मेवाड़ की धरोहर-१२

प्रागैतिहासिक मेवाड़
आयड़ संस्कृति का जनजीवन – आयड़, गिलूण्ड, बालाथल आदि के उत्खनन से जो सामग्री मिली है इससे उस समय के जनजीवन का आभास मिलता है। उनसे हम अनुमान लगा सकते हैं कि उस समय लोग किस प्रकार के भवनों में रहते थे। उनके जीवन यापन के आधार क्या थे? उनका आहार किस प्रकार का था?  उस समय की की अर्थ व्यवस्था किस प्रकार की थी? इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए आयड़ के जनजीवन का अध्ययन किया जायगा।
भवन
आयड़ के उत्खनन से पता चलता है कि उस समय के लोग मकान बना कर रहते थे। भवन निर्माण में यहां पत्थर और मिट्टी का प्रयोग किया जाता था। नींव को मजबूत करने के लिये उनमें प्रस्तर खण्डों का प्रयोग किया जाता था। दीवारों में मिट्टी के साथ चकमक पत्थर और क्वार्टज प्रयोग में लाये जाते थे जिसमें सामने से सफाई से चिनाई की जाती थी। कमरे विशेष रूप से बड़े होते थे जिन्हें बांसों और कवेलू से छाजा जाता था। कमरों में बांसों की पड़दी बनाकर छोटे कमरों में परिणत किया जाता था। पड़दी पर चिकनी मिट्टी ही चढ़ा कर उसे टिकाऊ   बनाया जाता था। फर्श को मिट्टी से लीपा जाता था। कमरे सभी आयातकार या वर्गाकार होते थे। सामान्यतया १०’ 3 १०’ तथा बड़े कमरे ३०’ 3  १५ के होते थे। खुदाई में आयड़ में एक कमरे की दीवार ४५’ लम्बी मिली है इसकी दूसरी दीवारें नहीं मिली है। शायद यह ऐसा बड़ा सभा स्थल हो जहां समाज का सम्मेलन हुआ करता था जहां बैठकर समूह में चर्चा की जाती हों। इन मकानों के पास बिखरे हुए चकमक के पत्थर कभी-कभी यह भ्रम भी पैदा कर देते है कि ये पत्थर के औजार हो क्योंकि इनका आकार सही नहीं हैं और ये औजारों जैसे लगते हैं।  (राजस्थान का इतिहास- डा. गोपीनाथ शर्मा-पृ.१८)
गिलूण्ड में भवनों में पक्की ईंटों का प्रयोग मिला है वहां बड़ी इमारतों के अवशेष अधिक संख्या में है। ये ईंटें भट्टों में पकाई हुई है जिनका आकार ३५ 3 १३ 3 १२.५ से.मी. है। ईंटों का प्रयोग सिंधुघाटी सभ्यता में मिलता है उसके बाद यहां ईंटों का प्रयोग अपने में विशेष महत्व रखता है। यहां पर एक भवन २८’ 3 १४’ के आकार का है। एक ३२’ (१०.८० मीटर) लम्बी दीवार प्रकाश में आयी है जो यह बड़े भवनों का प्रतिनिधित्व करती है। (पुरातत्व विमर्श-जयनारायण पाण्डेय-पृ. ४५८)
गिलूण्ड की तरह बालाथल के अवशेषों में ईंटों के अवशेष मिले है जो यह दर्शाते हैं कि बालाथल में भी भवन निर्माण में ईंटों का प्रयोग किया जाता था। ईंटों का मिलना इस स्थल को विशेष महत्व प्रदान करता है क्योंकि हड़प्पा संस्कृति के पतन के पश्चात् समस्त उत्तरी भारत में मिट्टी की पकी हुई ईंटों का प्रयोग प्राय: समाप्त हो चुका था। अत: यहां ऐसी मिट्टी की ईंटों का प्राप्त होना आयड़ संस्कृति और उत्तर हड़प्पा निवासियों से सम्बन्धों के होने को निश्चित करता है। बालाथल के मकानों में काली मिट्टी में पीली गाद का मिश्रण कर फर्श का निर्माण किया जाता था। (शोध पत्रिका-वर्ष  ४५-अंक १ पृ. ७४)
प्रारम्भिक ऐतिहासिक काल के बालाथल के अवशेषों में प्रस्तर-मृदा निर्मित भवन संरचनाएं, लौह प्रगलन भट्टिया और लौह उपकरणों का प्रयोग विशेष महत्व रखता है। खुदाई में बस्ती के मध्य भाग में मिली प्राचीर जो शायद उस समय के मुखिया के भवन की सुरक्षा के लिये बनाई गई होगी, अपना विशेष महत्व रखती है। यह दीवार ६० से.मी. के मजबूत आधार पर टिकी है जो पत्थर, मिट्टी तथा ईंट के मिश्रण से बनी है। इस दीवार की दक्षिण दिशा में ऊं चाई ३.२१ मीटर तक मिली है। ऊ परी भाग पर इस दीवार की मजबूती के लिये १.२५ मीटर चौड़ी दीवार भी है जो पत्थर पर काली मिट्टी से युक्त नींव पर बनी है। यहां के भवनों के फर्श उत्तर कालीन गर्त द्वारा नष्ट हो गया है। (Indian Archa logy-1996-97-Review page 93-95)
इस ऐतिहासिक स्तर पर उपलब्ध किलेनुमा प्राचीर के सम्बन्ध में भी अभी तक निश्चित रूप से मत प्रतिपादित करना सम्भव नहीं है। यद्यपि नगरी (मध्यमिका) की सूचनाएं और नहपान-शकराज का नासिक गुहा का अभिलेख यह सोचने को विवश करता है कि मेवाड़ का यह क्षेत्र २०० वर्ष ईसा पूर्व से १०० वर्ष ई. पू. के मध्य अनिवार्यत: निवासित होगा। (शोध पत्रिका-वर्ष ४५-अंक १-पृ.-७४)
आयड़ और बालाथल के मकानों में चूल्हे भी मिले है। इनमें कुछ चूल्हे बड़े भी मिले है। आयड़ के एक मकान में एक साथ सात चूल्हे मिले हैं जो ये दर्शाते है कि यहां बड़े समूहों का भोजन बनता होगा। हो सकता है कि इन मकानों में बड़े परिवार रहते हो जिनके भोजन इन चूल्हों पर बनाये जाते हो। इससे यह भी अनुमान लगाया जा सकता है कि उस काल में संयुक्त कुटुम्ब प्रणाली हुआ करती थी। (क्रमश:)

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