मेवाड़ की धरोहर-१४

मध्यमिका
प्रागैतिहासिक काल में मेवाड़ का भूभाग कितना उन्नत था यह तो आयड़, बालाथल, गिलूण्ड और बागोर के उत्खनन से ज्ञात हो गया। ईसा पूर्व पांच हजार वर्ष से ईसा पूर्व पन्द्रह सौ वर्ष तक इस प्रदेश के विकास में उतार चढ़ाव आते रहे। इसके पश्चात् लगभग एक हजार वर्ष का अवसान काल आया होगा। ऐसा प्रतीत होता है कि उस समय किसी कारण से ये बस्तियां उजड़ गई होगी क्योंकि इस काल के मेवाड़ में कहीं भी अवशेष नहीं मिले हैं।
पुरातत्व के अन्वेषण के अन्तर्गत चित्तौड़ से लगभग  ८ मील दूरस्थ नगरी नामक बस्ती है उसके पास उत्खनन में प्राचीन नगर के अवशेषों में सिक्के मिले हैं जिस पर लिखा है ‘मज्झमिकाया शिवजनपदस्र’। मज्झमिका मध्यमिका का ही अपभ्रंश था जो शिविजनपद की राजधानी थी। यह मुद्रा उस जनपद की ही थी जिस पर यह लिखा मिला है। इस नगर के बाहर सुविशाल एवं सुदृढ़ पत्थरों से बना विस्तृत शिला प्राकार था जो ईसा पूर्व प्रथम-द्वितीय शती में निर्मित किया गया था। (शोध पत्रिका वर्ष- ३३ अंक १ पृ.४७-४८)
शिविजनपद : सिकन्दर के आक्रमण के समय उत्तर पश्चिम भारत में स्वाधीन जनपद भी थे जिन्हें जीतने के लिये सिकन्दर को घनघोर युद्ध करना पड़ा था। इन जनपदों में एक शिविजनपद भी था जिसे ग्रीक साहित्य में ‘सिवोई’ लिखा गया है। यह जनपद वितस्ता और चिनाव नदियों के संगम से पूर्व की ओर स्थित था। मालव जनपद के समान ये लोग भी पंजाब के वाहीक प्रदेश में निवास करते थे। मौर्य साम्राज्य की शक्ति क्षीण होने पर जब उत्तरी पश्चिमी भारत पर यवनों का आक्रमण हुआ तो शिविजनपद के लोग यहां आकर बस गये और यहां ‘मध्यमिका’ को केन्द्र मानकर उन्होंने अपने गणराज्य की स्थापना की। (प्राचीन भारत की शासन संस्थाएं और राजनैतिक विचार-सत्यकेतु विद्यालंकार-पृ.२११)
महाभारत में भी कौरवों की ओर से शिविजनपद के प्रधान और सैनिक युद्ध में शामिल हुए थे। उसमें पश्चिमोत्तर के पंचनद, गोधार, त्रिगर्त, मद्र, कम्बोज, कैकेय, वाहीक, शिवि आदि भी थे। इनमें शिविजनपद गणतंत्र था। (वही-पृ.७६) स्पष्ट है कि यह जनपद महाभारत काल से लेकर सिकन्दर के समय तक गणराज्य ही रहा होगा जिसका वर्णन ग्रीक साहित्य में मिलता है। बाद में यही शासन चित्तौड़ के पास नगरी के पास आया जिसकी राजधानी का नाम मध्यमिका से प्रसिद्ध हुआ।
मेवाड़ के स्थानीय स्त्रोतों से सम्प्रति के उल्लेखों में इस तथ्य की पुष्टि होती है कि मध्यमिका नगरी पुष्यमित्र शुंग के राज्य का अंग थी। इस आधार पर मेवाड़ का शुंग काल से भी सम्बद्ध होना मिलता है। शुंगों के शासनकाल में उनके राज्यों पर यवन आक्रमणों के अनेक उल्लेखों में मेवाड़ की चर्चा मिलती है। पंतजलि के महाभाष्य में यहां तक यवनों के आक्रमण का उल्लेख मिलता है ‘अरूणात् यवना: साकेतम्, अरूणात यवनों मध्यमिकाम्’। (महाराणा राजसिंह कालीन राजनैतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास-डॉ. उषा पुरोहित-पृ.१३)
