मेवाड़ की धरोहर-७

मेवाड़ के वन्यजीव
राजस्थान के कुल वन भूभाग में से लगभग १/४ वन मेवाड़ में ही पाये जाते है। वनाच्छादित अरावली पर्वतों में विविध प्रकार की वनस्पतियां पाई जाती हैं वहीं यहां विविध प्रकार के वन्यजीव पाये जाते हैं। पूर्व में यहां वन्यजीवों की बहुलता थी परन्तु वनों की कटाई और पशुओं के शिकार के कारण इन वन्यजीवों में कमी आ गई है। यहां के स्थानों के नाम जैसे बाघदड़ा, बाघपुरा, नाहरमगरा आदि इस बात की ओर संकेत करते हैं कि यहां पूर्व में ‘बाघ’ बहुत अधिक मात्रा में पाये जाते थे। यहां पर्वतों पर जंगलों में पाई जाने वाली होदियां तथा यहां के शिकार की चित्रवलियां इस बात के प्रमाण हैं कि यहां का प्रदेश वनाच्छादित था जिसमें बहुतायत में वन्यजीव रहा करते थे।
महाराणा फतहसिंह के समय के शिकारों की घटनाएं तो आज जनश्रुति के अंग बन गये हैं। उस समय के उदयपुर के आसपास भी घने वन थे। देवाली के तालाब (फतहसागर के तालाब) के पास, जलबुर्ज, खास ओदी, कानपुर, बाघदड़ा, नाहरमगरा, बस्सी, जयसमन्द आदि स्थानों पर महाराणा फतहसिंह का जाना होता ही था। मेवाड़ में वे जहां भी जाते थे, वहां के ठिकानेदार उनके पास के वनों में शिकार की व्यवस्था किया करते थे। यह इस बात का प्रमाण है कि उस समय सम्पूर्ण मेवाड़ वनाच्छादित था और वे वन वन्यजीवों से परिपूर्ण थे।
वर्तमान में अब इन वनों में ‘बाघ’ प्रजाति लुप्त हो गई है। अब वह केवल महलों के चित्रों में अथवा उदयपुर के जन्तुआलय में मिलते हैं। वर्तमान में मेवाड़ के वनों में वन्यजीवों में बघेरा, जरख, भेडिय़ा, सियार, रींछ, सांभर, नीलगाय, चीतर, चिंकारा, जंगली बिल्ली, जंगली सूअर, लंगूर, अनेक प्रकार के जलचर-मगरमच्छ, उडऩ गिलहरी, खरगोश, पैंगोलियन, विभिन्न प्रकार के पक्षी-मोर, मैना, तीतर, बटेर, जंगली मुर्गे, रोजरिंग, पैराकीट, फाख्ता, ट्रीप-पाईप, गे्र हार्नबुल, ड्रोगो, ग्रीन पीजन, सरीसर्पों के विभिन्न प्रकार कोबरा, अजगर, क्रेट, रसूल, वाइपर, गिरगिट आदि वन्यजीव पाये जाते हैं।
इन वन्यजीवों के सुरक्षा की दृष्टि से सरकार ने अभयारण्य, आखेट निषिद्ध क्षेत्र, नेचर पार्क व मृगवनों का विकास किया है जिससे इन वन्यजीवों की प्रजातियां नष्ट न हों। इन वनों में वन की कटाई नहीं की जा सकती और न ही किसी वन्यजीव का शिकार किया जा सकता है। इस दृष्टि से मेवाड़ में सात अभयारण्य और दो मृगवन बनाये गये हैं।
१. कु म्भलगढ़ अभयारण्य – अरावली पर्वत श्रृंखलाओं के मध्य मारवाड़ और मेवाड़ की सीमा पर स्थित जैव और नैसर्गिक सौंदर्य लिये हुए यह वन सन् १९७३ में अभयारण्य घोषित किया गया जो ६१०.५२ वर्ग कि.मी. में फैला हुआ है। यहां पर्यटक आकर प्रकृति की गोद में बैठकर प्रकृति का आनन्द लेते हुए वन्यजीवों और वनस्पतियों का सान्निध्य प्राप्त करता है। यह क्षेत्र जैव विविधता की दृष्टि से समृद्ध है। वनस्पति और वन्यजीव यहां विविधता में पाये जाते है।
