मेवाड़ की धरोहर-१५

मेवाड़ का शौर्यपूर्ण अनुवंश
राजपूताने में मेवाड़ का राजवंश सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। भारत भर के शासक और राजपूत मेवाड़ के महाराणाओं को शिरोमणि मानकर उनकी ओर सदा पूज्य भाव रखते आये और अब भी रखते हैं। उनके इस महत्व के कई कारण हैं जिनमें मुख्य उनकी स्वातंत्र्यप्रियता, कर्मठता, एकता, न्याय प्रियता और अपने धर्म के प्रति दृढ़ता रखना है जैसा कि उनके राज्य चिह्न में अंकित है-‘जो दृढ़ राखे धर्म को तिहि राखै करतार’ शब्दों से पाया जाता है। गत १४०० वर्षों में हिन्दुस्तान के कई प्राचीन राज्य लुप्त हो गये, अनेक नये स्थापित हुए, भारत के इतिहास में कई बदलाव हुए, उलटफेर हुए, मुसलमानों के राज्य की प्रबल शक्ति के आगे सैंकड़ों हिन्दु राजाओं ने सर झुका कर अपनी वंश-परम्परा की मान मर्यादा को उनके चरणों में समर्पित कर दिया, परंतु एक मेवाड़ का राजवंश, जो समस्त संसार के राजवंशों में सबसे प्राचीन है, नाना प्रकार के कष्ट और आपत्तियां सहकर अपनी मान मर्यादा, कुल गौरव तथा स्वातंत्र्यप्रियता के लिये सांसारिक सुख सम्पत्ति और ऐश्वर्य को न्योछावर करते हुए भी अपने अटल पथ से विचलित नहीं हुआ। इसी कारण भारतवासी मेवाड़ के महाराणा को आदरभाव से देखते हैं और उन्हें हिन्दुआ सूर्य कहते हैं। (उदयपुर राज्य का इतिहास- ओझा -पृ. ६८)
भारतवासी ही नहीं विदेशी आक्रान्ताओं ने भी मेवाड़ के राजवंश की प्रशंसा की है। बाबर ने ‘तुजुके बाबरी’ में लिखा है कि हिन्दुस्तान में विजयनगर के सिवा दूसरा प्रबल राजा सांगा है, जो अपनी वीरता और तलवार के बल से शक्तिशाली हो गया है। उसने मांडू के बहुत से इलाके-रणथम्भोर, सारंगपुर, भिलसा और चन्देरी ले लिये हैं। हिन्दुस्तान में हमारे आने से पहले राणा सांगा की शक्ति इतनी बढ़ गई थी कि दिल्ली, गुजरात और माण्डू के सुलतानों में से एक भी बड़ा सुलतान हिन्दु राजाओं की सहायता के बिना अकेला उसका सामना नहीं कर सकता था। (वही-पृ.६८)
इसी प्रकार जहांगीर ने अपने ‘तुजुके जहांगीरी’ में लिखा है कि ‘इतने दीर्घ काल में मेवाड़ के नरेशों ने हिन्दुस्तान के किसी नरेश के सामने सिर नहीं झुकाया और बहुधा लड़ाइयां लड़ते रहे। चित्तौड़ पतन के बाद कई बार बादशाही सेनाओं ने राणा (प्रताप)को इस विचार से तंग किया कि या तो वह कैद हो जाए या भागता फिरे परन्तु इसमें निष्फलता ही मिली। जिस दिन वे (अकबर) दक्षिण को विजय करने चढ़े उसी दिन मुझे बड़ी सेना और विश्वासपात्र सरदारों के साथ राणा पर भेजा, परन्तु ये दोनों चढ़ाइयां दैव योग से निष्फल हुई।’ उन्होंने यह भी लिखा कि  ‘राणा अमर सिंह हिन्दुस्तान के सबसे बड़े सरदारों और राजाओं में से एक है। उसकी तथा उसके पूर्वजों की श्रेष्ठता और अध्यक्षता इस प्रदेश (राजपूताना आदि) के सब राजा और रईस स्वीकार करते हैं। बहुत काल तक इनका राज्य पूरब में रहा। (वहीं-पृ. ६८-६९)
यह अतुलनीय राजवंश कब से मेवाड़ में प्रारम्भ हुआ? यहां का मूल पुरूष कौन है? आदि कई प्रश्न उपस्थित होते है जिसका पुख्ता उत्तर नहीं मिलता। ओझा जी मानते है कि यह मान्यता सही नहीं है कि कुल वल्लभीपुर (गुजरात) से मेवाड़ में आया। मेवाड़ की किसी ख्यात, शिलालेख, दान पत्र से या वि.सं.१७३२ (१६७५ ई.) के बने हुए राजप्रशस्ति महाकाव्य तक भी मेवाड़ के राजाओं का वल्लभीपुर से आना कोई जानता ही नहीं था। (वहीं-पृ.१८) यह भ्रान्ति जैन साहित्य से फैली। उस साहित्य ने वल्लभी के शीलादित्य और मेवाड़ के शीलादित्य को एक मान कर उसके युद्ध में देहावसान के बाद उसके पुत्र व सेना के पलायन को मेवाड़ के साथ जोड़ते हुए यह सिद्ध करने की कोशिश है कि यही वंश आगे मेवाड़ का शासक रहा जो वास्तव में सत्य नहीं है। कर्नल टाड ने इसी आधार पर मेवाड़ के राजवंश को वल्लभी से आया हुआ माना जो भ्रामक है। (वहीं-पृ. ८४)
मेवाड़ का राजवंश बहुत प्राचीन होने से उसकी शाखाएं भी राजपूताना, मालवा, गुजरात, मध्यप्रदेश आदि में समय-समय पर फैली। रावल समरसिंह के समय की वि.सं.१३३१ (१२७४ ई.) की चित्तौड़ की प्रशस्ति में गुहिल वंश की अपार शाखाएं होने का उल्लेख है। मुंहणोत नैणसी ने अपनी ख्यात में गुहिल वंश की २४ शाखाओं के नाम लिखे हैं –
१. गैहलोत, (गुहिलोत) २.सीसोदिया ३.आहाड़ा ४.पीपाड़ा ५.हुल ६.मांगलिया ७.आसायच ८.कैलपुरा ९. मंगरोपा १०.गोधा ११.डाहलिया १२.मोटसीरा १३.गोदारा १४.भीनला १५.मोर १६.टीवणा १७.माहिल १८.तिवड़किया १९.नोसा २०.चन्द्रावत २१.घोरणिया २२.बूटीवाला २३.नूटिया २४.गोतमा।
इनमें अधिकतर शाखाएं तो उनके निवास के गांवों से प्रसिद्ध हुई है और कुछ मूल पुरूषों के नाम से। (वहीं-पृ. ८५-८६) (क्रमश:)

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