मेवाड़ की धरोहर-1

वैभवशाली मेवाड़
जिस मेवाड़ में हम निवास कर रहे हैं, उसे हर प्रकार से जानने की इच्छा हर किसी को होगी। हमें ही नहीं, राजस्थान, भारत के विभिन्न राज्यों, यहां तक कि विश्व के पर्यटक इसे जानने की इच्छा करते है और इसके दर्शन करने दूर-दूर से यहां आते है। वे यहां आकर वर्तमान के वैभव का अध्ययन नहीं करते वरन् वे अतीत के गौरव में झाकने का प्रयास करते हैं। उन्हें मेवाड़ का इतिहास अपनी ओर आकर्षित करता है, यहां का कलात्मक वैभव उन्हें आश्चर्यचकित करता है, यहां की कला, यहां का स्थापत्य, यहां के दुर्ग, मंदिर, महल, हवेलिया यहां तक कि यहां का ग्राम्य जीवन उन्हें अनायास ही मेवाड़ धरा पर खींच लाता है। यह प्राकृतिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, लोक संस्कृति की थाती ही मेवाड़ के गौरव को बढ़ा रही है जिसके कारण ही मेवाड़ की पहचान है। प्राचीन काल से रहते आये जन मानस ने न केवल इस थाती को संरक्षित किया वरन् अपनी कला व कौशल से इसे सजाया, संवारा और पल्लवित किया तथा संरक्षण और संवर्धन प्राप्त इस वैभव को आगे की पीढ़ी को हस्तान्तरित किया। इस प्रकार युग-युग से चले आये इस क्रम से यह मेवाड़ हर दृष्टि से सम्पन्न हो गया है। इस मेवाड़ के गौरवशाली अतीत और उसकी धरोहर को हम जानने का प्रयास करेंगे।
प्राकृतिक दृष्टि से भी मेवाड़ सुरम्य है। प्रकृति ने इस धरा को सम्पन्न बनाया है, प्राचीन आयनिर्त में जन उत्तरी भारत का अधिकांश भाग समुद्र में डूबा हुआ था तब यह भूभाग  गौरव से सिर उंचा किये खड़ा था। यहां के अरावली की पर्वत श्रेणियों को सघन वनों ने आकर्षक और सुन्दर बना दिया है। यहां के वन जहां वनस्पति और वनौषध से परिपूर्ण है वहीं यहां विभिन्न प्रकार के वन्यजीवों से सम्पन्न है। फुलवाड़ी की नाल , कुम्भलगढ़, सज्जनगढ़, बाघदड़ा, जयसमंद, सीतामाता, बस्सी, भैसरोड़गढ़ आदि स्थानों के सुरक्षित वन इसी प्रकार के स्थान है। वनों के अतिरिक्त यहां के खनिज, जलत्रोत, झीलें, तालाब प्रपात, नाल (दर्रे) गुफाएं आदि से सम्पन्न नैसर्गिक सौंदर्य बरबस ही पर्यटकों को यहां खींच लाती है।
प्रकृति की तरह ही मेवाड़ की मानव निर्मित धरोहर भी अमूल्य हैं, वैभव सम्पन्न है।सम्पूर्ण प्रदेश में फैले प्राचीन स्मारक, खण्डहर और अवशेष, इस बात के साक्षी है कि यहां के निवासियों ने सभ्यता के उषाकाल से ही अपने कठिन परिश्रम और प्रयत्न से इस प्रदेश के वैभव को विकसित किया, कला से संवारा विभिन्न रंगों से चित्रित किया और भावाभिव्यक्ति से इसे सम्पन्न किया। इस कारण मेवाड़ का वैभव विविधताओं से विभूषित हो गया। इसमें विविध प्रकार के ऐतिहासिक स्मारक, दुर्ग, हवेलियां, प्रासाद, प्राचीर, स्थापत्य, कला कृतियां मंदिर, आस्था के केन्द्र, तोरण, स्तम्भ, कलात्मक बांध, बावड़िया, पुरातात्विक दृष्टि से महत्व पूर्ण स्थल मेवाड़ की मानव निर्मित मूल्यवान धरोहर है जो मेवाड़ की सांस्कृतिक पहचान है।
इन प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहरों के साथ-साथ यहां की लोक कथाओं, लोक संस्कृति, कला, हस्तशिल्प तथा लोक कलाओं का भी विकास हुआ। जिसने यहां के जनजीवन को रंगीन और मनोरंजक बनाया है। यहीं नहीं अलग -अलग मौसम में अलग-अलग रसमय तीज त्यौहारों को भी यहां के लोगों ने विकसित किया जिससे इन त्यौहारों ने यहां के जन जीवन में कष्टो, कठिनाईयों, निराश, हताशा और विसंगतियों में भी आशा, उत्साह और उम्मीदों को जगाये रखा और लोगों में सतत प्रयत्न की प्रेरणा दी।
इस परिपेक्ष्य में यदि हम यहां के इतिहास का अवलोकन करें तो हम पायेंगे कि यहां के शासक, वीर, वीरांगनाएं आदि न कभी रूके, न कभी झुके और न ही थके, और ऐसा इतिहास रचा जिसने विश्वभर के लोगों को विस्मृत कर दिया। यहां के इतिहास की घटनाएं पढ़-सुन कर लगता है कि कैसे यहां की ललनाओं ने हंसते-हंसते अपने शरीर आग के हवाले कर अपने जीवन को स्वाहा कर दिया। कैसे मेवाड़ के दीपक को बचाने के लिये माता पन्ना ने अपने पुत्र का बलिदान दे दिया। कैसे बिनाधड़ के सिर शत्रु से लड़ता रहा। कैसे यहां की महाराणी ने हंसते हंसते विष को अमृत समझ कर पी लिया। कैसे यहां के पशु चेतक ने पैर में घाव होने पर भी अपने स्वामी को रणभूमि से सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया। अपने पति को रणभूमि से विमुख न होने के लिये एक नवविवाहिता महाराणी ने कैसे अपना सिर काट कर सैनाणी के रूप में अपने पति के पास भेजा। और कैसे एक राजकुमारी ने दो राज्यों के मध्य युद्ध रोकने के लिये विषपान कर अपनी इहलीला समाप्त कर दी। गिनने बैठे तो असंख्य ऐसी घटनाएं मेवाड़ के इतिहास में मिल जायेगी।
इस प्रकार मेवाड़ विविधाओं से सम्पन्न है। यहां की विरासत व्यापक है, ओर धरोहर मूल्यवान। इसका अध्ययन और इसका संरक्षण महत्वपूर्ण है मेवाड़ की पहचान भी इसी में है। इसी धरोहर का अध्ययन आगे के पृष्ठों पर कराया जायगा।  (क्रमशः)

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