२. सज्जनगढ़ अभयारण्य – उदयपुर नगर के दक्षिण पश्चिम दिशा में ५ किलोमीटर दूर महाराणा सज्जनसिंह द्वारा निर्मित सज्जनगढ़ महल के चारों ओर लगभग ५.१९ वर्ग कि.मी. क्षेत्र में यह फैला हुआ है। इस अभयारण्य के कुछ दूरी पर बड़ी तालाब स्थित है जिसे ‘टाइगर लेक’ के नाम से जाना जाता है। राजस्थान सरकार ने १७ फरवरी १९८७ में यह अभयारण्य घोषित किया। यह सुरम्य स्थान अक्टूबर से मई तक देखने योग्य है।
३. फुलवाड़ी की नाल – पुष्पों से सुसज्जित वनस्पति तथा नैसर्गिक सौंदर्य के कारण इस क्षेत्र का नाम ‘फुलवाड़ी अभयारण्य’ पड़ा। सरकार ने इस क्षेत्र को ६ अक्टूबर सन् १९८३ में अभयारण्य घोषित किया। ५११ वर्ग कि.मी. क्षेत्र में फैला हुआ यह अभयारण्य ११ खण्डों में उमरिया, मामेर, अशवारा, फुलवाड़ी, अम्बास, सरवर, दइया, हरवा, अरहलद, दावली व डेडमारिया प्रकृति प्रेमी और अध्येताओं के लिये यह अभयारण्य विशेष महत्व रखता है।
४. बस्सी अभयारण्य – चित्तौड़-कोटा मार्ग पर चित्तौड़ से २५ मील दूर यह २९ अगस्त सन् १९८८ में अभयारण्य घोषित किया गया। यह १३८.६९ वर्ग कि.मी. क्षेत्र में फैला हुआ है। इसमें से ९६९९ हेक्टर तो सुरक्षित वन है और ४१०५ हेक्टर रलित वन है।
५. जयसमन्द अभयारण्य – उदयपुर से ५० किलोमीटर दक्षिण पूर्व जयसमन्द के वन क्षेत्र को सन् १९५५ के नवम्बर माह में अभयारण्य घोषित किया गया। उदयपुर के समीपस्थ पर्यटकों के लिये यह दर्शनीय स्थल भी है।
६. सीतामाता अभयारण्य – चित्तौड़, प्रतापगढ़ और उदयपुर जिले का यह क्षेत्र सन् १९७९ को अभयारण्य घोषित किया गया। इस अभयारण्य का कुल क्षेत्रफल ४२२.९४ वर्ग कि.मी. है। यहां अभयारण्य में ‘सीता माता’ नामक सुन्दर धार्मिक स्थल है। यहां की सदा प्रवाही नदियां वन्यजीवों को प्राण दान करती हैं।
७. भैसरोडग़ढ़ अभयारण्य – मेवाड़ के सुदूर पूर्व में कोटा जिले की सीमा पर २२९.१४ वर्ग कि.मी. के क्षेत्र में फैला यह अभयारण्य सन् १९८३ के ५ फरवरी के दिन घोषित किया गया। इस अभयारण्य की खास विशेषता यह है कि यह एक लम्बी पट्टी के रूप में चम्बल और ब्रह्माणी नदी के सहारे सहारे फैला हुआ है।
नेचर पार्क बाघदड़ा – पर्यटन स्थल उदयपुर के पूर्व में १५ कि.मी. दूर पर स्थित ‘बाघदड़ा’ स्थान कभी बाघों से परिपूर्ण था यहां की ओदियां इस बात को दर्शाती है कि यह स्थली कभी यहां के शासकों की ‘शिकारगाह’ रही होगी। सन् १९८२ में ३४२१९ हेक्टर में फैला यह स्थान नेचर पार्क घोषित किया गया। (क्रमश:)

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