मेवाड़ के गौरव-236

कविराज श्यामलदास
वि.सं. 1939 श्रावण मास में भारत की जागृति के जन्मदाता स्वामी दयानन्द सरस्वती उदयपुर पधारे। कविराजा स्वामी जी के नाम से पहले ही परिचित थे और उनकी अनुपम विद्वता और प्रतिभा पर मुग्ध थे। अतः उनके आगमन पर सस्वागत सादर सज्जन निवास बाग (गुलाब बाग) के नवलखा महल में ठहराया गया। कविराजा ने महाराणा सज्जन सिंह से उनकी भेंट भी कराई। स्वामी जी सात मास तक उदयपुर में विराजे उस अन्तराल में महाराणा सज्जन सिंह तथा कृष्णसिंह बारहठ स्वामी जी से मनु स्मृति पढ़ते थे। (क्रान्तिकारी बारहठ केसरी सिंह-पृ. 258)
इन्ही दिनों महाराणा के सभापतित्व में `परोपकारिणी सभा’ की स्थापना की गई। यद्यपि कविराजा राजकार्य में व्यस्त रहते थे तो भी समय-समय पर स्वामी जी के दर्शन करने अवश्य जाते थे। कविराजा की सत्यप्रियता और निःशंकता पर स्वामी मुग्ध थे। एक दिन स्वामी जी ने उनसे कहा `कविराज! हम तुम्हारी चारण पाठशाला के छात्रों को भोजन करायेंगे।’ योजनानुसार चारण पाठशाला के बच्चों को कविराजा नवलखा महल में लाये और सभी छात्रों ने स्वामी जी के समक्ष भोजन किया। उन छात्रों में केसरीसिंह बारहठ भी थे। सभी बालक स्वामी जी की भव्य मूर्ति के दर्शन कर कृत कृत्य हो गये। (वही पृ.259)
महाराणा सज्जन सिंह कविराजा की ईमानदारी और सादगी से प्रभावित थे। आपसी सम्बन्ध भी मधुर थे। एक दिन महाराणा ने कविराजा को कहा- `सांवल जी! जो तुम्हें वेतन दिया जा रहा है वह कम है। तुम जितनी आवश्यकता समझो वेतन बता दो, मैं  उतना ही मासिक वेतन तुम्हारे लिये स्वीकार कर लूंगा।’ पहले तो कविराजा को इस बात पर आश्चर्य आया कि राणा जी इस प्रकार क्यों कह रहे है। पर इस बात को टालने के लिये कविराजा ने कहा `हजूर! घर पर हिसाब लगा कर कल बताऊंगा।’ दूसरे दिन कविराजा ने आकर निवेदन किया- `मुझे पौने चार सौ रूपये काफी होते है।’ तब महाराणा ने उन्हें कहा- सांवल जी! आपका बड़ा परिवार है, नाम भी बड़ा है , ऊ परी खर्चा भी अधिक होगा तथा घर के लोगों की आपसे अपेक्षाएं भी होगी। ऐसे में यह वेतन तो कम पड़ेगा। तब श्यामलदासजी ने कहा- `मेरे लिये यही पर्याप्त है। आवश्यकता पड़ी तो हजूर से अर्ज कर लूंगा। मेरा घर तो साधारण गृहस्थी का बना रहे इसी में शान्ति है।’ तब से उनको केवल पौने चार सौ रूपये मासिक मिलते लगे जो महाराणा फतह सिंह ने कविराजा के स्वर्गवास के बाद उनके पुत्र यशकरण के नाम पर कई वर्षों तक दिये। (वही- 262)
कविराजा की सत्यता, स्पष्टता और राजभक्ति से महाराणा सज्जन सिंह इतने अधिक प्रभावित थे कि वे राजपूत जाति और राजपूत राज्यों के लिये समस्त चारण जाति को ही ईश्वरीय देन समझने लगे। कविराजा के ऐतिहासिक अनुशीलन तो उनके हृदय पर यह अमिट छाप लगा दी कि यदि राजपूत जाति के पतन को रोकना है तो पहले चारणों को सुशिक्षित करना चाहिये। राजपूत जाति के हक में चारण जाति से बढ़कर निर्भीक सलाहकार, पूर्ण विश्वस्त और शुभचिंतक नहीं मिल सकता। कविराजा के इस प्रयत्न को वे देख चुके थे पहले वि.सं. 1936 और दूसरी बार वि.सं. 1937 में उन्होंने जातीय अधिवेशन भी किये। जिसमें चारणों के शिक्षण के विस्तार पर चर्चा हुई थी। कविराजा की प्रार्थना पर महाराणा सज्जन सिंह जी ने क्षत्रियों की वार्षिक आमदनी का दशमांस त्याग में देना नियत करके यह नियम बांध दिया कि `सौ रूपयों की जीविका पर दस रूपये हुए उनमें से पांच चारणों के लिये हो और वे जिला हाकिमों के मारफत मंगवा कर उदयपुर में चारण पाठशाला के नाम से मदरसा बनवा कर उनमें चारणों के लड़कों की पढ़ाई में खर्च किये जावें।’ तदनुसार वि.सं. 1937 में पाठशाला और छात्रालय कायम हुआ उसमें छः अध्यापक, जिसमें रामनारायण दुग्गड़ भी थे, नियत किये गये। भवन जब तक न बना तब तक यह पाठशाला  रावछा के बारहठ पहाड़ जी की हवेली में चला।
कविराजा को किसी से कुछ मांगने की चिड़ थी परन्तु जाति सेवा के लिये उन्होंने चन्दा मांगना स्वीकार किया। उनके प्रभाव से और समझाने की विशेषता से सब बड़े उमरावों, सरदारों व सजातियों से उत्साह और उदारता से अच्छा चन्दा इकट्ठा किया। थोड़े ही समय में लगभग चालीस हजार रूपये इकट्ठे हो गये और पाठशाला का निर्माण शुरू हो गया। वि.सं. 1941 में जोधपुर व किशनगढ़ के महाराज उदयपुर आये तो महाराणा दोनों अतिथियों को चारण पाठशाला का प्रारंभिक निर्माण दिखाने ले गये, उन्हें यह निवेदन भी किया कि निर्माण पूर्ण होने पर इसका उद्घाटन आपके हाथों करेंगे। पर महारणा सज्जन सिंह के असामयिक निधन के कारण यह कार्यक्रम न हो सका। (वही पृ.-263) (क्रमशः)

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