मेवाड़ की धरोहर- ४

मेवाड़ का प्राकृतिक स्वरूप
पठार – समतल ऊं चे मैदान जो पर्वतों से घिरे रहते हैं और जो समुद्र तल से काफी ऊं चे होते हैं वे पठार के नाम से जाने जाते हैं। वास्तव में ये अन्त: पठार है जो पर्वतों से घिरे है मेवाड़ में ऐसे पठार छोटे मोटे कई है। पश्चिमी पर्वतीय प्रदेश में ऐसे पठारों की संख्या अधिक है। मेवाड़ में ऐसे पठारों में गिरवा, जयसमन्द, लसाडिय़ा, प्रतापगढ़ आदि प्रमुख हैं। मेवाड़ में पठारों में दो प्रमुख पठार हैं-भोराट का पठार और ऊ परमाल। अरावली श्रृंखला में इस प्रकार का उच्चतम भूभाग उदयपुर से उत्तर पश्चिम में कुम्भलगढ़ और गोगुन्दा के मध्य पठार रूप में स्थित है जो स्थानीय भाषा में भोराट के पठार के नाम से जाना जाता है जिसकी औसत  ऊं चाई ३६०० है। राजस्थान के हाड़ौती के पठार का पश्चिमी भाग मेवाड़ में आ गया है जो बिजोलिया और बेगू क्षेत्र में फैला हुआ है इसे स्थानीय लोग ऊ परमाल के नाम पुकारते है। यही ऊ परमाल कोटा क्षेत्र में पधार के नाम से पुकारते हैं (उदयपुर)।
मैदान – मेवाड़ में पर्वतों की तुलना में मैदान सीमित है जो मेवाड़ के पूर्वी और कुछ दक्षिणी भाग में स्थित हैं। इनमें बनास का मैदान और छप्पन का मैदान प्र्रमुख हैं। बनास का मैदान बनास व उसकी सहायक नदियों द्वारा लाई गई मिट्टी से निर्मित हुआ है जो दक्षिण में मेवाड़ का मैदान और उत्तर से मालपुरा-करौली का मैदान कहलाता है। यह मैदान मेवाड़ में उदयपुर जिले के पूर्वी भाग, चित्तौडग़ढ़ और भीलवाड़ा तक विस्तृत है। इस मैदान का ढाल धीरे-धीरे उत्तर और उत्तर पूर्व की ओर कम होता जाता है। इसकी औसत ऊं चाई ८०० फीट से १५०० फीट के बीच है। इस मैदान की अधिकतम ऊं चाई पश्चिम में, जहां अरावली श्रेणी अनावृत्त है, देवगढ़ के समीप लगभग १६०० फीट है। इस भूभाग में पृथक कई निर्जन पहाडिय़ां दृष्टिगोचर होती हैं। इन मैदानों में नदियों द्वारा लाई गई कांपीय मिट्टी की परत पतली है। ये मैदान पूर्व की तुलना में पश्चिम में उबड़-खाबड हैं, जमाव भी पूर्व से पश्चिम कम होता जाता है।
प्रतापगढ़, बांसवाड़ा और दक्षिणी मेवाड़ के मध्य के भूभाग में छप्पन ग्राम समूह स्थित होने के कारण इस प्रदेश को छप्पन का मैदान पुकारा गया। यह मैदान माही और उसकी सहायक नदियों से सिंचित है जिसका अधिकांश भाग डूंगरपुर-बांसवाड़ा में है इसलिये इसे वागड़ का मैदान भी कहा जाता है। माही नदी की सहायक नदियों का ढाल तीव्र है अत: इस मैदान का अपरदन अधिक हुआ है, इससे उत्तर का छप्पन का मैदान अधिक समरूप है जो अधिकतर मेवाड़ में हैं। यह मेवाड़ का भूभाग माही की दो सहायक नदियां सोम और जाखम नदियों द्वारा सिंचित हैं।
नदियां – राजस्थान का महान जल विभाजक जो नदियों के प्रवाह को बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में विभाजित करता है मेवाड़ में से होकर गुजरता है। यह जल विभाजक अरावली अक्ष के सहारे उत्तर में सांभर झील से अजमेर के दक्षिण तक विस्तृत है। यहां से दक्षिण पश्चिम की ओर ब्यावर से कुछ ही मील पहले तथा उदयपुर शहर से दक्षिण पश्चिम की दिशा में अग्रसर होने से पहले देवगढ़ और कुम्भलगढ़ की ओर मुड़ जाती है। इसके आगे उदयसागर को पीछे छोड़ती हुई पश्चिम की ओर बढ़ जाती है। तत्पश्चात् दक्षिण पूर्व की ओर मुड़कर बड़ीसादड़ी, छोटीसादड़ी, प्रतापगढ़ होती हुई मध्यप्रदेश में नीमच की ओर चली जाती है। इससे मेवाड़ में अरब सागर में तथा बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियां मिल जाती है।
अरब सागर में गिरने वाली नदियों में पश्चिमी बनास, सोम, साबरमती और उनकी सहायक नदियां है। पश्चिमी बनास स्वतंत्र नदी है जो कुम्भलगढ़ की पहाडिय़ों से निकल कर सिरोही जिले में बहती हुई अंत में कच्छ के रण में समा जाती है। सोम नदी माही की सहायक है जो पानरवा के पास से निकलकर दक्षिण पूर्व दिशा में बहती हुई वेणेश्वर धाम के निकट माही में मिल जाती है। सोम की  सहायक नदियां जाखम, गोमती और सारणी नदियां है। साबरमती नदी भी स्वतंत्र नदी है जो गोगुन्दा के पास साबरमाल पर्वतों से निकलती है अत: इसका नाम साबरमती पड़ा है। अपनी सहायक नदियों मानसी वाकल, और झाडोली नदियों का जल साथ लेते हुए दक्षिण की ओर प्रवाहित होकर गुजरात से बहती हुई खम्मात की खाड़ी में जा मिलती है।
बंगाल की खाड़ी में पानी ले जाने वाली नदियों में बनास और उसकी सहायक नदियां प्रमुख है। इसमें बनास नदी, कुम्भलगढ़ के पास ‘भैरो का मठÓ नामक  स्थान से निकल कर नाथद्वारा, रेलमगरा होती हुई चित्तौडग़ढ़ और भीलवाड़ा जिले से बीगोद के पास बेड़च नदी के  पानी को लेकर रामेश्वर के स्थान पर चम्बल में जा मिलती है। इनकी सहायक नदियां कोठारी, खाटी, बेडच, गम्भीरी आदि है। इनका प्रवाह भी बनास की तरह पश्चिम से पूर्व और उत्तर पूर्व की ओर है। इनमें बेड़च उदयपुर और चित्तौड़ जिलों में बहकर बीगोद के पास बनास में समाहित हो जाती है। कोठारी या कोटेश्वरी राजसमन्द के दिवेर के पहाड़ों से निकलकर भीलवाड़ा जिले में बहते हुए बनास में जा मिलती है। खारी राजसमन्द के सुदूर उत्तर में बिजराल पहाडिय़ों से निकलकर देवगढ़ के समीप होती हुई अजमेर जिले में देवली के समीप बनास में मिल जाती है।
राजस्थान में सबसे लंबी और वर्ष भर बहने वाली नदी चम्बल मेवाड़ की पूर्वी सीमा पर स्थित भैसरोडग़ढ़ को छूती हुई चली जाती है। रावतभाटा इस नदी पर बंधा बांध मेवाड़ में ही है। (क्रमश:)

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