मेवाड़ की धरोहर-९

प्रागैतिहासिक मेवाड़
विश्व की सभ्यताओं का विकास अधिकांशत: नदियों की घाटियों में ही हुआ। भारत में भी सिंधु घाटी की सभ्यता की तरह कई ऐसे स्थान अध्ययन में आये है जहां सभ्यताओं का विकास हुआ था। ऐसे भी स्थान है जहां सिंधु घाटी से पहले सभ्यता जन्म ले चुकी थी। विद्वानों का यहां तक मानना है कि मेवाड़ प्रदेश में ५००० वर्ष ई.पू. सभ्यता का उद्भव और विकास हो गया था।  मेवाड़ की प्रमुख नदियों बेड़च, बनास, कोठारी, गम्भीरी, कदमली आदि के लगभग ४० से अधिक स्थलों के उत्खनन से प्राप्त वस्तुओं के अध्ययन से स्पष्ट हो जाता है कि मेवाड़ की संस्कृति हड़प्पा से पूर्व विकसित हो चुकी थी। रिजर्व स्लिप मृद् भाण्ड (मिट्टी के बर्तन) मोहनजोदड़ो, चन्हूदड़ो, प्रभास और सुरकोटड़ा से मिले हैं इनमें सुरकोटड़ा से सर्वाधिक १६ की संख्या में मिले हैं। इसके विपरीत बालाथल से प्राप्त ऐसे मृद् भाण्डों की संख्या १०० से भी अधिक है। इन मद् भाण्डों के वैज्ञानिक परीक्षणों से भी यह सिद्ध हो गया है कि ये मृद् भाण्ड स्थानीय स्तर पर ही बनाये गये थे। स्पष्ट है कि मेवाड़ में कृषि के अलावा मृद् भाण्डों को बनाने की कला का यहां पहले ही विकास हो गया था। बागोर, आयड़, गिलूण्ड, बालाथल, ईसवाल, जावर, मध्यमिका आदि लगभग ४० स्थानों की खोज से यह तो स्पष्ट है कि बहुत पहले मेवाड़ में सांस्कृतिक विकास हो चुका था। उस समय इस क्षेत्र का क्या नाम था? यहां के लोग कौन थे? यह तो खोज का विषय हैं, पर यहां के कुछ स्थलों का जो उत्खनन हुआ है उससे जो जानकारी मिली है उससे पाठकों को अवश्य अवगत कराया जायगा। (मेवाड़ की सांस्कृतिक धरोहर डा. एस.के. वर्मा पृ-५४)

बागोर
कोठारी नदी (बनास नदी की सहायक) के बाये तट पर भीलवाड़ा के पश्चिम दिशा में २५ कि.मी. की दूरी पर यह बागोर गांव स्थत है। वर्तमान में बागोर में इस स्थान को ‘महासती का टीलाÓ इस नाम से जाना जाता है। यह टीला पूर्व से पश्चिम २०० मीटर और उत्तर से दक्षिण इसकी लम्बाई १५० मीटर है। सन् १९६७ में दकन कालेज, पुणे के श्री बी.एन. मिश्र और हीउल वर्ग, जर्मनी के एल.एम. लेश्निक ने इस क्षेत्र का उत्खनन करना प्रारम्भ किया। प्रारम्भिक स्थिति में इन विद्वानों ने इस क्षेत्र को तीन सांस्कृतिक कालों में माना, परन्तु बाद में इसे संशोधित किया गया। अब इस क्षेत्र को दो कालों में विकसित माना- मध्य पाषाण काल और लौहकाल। इसमें भी प्रथम काल को दो उपकालों में विभाजित किया गया (१) प्रथम उपकाल (२) द्वितीय उपकाल। (पुरातत्व विमर्श जयनारायण पाण्डेय-पृ.२७३)
प्रथम उपकाल – इस काल में लघु पाषाण के उपकरण अधिक संख्या में मिले हैं और पशुओं की हड्डियां भी बहुतायत में मिली हैं। लघु पाषाण काल में क्वाटर््ज और चर्ट का मुख्य रूप से प्रयोग हुआ था। जानवरों में चीतल, सांभर, चिन्कारा, हिरण, खरगोश, लोमड़ी आदि जंगली जानवर थे तथा भेड़, बकरी, गाय, बैल, भैंस आदि पालतू जानवर हुआ करते थे। इसके अतिरिक्त यहां मछली, नेवला और कछुए की हड्डियां भी मिली है। इन सब प्रमाणों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि यहां के लोग उस समय पशुपालन और शिकार किया करते थे। यह काल ५००० वर्ष ई. पू. से २८०० वर्ष ईसा पूर्व माना गया है। (वही-पृ.२७३-७४)
द्वितीय उपकाल – प्रथम उपकाल से सतत इस क्षेत्र का विकास होता रहा। पत्थरों के उपकरणों का स्थान ताम्र उपकरणों ने लेना प्रारम्भ कर दिया। पूर्व की तरह शिकार और पशुपालन होता रहा जो उस काल के जानवरों की हड्डियों के अवशेषों के अध्ययन से पता चलता है। इस काल में मृद् भाण्डों का भी प्रयोग किया जाता रहा। इनके अवशेषों के अध्ययन से पता चलता है कि ये बर्तन हस्तनिर्मित हुआ करते थे। इन पर अलंकरण भी किया जाता था। यहां पाये जाने वाले ताम्र उपकरण इस बात के द्योतक है कि बागोर का सम्बन्ध उस समय मेवाड़ के अन्य क्षेत्रों और मालवा से हो गया था। अवशेषों में एक भाला और तीन तीर ताम्बे के मिले हैं जो अन्य स्थानों से प्राप्त किये गये होंगे। यहां तीन मानव कंकाल भी मिले हैं जिनकी दिशा पूर्व-पश्चिम है। संभवत इस काल में शवों को दफनाया जाता होगा। उस समय के लोग घास फूस की झोपडिय़ों में रहा करते थे। पशुपालन, शिकार व मिट्टी के बर्तन बनाना उस समय का मुख्य कार्य था। यह काल २८०० वर्ष ई.पू. से ६०० वर्ष ई.पू. माना गया है। (वही प..-२७५)

द्वितीय काल

प्रथम काल के पश्चात् एक लम्बे अन्तराल तक यह क्षेत्र उजाड़ था। उस काल में किसी भी प्रकार के जन जीवन के अवशेष नहीं मिले हैं। उसके बाद के मिले अवशेषों से ज्ञात होता है कि उस समय के लोग पशुपालन और शिकार तो किया करते ही थे साथ ही मिट्टी के बर्तन भी बनाया करते थे। भवनों के निर्माण में ईंटों का प्रयोग किया जाता था। लोहे के उपकरणों का उस समय प्रचलन हो गया था। कृषि कार्य भी होता था इससे ज्ञात होता है कि आहार शाकाहारी और मांसाहारी दोनों प्रकार का था। श्रृंगार करने के उपकरणों में कांच के मनके प्रमुख रूप से मिले है। इस जन जीवन का कालक्रम ईसा पूर्व ४०० वर्ष माना गया है। (वही-पृ. २७५) (क्रमश:)

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