मेवाड़ की धरोहर-८

मेवाड़ की खनिज सम्पदा
मेवाड़ की धरा जहां वन सम्पदा से सम्पन्न है वहीं यह खनिजों की दृष्टि से भी सम्पन्न रही है। बागोर, आहाड़, गिलुण्ड और बालाथल के अवशेषों से यह स्पष्ट ज्ञात होता है कि उन्हें खनिजों का ज्ञान था। इन पुरातात्विक अन्वेषणों से यह परिलक्षित होता है कि इन्हें ज्ञान के साथ-साथ उनके उपयोग के तरीके भी आते थे, आहाड़, बालाथल में तो ताम्बे के उपकरण भी मिले है। आहाड़ में ‘ताम्र प्रगलन’ विधि का ज्ञान था ऐसे अवशेष भी मिले हैं। उसी प्रकार बालाथल में लौह उपकरण व उसके प्रगलन विधि के संकेत मिले है। ये दर्शाते है कि मेवाड़ में चार हजार वर्ष पूर्व भी धातुओं के बारे में पूरी जानकारी थी।
महाराणा लाखा, जो चौदहवी शताब्दी में मेवाड़ के शासक रहे, के समय में यहां जावर में जस्ते की खानों से जस्ता निकाला जाता था और उसे गलाया भी जाता था। यहां स्थान-स्थान पर मंदिर बने हुए हैं। १०वीं शताब्दी से लेकर वर्तमान काल तक जिन मन्दिरों का निर्माण हुआ है वह ‘संगमरमर’ नामक इमारती पत्थर से ही हुआ है जो आसपास की खानों से ही प्राप्त होता था। इन्हीं संगमरमरी पत्थरों को तराश कर यहां स्तम्भ, मन्दिर व हवेलियों का निर्माण कराया गया। महाराणा राजसिंह के समय निर्मित राजसमन्द बांध भी संगमरमर पत्थर से बना हुआ है। नौ चौकी की पाल, उसके तोरण व नौ चौकों से युक्त तीन छतरियां और उसकी नक्काशी राजनगर से प्राप्त संगमरमर से ही की गई है। संगमरमर की स्थानीय आपूर्ति के कारण यहां ऐसे स्मारकों की बहुलता है। विजय स्तम्भ, कीर्ति स्तम्भ, विभिन्न स्थानों पर निर्मित छतरियां, हवेलियां आदि में संगमरमर का प्रयोग भी यहां के खनिजों के उपयोग को दर्शाता है। इस प्रकार धात्विक हो या अधात्विक मेवाड़ के लोग इन खनिजों को अच्छी प्रकार से जानते थे।
राजस्थान में ‘खनिज सम्पदा’ में मेवाड़ अग्रणी रहा है इस कारण सरकार ने भी खनिज विभाग का राज्य स्तर का केन्द्रीय कार्यालय उदयपुर में खोला। स्वतंत्रता प्राप्ति के पहले यहां खनिज का स्वतंत्र विभाग खोला गया था। आज राज्य का निदेशालय उदयपुर में है। यह स्वयं ही मेवाड़ में खनिज की महत्ता को प्रदर्शित कर रहा है।
मेवाड़ में धात्विक तथा अधात्विक दोनों ही प्रकार के खनिजों का खनन होता है। धात्विक में प्रमुख रूप से जस्ता, सीसा, चांदी, कैडमियम, लोहा-अयस्क तथा ताम्बा आदि निकाला जाता है। अधात्विक में प्रमुख रूप से अभ्रक, वेराइट्स, एस्वेस्टस, फेल्सपाट, डोलेमाइट, संगमरमर, सोप-स्टोन, चीनी मिट्टी, रोक फास्फेट, चूना पत्थर, पन्ना आदि का खनन होता है। इसके अतिरिक्त परमाणु शक्ति उत्पन्न करने वाले खनिजों के भण्डार की भी सम्भावना व्यक्त की गई है।
धात्विक खनिजों में महत्वपूर्ण खनिज जस्ता है जिनके साथ सीसा, चांदी और कैडमियम भी निकलता है। ‘जस्ता’ प्राप्त करने के स्थानों में जावर पुराने समय से ही ज्ञात था जिसका विस्तृत रूप से खनन स्वतंत्रता के बहुत पहले प्रारम्भ कर दिया गया था। इन जावर मोरिया के खानों के अतिरिक्त रामपुरा, अगूचा, पुर-वनेड़ा और दरीबा की खाने प्रमुख है यहां का जस्ता-देवारी, चन्देरिया में परिद्रवित कर इसे शुद्ध किया जाता है तभी इसका उपयोग किया जा सकता है। अन्य धातु यहां नहीं के बराबर है।
यहां पर अधात्विक खनिजों के खनन व्यापक स्तर पर किये जा रहे है। इसमें संगमरमर का खनन तो प्राचीन काल से ही चलता आ रहा था जिसका प्रमाण यहां के प्राचीन मन्दिर, स्मारक, हवेलियां, तोरण व द्वार आदि हैं। वर्तमान में उदयपुर जिले में ऋषभदेव, बावरमल, जसपुरा-दरोली में, राजसमन्द जिले में राजनगर, केलवा, आमेट, ऊ मटी, तलाई, मोरवण से, भीलवाड़ा जिले में भूजावास, जेतपुरा, पंचनपुरा, सरण खेड़ा और कांटी से तथा चित्तौड़ जिले में मांडलदेह-पाण्डोली क्षेत्र में संगमरमर निकाला जाता है। उदयपुर व राजसमंद तो संगमरमर की दृष्टि से भारत की प्रसिद्ध मण्डी बन गई है। इसके अतिरिक्त व्यापक स्तर पर सोप स्टोन का खनन किया जाता है इसमें उदयपुर जिले में छ: क्षेत्र है। चित्तौड़ जिले में यह चूने के पत्थर के साथ निकाला जाता है। भीलवाड़ा से प्राप्त सोप स्टोन गुणवत्ता की दृष्टि से सबसे अधिक उत्कृष्ट है।
उक्त खनिजों के अतिरिक्त मेवाड़ में वेराइट्स का भी खनन बड़ी मात्रा में होता है। स्थानीय भाषा में इसे भारी पत्थर कहते हैं यह रेलपात लिया, बावरमल, धूलखेड़ा, कारोली, केसूली से प्राप्त किया जाता है। इसके अलावा राक फास्फेट भी मेवाड़ में बहुतायत में मिलता है यह झामर कोटड़ा, मटून, कानपुर, डाकन कोटड़ा, खरवरिया का गुड़ा, सीसारमा, नीमचमाता, बडग़ांव आदि में पाया जाता है। मटून की खाने बन्द कर दी गई है वर्तमान में व्यापक रूप में खनन झामर कोटड़ा में ही हो रहा है। इस प्रकार मेवाड़ खनिज की दृष्टि से राजस्थान का महत्वपूर्ण प्रदेश है। (क्रमश:)

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