगे । सबको वापस बुला लो ।” महाराणा फतहसिंह का उनके प्रति कितना आदर था यह इस घटना से स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है ।
“वीर विनोद” मुद्रण का काम समाप्त हो चुका था । कविराजा की आंखों की रोशनी कम हो गई, पक्षाघात भी हो गया । रूग्णावस्था के समय महाराणा फतहसिंह उनका कुशलक्षेम पूछने उनके घर पधारे । जब उन्हें बताया गया कि श्री जी हजूर पधारे हैं तो दोनों हाथों से उनका अभिवादन करते हुए कहा कि मैंने पूर्व के दो महाराणाओं की सेवा की पर उतनी सेवा मैं आपकी नहीं कर सका इसका मुझे खेद है, आपने यहां पधार कर मेरा मान बढ़ाया है मैं इससे अभिभूत हूं, कृतार्थ हूं । “इससे मुझे विश्वास हो गया है कि मेरे मालिक मेरे परिवार का भरण पोषण अवश्य करेंगे।”
अपने आत्मीयजनों श्रीकृष्ण सिंह बारहठ, ठाकुर चिमन सिंह व कोठारी बलवन्त सिंह के समक्ष अपनी अन्तिम इच्छा प्रकट करते हुए कहा- “मुझे जब कोई गंभीर रोग लग जाय तो मुझे सन्यास लिवा देना और मेरे बाग के  बीच के चक्कर की जगह मेरा भूमिदाह करना।” अतः उनकी इच्छानुसार देहान्त के दो दिन पूर्व उनको आतुर सन्यास दे दिया गया । उसके पश्चात इच्छा होते हुए भी महाराणा उनके दर्शन करने नहीं गये । देहावसान की बात किसी को पसंद नहीं थी । पर यह शाश्वत सत्य है कि “जातस्य ध्रुवों मृत्यु” जो जन्मा है वह अवश्य शरीर छोड़ेगा। रोग ने उनके शरीर को शिथिल कर दिया था । अन्त में संवत 1951 जेष्ठ कृष्णा अमावस्या तदनुसार सन 1894 के 3 जून को उनका देहावसान हो गया । उनकी इच्छानुसार श्यामल बाग में हजारों नर-नारियों के समक्ष उनका भूमि दाह किया गया ।  कविराजा बड़े सत्यवक्ता, न्यायकारी, धर्मशील, निर्लोभी, देशहितैषी, ईमानदार और सच्चे स्वामिभक्त थे । मेवाड़ में ये ही एक पुष्प थे जो इतना राज्याधिकार पाकर न कभी अभिमान में झूमे, न किसी का बुरा किया और न ही धन जोड़ा । आज के राजनेता ऐसे सत्पुरूष से प्रेरणा लें तो समस्त समस्याओं का समाधान हो जाय । (वही पृष्ठ 295) (क्रमशः)

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