मेवाड़ की धरोहर-३

मेवाड़ का प्राकृतिक स्वरूप
मेवाड़ की पर्वतमालाएं-जरगा के दक्षिण की ओर से प्रारंभ होकर भाडेर और नाहेसर के पहाड़ पश्चिमी भाग में दक्षिण की ओर चले गये हैं, जहां सिरोही राज्य की सीमा मिलती है । भाडेर पर्वत की ऊं चाई ३५५२ फीट, लम्बाई २० मील व चौड़ाई ४ मील के करीब है। नाहेसर पर्वत इससे ऊं चा है जो लगभग ३६७२ ऊं चा है । भाडेर पर्वत से आठ मील दूर पूर्व की ओर गोगुन्दा, ढोल, कमोल आदि गांव बसे हुए हैं। गोगुन्दा समुद्र तल से २९५९ फीट की ऊं चाई पर बसा हुआ सबसे ऊं चा बसा गांव हैं। (पानरवा का सोलंकी राजवंश-डा. देवीलाल पालीवाल – पृ. ११)
भाडेर और नाहेसर के मध्य ही भोमट का जूड़ा परगना आ गया है। यह भाग सघन वनों से ढका हुआ है। भोमट के इस सघन पर्वतीय प्रदेश में रहकर प्रताप ने अपनी युद्ध नीति को सफलता प्रदान की थी। ऐसे समय में प्रताप के कार्य का केन्द्र आवरगढ़ रहता था जो झाड़ोल के कमलनाथ पर्वत पर स्थित हैं। जो प्रताप की संकटकालीन राजधानी रहती थी। भाडेर के पूर्व और दक्षिण पूर्व का सघन वनीय क्षेत्र ही प्रताप का प्रधान सुरक्षा स्थान रहा। (वही पृ.-११)
इस प्रकार मेवाड़ का यह पश्चिमी प्रदेश सम्पूर्ण पर्वतीय प्रदेश है जो दुर्गम सघन वनों से घिरा हुआ, उच्च पर्वत श्रृखलाओं से युक्त है। यह प्रदेश ‘भोमट’ कहलाता है। भोमट के पूर्वी और दक्षिणी पूर्वी प्रदेश छप्पन का प्रदेश है। भोमट से पूर्वी भाग में छप्पन भूक्षेत्र की ओर फैला हुआ ‘खरड़’ का पर्वतीय क्षेत्र है। अत: इस क्षेत्र को ‘भोमट खण्ड’ कहते हैं। वास्तव में यह छप्पन की पहाडिय़ों का ही एक भाग है। भोमट के उत्तर और उदयपुर के दक्षिण के मध्य का क्षेत्र ‘मगरा’ कहलाता है । यहीं टीडी के पास जावर के ऊं चे पहाड़ खनिज की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इस प्रकार भोमट, छप्पन और मगरा का समस्त पर्वतीय प्रदेश प्रताप की कर्मस्थली रहा।
उदयपुर के दक्षिण-पूर्व में ‘उदयसागर’ स्थित है जिसका निर्माण महाराणा उदयसिंह ने करवाया था। इसके पास का क्षेत्र ‘मेवल’ कहलाता है। यहां के पर्वत अपेक्षाकृत कम ऊं चे है जो मेवल के मगरे कहलाते है। इसी प्रदेश में झामरकोटड़ा की फास्फेट की खानें है। ये पर्वत श्रेणियां पूर्व और दक्षिण पूर्व में कानोड़, धरियावद होते हुए प्रतापगढ़ तक चली गई हैं। प्रतापगढ़-देवरिया का भूभाग-‘मंडल’ कहलाता है ।
मेवाड़ के पूर्व भाग में पर्वत श्रृंखलाएं तुलनात्मक दृष्टि से कम महत्व की हैं। चित्तौडग़ढ़ के पूर्व में पहाड़ों की श्रृंखला पाई जाती है जो उत्तर दक्षिण फैली हुई है। इन पर्वतों के बीच की घाटियां सीमित संकरी और एक दूसरे के सामानान्तर पाई जाती है।

नाल
नाल, घाटी, घाटा अथवा दर्रे के नाम से पहचाना जाने वाला भूभाग यातायात की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। मेवाड़ का पश्चिमी और दक्षिणी पर्वतीय प्रदेश दुर्गम और विकट है जहां एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना कठिन है। क्योंकि ऊं चाई के कारण इन पर्वतों को लांघा नहीं जा सकता। यही कारण था कि ये क्षेत्र सुरक्षा की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण थे। कुम्भलगढ़ से लेकर ऋषभदेव तक लगभग १०० मील लम्बाई और देबारी से सिरोही तक ७० मील के मध्य फैले इस पर्वतीय प्रदेश में एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के लिये पर्वतों के मध्य के निचले भाग का उपयोग किया जाता था। पर्वतों के मध्य ये निचले यात्रा जो आने जाने और यातयात के लिये काम में लाये जाते थे उन्हें स्थानीय भाषा में ‘नाल’ कहा जाता है। इन्हीं नालों को कहीं घाटा, कहीं घाटी ता कहीं दर्रा कहा जाता है। ये दर्रे या ‘नाल’ यातायात की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। ये नाल या घाटे मेवाड़ को मारवाड़, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, गुजरात, मेरवाड़ा और हाड़ौती का जोड़ते हैं। (वीर विनोद भाग-१-पृ.-१०६-१०८)
इन नालों में देसूरी की नाल, जिसे झीलवाड़ा की नाल या पगल्या नाम से भी जाना जाता है, मेवाड़ को मारवाड़ से जोड़ती है। मुगलों के समय हल्दीघाटी के युद्ध के पश्चात् मुगलों ने अधिकांश आक्रमण इसी नाल से घुस कर किये। इसके अतिरिक्त मेवाड़ को मारवाड़ से जोडऩे वाली अन्य नाल सोमेश्वर की नाल, हाथीगुड़ा की नाल, भाणपुरा की नाल (राणकपुर का घाटा), कामली घाट, गोरम घाट व काली घाटी है। मेवाड़ को दक्षिणी प्रदेशों से यथा गुजरात, डूंगरपुर, बांसवाड़ा आदि से जोडऩे वाली नालें केवड़े की नाल, जावर की नाल, रतनपुर घाटा है। इसी प्रकार मेवाड़ को सिरोही से जोडऩे वाली देवला की नाल, मेरवाड़ा से जोडऩे वाली दिवेर की नाल (राणा कड़ा का घाटा), पूर्वी प्रदेश से जोडऩे वाला देवारी का घाटा मुख्य है। इसके अतिरिक्त हल्दीघाटी, चीरवा का घाटा, घोड़ाघाटी, समीचा घाटा, झाड़ोल का घाटा, पानरवा का घाटा आदि ऐसे घाटे है जो मेवाड़ के आंतरिक प्रदेशों को एक दूसरे से जोड़ते हैं। समस्त प्रदेश पर्वतीय होने के कारण यातायात को ये दर्रे, नाल या घाटे अधिक प्रभावित करते हैं। (क्रमश:)

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