मेवाड़ के गौरव-237

कविराजा श्यामलदास
कविराजा की योग्यता और कार्यकुशलता से प्रसन्न होकर अंग्रेज सरकार ने संवत 1935 में उनको `केसरे हिन्द’ का तमगा देकर सम्मानित किया। यह तमगा तत्कालीन पोलिटिकल एजेण्ट कर्नल इम्पी ने रेजीडेंसी दरबार में प्रदान किया। उन्होंने महाराणा के सम्मुख यह प्रस्ताव भी रखा कि मेवाड़ के इतिहास के लेखन का इन्हें जो कार्य भार दे रखा है उस कार्य प्रगति पर नहीं है क्योंकि कविराजा कोराज्य प्रबंध के कार्य से समय नहीं मिलता है। वास्तव में कविराजा के राज्य प्रबंध के कारण मेवाड़ सुव्यवस्थित हो चुका था और अंग्रेज सरकार इस अवस्था में चंचु प्रवेश भी नहीं कर पायी थी। इस `वीर विनोद’ के लेखन प्रारम्भ करने पर उनका यह कार्य हल हो जायगा। पर श्यामलदास यह कार्य महाराणा के जीवनकाल में प्रारम्भ न कर सके। उनके देहावसान के पश्चात वे `वीर विनोद’ के लेखन में जुट गये। (क्रान्तिकारी बारहठ केसरीसिंह- पृ.252)
इस कार्य को श्यामलदास ने बहुत परिश्रम से किया। इतिहास लेखन केसारे स्रोत-प्राचीन प्रशस्त्तियां, सिक्के, ताम्रपत्र, पट्टे, परवाने, भाट एवं जागाओं की बहियां, प्रकाशित अंग्रेजी, फारसी, अरबी, हिन्दी संस्कृत ग्रंथ और अप्रकाशित हस्तलिखित ग्रन्थों का पता लगा कर उन्हें खरीदा गया, उनकी प्रतिलिपियां कराई गई, किवदन्तियां संग्रहित की गई, पुरातत्व के साधन जुटाये गये, उसके आधार पर उन्होंने `वीर विनोद’ का लेखन प्रारम्भ किया। उनके साथ विभिन्न भाषाओं के विद्वान लगाये गये इनमें गोविन्द गंगाधर देशपाण्डे ब्रिटिश सरकार की ओर से शिलालेख-ताम्रपत्र आदि पढ़ने में सहायतार्थ लगाये गये थे तथा अंग्रेजी के लिये रामप्रसाद बी.ए.रखे गये थे। सं. 1944 में पं. गौरीशंकर हीराचन्दओझा रामप्रसाद के स्थान पर नियत किये गये। ओझा जी के आने तक `वीर विनोद’ का लेखन लगभग पूरा हो चुका था। ओझा जी की योग्यता को कविराजा ने पहिचान लिया था अत: इन्हें सार्वजनिक पुस्तकालय में लगा दिया। (वही पृ.253)
`वीर विनोद’ के मुद्रण का कार्य सज्जन यंत्रालय प्रेस में हो रहा था। महाराणा फतह सिंह ने इसकी ग्यारह सौ प्रतियां छपवाई थी इसमें से एक सौ प्रतियां कविराजा के लिये निजी उपयोग के लिये थी। कविराजा ने मुद्रण के समय से ही तीन प्रतियां रामप्रसाद बीए., गौरीशंकर ओझा व कृष्ण सिंह बारहठ को देना प्रारंभ कर दिया था। कविराजा का यह संकल्प था कि  `वीर विनोद’ छप कर तैयार होने के पश्चात वे राजकार्य से सन्यास ले लेंगे, पर ईश्वर की इच्छा कुछ दूसरी थी। वि.सं. 1949 आषाढ़ शुक्ला 11 के दिन उन्हें पक्षाघात हुआ और लगभग डेढ़-दो वर्ष तक यही दशा रही। इस समय का लाभ उठा कर जो लोग उनके कार्य से ईर्ष्या करते थे जिन्हें उनके प्रतिष्ठा से जलन थी, कविराजा विरोधियों ने प्रपंच रचा और महाराणा फतह सिंह के मस्तिष्क में यह बात बिठाने में सफल हो गये कि इस ग्रंथ के कारण उमराव आदि अपने अधिकार मांगेगे, अंग्रेजों में भी कविराजा की प्रतिष्ठा बहुत अधिक है अत: वे भी इसकी बात प्रमाणिक मान कर निर्णय लेंगे। अत: इसे प्रकाश में न लाया जाय। महाराणा ने भी वीर विनोद की सारी प्रतियां यहां तक कि उनका प्रुफ भी महलों में मंगवा लिया और एक कमरे में डालकर उस कमरे को ताला लगा दिया। अगर तीन प्रतियां बाहर न जाती तो शायद `वीर विनोद’ इतिहास के गर्त में चला जाता। (वही पृ. 254)
वीर विनोद के अतिरिक्त कविराजा ने ऐतिहासिक गहरी छानबीन करके दो पुस्तिकाएं और लिखी थी- `पृथ्वीराज रासो की नवीनता’ और अकबर के जन्मदिन में संदेह। ये दोनों पुस्तिकाएं एशियाटिक सोसायटी बंगाल व मुम्बई आदि प्रसिद्ध संस्थाओं से समाहत हुई। `पृथ्वीराज रासो की नवीनता’ पुस्तक पर भी बवाल मचा था। इस पुस्तक को लेकर पं. मोहनलाल विष्णुलाल पण्ड्या ने बेदले  राव साहब को भड़का दिया कि कविराजा ने रासो को प्रमाणों से कल्पित ठहरा दिया है। उसने उनसे पैसे भी एंठे और कविराजा के ग्रंथ को गलत साबित करने का प्रयत्न किया जिसे बंगाल के रायल एशियाटिक सोसायटी ने लिख भेजा कि ये तर्क तथ्य हीन है और कविराजा की पुस्तक प्रमाण पुष्ट है। आखिर भेद खुल जाने पर पण्ड्या जी ने कविराजा से क्षमा मांगी। कविराजा ने कहा, `कोई मुझे गालियां देकर भी अपनी पेट भराई करे तो मुझे बुरा नहीं लगता। मेरी हानि तो नहीं हुई और न ही तुम कर सकते हो क्योंकि मेरा यह लेख न किसी स्वार्थ से था न द्वेष से। तुमने बेदले रावजी से पैसे ठगे हैं अत: उन्हीं से माफी मांगो। तुम्हारे चेष्टा करने पर भी मेरी और बेदले रावजी की मैत्री और स्नेह में कोई अन्तर नहीं आया।’ वास्तव में वे केवल विद्वान और लेखक ही नहीं उदार मना भी थे। (वही-पृ.255) (क्रमश:)

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