मेवाड़ की धरोहर-2

मेवाड़ का प्राकृतिक स्वरूप
मेवाड़ की धरती सदा सर्वदा निवास करने के लिये लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती रही है। निवास करने के लिये आवश्यकता होती है जल की, रहने के लिये उचित धरातल की, पशुओं को चराने के लिये घास की, आहार के लिये वनस्पति और कृषि के लिये उपजाऊ  भूमि की। मेवाड़ की प्रकृति ने यह सब कुछ दिया है यही कारण है कि बनास व उसकी सहायक नदियों की घाटियों में प्रागैतिहासिक काल से मानव ने रहना प्रारम्भ किया जिनके अवशेष उनके सामाजिक एवं आर्थिक जीवन पर प्रकाश डालते है। तब से लेकर आज तक इस धरातल ने यहां के सामाजिक, आर्थिक, संस्कृति एवं कला को न केवल प्रभावित किया है अपितु उसे पुष्पित एवं पल्लवित भी किया है। अतः मेवाड़ का समग्र रूप से अध्ययन करने के लिये यह परम आवश्यक है कि हम पहले मेवाड़ के प्राकृतिक धरोहर का अध्ययन करें इसके अभाव में मेवाड़ का अध्ययन भी आधा अधूरा रह जायगा।
अब प्रश्न उठता है कि मेवाड़ का विस्तार और संकुचन होता रहा है जन-जन में राजनैतिक दृष्टि से मेवाड़ का प्रभाव बढ़ा तो इस प्रदेश का राजनैतिक विस्तार बढ़ता गया और राजशक्ति कमजोर हो जाने पर यह केवल पश्चिमी पहाड़ों तक सिमट गया, तो हम किस मेवाड़ का अध्ययन करे। एक बात और मेवाड़ का नाम हमेशा एक नहीं रहा। मेवाड़ मेदपाट, प्रागवाट, शिविजनपद आदि नामों से विभिन्न कालों में इसकी पहचान थी उनकी सीमाएं कहां-कहां तक थी इसका अभी अध्ययन बाकी है। ऐसा भी समय था जब मेवाड़ का विस्तार पूर्व में चन्देरी, दक्षिण में देवाकाण्ठा व माही काण्ठा, पश्चिम में पालनपुर, पश्चिमोत्तर में मण्डोवर और रूण, उत्तर में बयाना और पूर्वोत्तर में रणथम्भोर और ग्वालियर तक था। (वीर विनोद-भाग-1-पृ.100)
यहां हम आज के मेवाड़ की प्राकृतिक धरोहर और उसके स्वरूप का अध्ययन करेंगे। प्रशासनिक दृष्टि से मेवाड़ में उदयपुर जिला, चित्तौड़गढ़ जिला, राजसमंद जिला और भीलवाड़ा जिला सम्मिलित है जिसका विस्तार राजस्थान के दक्षिणी भाग में है जो 2श 49′ अक्षांस से 25श 20′ उत्तरी अक्षांस और 73श।’ पूर्वी देशान्तर से 75श 49′ पूर्वी देशान्तर के मध्य स्थित है।
मेवाड़ की पर्वत मालाएं
यहां की प्रमुख पर्वत माला `अरावली’ जिसे स्थानीय बोली में `आड़ावल’ कहते है, स्थित है जो दक्षिण पश्चिम से उत्तर पूर्व तक फैली हुई है। मेवाड़ से आगे उत्तर की ओर इसका विस्तार दिल्ली तक है। ज्यों-ज्यों हम उत्तर की ओर जायेंगे इसकी  ऊं चाई व चौड़ाई घटती जाती है साथ ही इसकी क्रमिकता भी विश्रंखलित होती जाती है। सम्पूर्ण अरावली श्रृंखला को चार भागों में विभक्त किया जा सकता है। (द्ब) उत्तर पूर्वी पर्वतीय प्रदेश जो जयपुर और मध्य अरावली के मध्य फैला हुआ है। (द्बद्ब) मध्य अरावली प्रदेश जो जयपुर अजमेर-टोंक के मध्य विस्तृत है। इसके उत्तरी भाग को `शेखावटी की निम्न पहाड़ियां’ और दक्षिणी भाग को `मेरवाड़ा की पहाड़ियां’ इन नामों से जानते हैं। (द्बद्बद्ब) आबू पर्वत खण्ड जो सिरोही जिले में मुख्य श्रृंखला से कट कर अलग हो गया है। (द्ब1) मेवाड़ की पहाड़ियां जो अरावली श्रृंखला का महत्वपूर्ण और विस्तृत भाग है।
मेवाड़ की पहाड़ियों का प्रदेश पूर्वी सिरोही-उदयपुर के पूर्व में एक संकरी पट्टी को छोड़कर लगभग सम्पूर्ण उदयपुर और डूंगरपुर जिलों में फैला हुआ है। भारत की महान जल विभाजक रेखा मेवाड़ के मध्य से होकर गुजरती हैं जो पूर्व में नीमच से बड़ीसादड़ी होती हुई उदयपुर को और यहां से गोगुन्दा के पास की   ऊं ची जमीन व बनास के निकासों और पश्चिम के कुम्भलगढ़ के बड़े पहाड़ी किले के निकट होकर अरावली अजमेर तक चली गई है। (वीर विनोद-भाग -1 पृ. 101)
उत्तर की तुलना में अरावली पर्वत श्रृंखला का फैलाव दक्षिण में अपेक्षाकृत अधिक है। उत्तरी-पश्चिमी भाग में पर्वतों की औसत ऊं चाई 2382′ है और इसकी चौड़ाई कुछ मील ही है। जबकि इसके दक्षिण में भोमट और छप्पन भू-भाग में इसकी चौड़ाई 60 मील के लगभग हो गई है। इसी चौड़े विस्तृत पहाड़ी प्रदेश में सुरक्षित रहकर महाराणा प्रताप ने कई वर्षों तक मुगल शासक के विरूद्ध लोहा लिया था। इसी प्रकार उत्तर की पहाड़ियां प्रताप के प्रारम्भिक में संघर्ष के समय संरक्षण स्थल रही। (पानरव का सोलंकी राजवंश)
उत्तर से दक्षिण की ओर चलें तो कुम्भलगढ़, अमजमाल, माछनला, खमण, जरगा, राहंग आदि प्रमुख पर्वत शिखर हैं। इनमें कुम्भलगढ़ 3568 फीट और 30 मील का क्षेत्र घेरा हुआ है और जरगा 4315 ऊं चा और 20 मील चौड़ा है। जरगा और माछवड़ा पर्वत के मध्य 20 मील लम्बाई उपजाऊ  भूमि कुंटालिया नाला कहलाती है जिसमें कई गांव बसे हुए है। जरगा के पहाड़ के बारे में ऐसी मान्यता है राजा हरिशचन्द्र द्वारा स्थापित गुसांई की चरण पादुका और त्रिशूल विद्यमान है। सायरा की ओर जाने पर इसका नाम बड़ा जरगा और कुम्भलगढ़ उदयपुर मार्ग से इस पर्वत की ओर का नाम छोटा जरगा पुकारा जाता है। सायरा के पश्चिम में आवड़-सावड़ के पर्वत स्थित है। (क्रमशः)

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