इस प्रकार यह मध्यमिका नगर ई.पू. तीसरी शताब्दी का भारत का महत्वपूर्ण प्राचीन नगर होगा जो उस समय विशाल और समृद्ध था। आज इसके खण्डहर दूर-दूर तक फैले हुए हैं। इस नगरी के पश्चिम में बेड़च नदी बहती है। इसके निकट बड़े-बड़े पत्थरों से निर्मित एक विस्तृत व सुदृढ़ विशाल प्राकार है। इस विशाल प्राकार के परकोटे की लम्बाई ३०० फुट और चौड़ाई १५० फुट है। इसकी ऊं चाई मूलत: १० फुट होगी। इसी विशालता और मजबूती को देखकर ही अकबर की सेना के हाथी इस परकोटे में बन्द किये गये थे अत: इस स्थल का नाम ‘हाथी बाड़ा’ पड़ गया। वास्तव में इसका नाम ‘नारायण वाटिका’ था जो उस समय भागवत धर्म का केन्द्र था। चित्तौड़ में ही अक्लेश्वर (प्रतापगढ़ से ३ मील दूर) के ब्राह्मी लिपि के स्तम्भ लेख में भी भागवत धर्म का स्पष्ट उल्लेख है जो यह सिद्ध करता है कि मध्यमिका अक्लेश्वर का सम्पूर्ण क्षेत्र भागवत धर्म के प्रभावन्तर्गत था। (शोध पत्रिका-वर्ष ३३ अंक १-पृ.४७-४८)
इस ‘प्राकार’ के बड़े-बड़े पत्थर गाडिय़ां भर भर कर लोग अन्य स्थलों पर निर्माण कार्य में ले गये। महाराणा रायमल की महारानी श्रृंगार देवी की बनवाई गई घोसुण्डी की बावड़ी भी नगर से ही पत्थर लाकर बनाई गई है। इसके एक पत्थर पर शिलालेख मिला हैं जिस पर तीन पंक्तियां अंकित है (पहली पंक्ति) पराशरी पुत्र गाजायन ने (दूसरी पंक्ति) भगवान संकर्षण और वासुदेव के निमित्त (तीसरी पंक्ति) पूजा के निमित्त नारायण वट (स्थान) शिला प्राकार बनवाया। इससे भी यही प्रकट होता है कि ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में भागवत धर्म का प्रभाव था। (उदयपुर राज्य का इतिहास-भाग १ पृ.५४-५५)
वर्ली गांव (अजमेर जिला) से मिले हुए वीर संवत ८४ (वि.सं. पूर्व ३८६ या ई.पू. ४४३ वर्ष) के शिलालेख में मध्यमिका नगर का उल्लेख मिलता है। इसी प्रकार तीसरे शिलालेख का एक छोटा टुकड़ा घोसुण्डी गांव की सीमा पर मिला है जिस पर अंकित है (ते) न सर्वतातेन अश्वमेध अर्थात् उस सर्वतात ने अश्वमेध यज्ञ किया। यह अश्वमेध यज्ञ सम्पूर्ण देश पर एक छत्र शासन स्थापित करने और अन्य राजाओं को अपने अधीन करने के लिये यह यज्ञ किया जाता था। सम्भवत: इसी उद्देश्य से यहां भी यह यज्ञ किया गया होगा। (वही-पृ. ५४)
वि.सं. की चौथी शताब्दी लिपि का दोनों किनारों से टूटा हुआ एक लेख का टुकड़ा नगरी गांव से ही मिला है उससे यह ज्ञात होता है कि यहां…..वाजनेय यज्ञ हुआ और उसके पुत्रों ने उसका यूप (यज्ञ स्तम्भ) खड़ा करवाया था। मालव (विक्रम) संवत् ४८१ का एक पांचवा शिलालेख भी यहां मिला है जिसमें एक विष्णु मन्दिर के बनने का उल्लेख है।  (वही-पृ.५५) बाद में मालव आक्रमण में यह नगर नष्ट हो गया। (क्रमश:)

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