मेवाड़ की धरोहर-१०

प्रागैतिहासिक मेवाड़
मेवाड़ के पुरा पाषाण काल से लेकर ऐतिहासिक युग तक के इतिहास  के विविध पक्षों का अध्ययन किया जा चुका है। अभी तक इस संस्कृति के १०६ स्थान खोजे जा चुके हैं और ४० से अधिक स्थलों का अध्ययन किया जा  चुका है। विद्वानों के अध्ययन से यह स्पष्ट हो चुका है कि मेवाड़ के भूभाग मानव संस्कृति के उषाकाल में ही आवासित हो गये थे जिनका विकास नैसर्गिक ढंग से हुआ था। पुरा पाषाण काल में बागोर में मानव सभ्यता ने पैर पसार दिये थे। उसके पश्चात् इस क्षेत्र में ताम्र-पाषाण संस्कृति का उदय हुआ। भारतीय पुरातत्ववेत्ता इसे ‘आयड़ संस्कृति’ के नाम से पुकारते है।

आघाटपुर-आयड़
उदयपुर नगर के ईशान कोण में राणा प्रतापनगर रेल्वे स्टेशन के समीप आयड़ नदी के तट पर बसी बस्ती के पास प्राचीन नगर के खण्डहर हैं। सन् १९५२-५३ में श्री रतनलाल अग्रवाल के मार्गदर्शन में सबसे पहले इस क्षेत्र का उत्खनन प्रारम्भ हुआ। बाद में दकन कालेज पुणे  और राजस्थान केपुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग के संयुक्त तत्वावधान में सन् १९६१-६२ में उत्खनन हुआ। यह स्थान टीले के रूप में था जिसे स्थानीय लोग ‘धूलकोट’ के नाम से पुकारते हैं। इस खुदाई से प्रतीत होता है कि यह नगर पहले काफी बड़ा रहा होगा जो प्राकृतिक प्रकोपों से ध्वस्त होता रहा और पुन: खड़ा होता रहा। १०वीं शताब्दी में मालवा के परमार राजा भुंज (वाक्यपति राज, अमोघवर्ष) ने इस नगर पर आक्रमण किया और इस नगर को ध्वस्त कर दिया। इससे पूर्व तक यह नगर गुहिलों की राजधानी रहा था। गुहिल शासक अल्लट ने यह राजधानी नागदा से यहां परिवर्तित की थी। (वीर विनोद-प्रथम भाग-पृ. २६८) १०वीं शताब्दी तक यह स्थल धन धान्य से परिपूर्ण था तथा कर्नाटक, मध्यप्रदेश, गुजरात आदि के व्यापारी लोग यहां व्यापार हेतु आते जाते थे। (शोध पत्रिका वर्ष ३५-अंक ३-४ पृ. ५९)
एच.डी. सांकलिया ने परम्परा के अनुसार ‘ताम्वावती’ अथवा ‘ताम्रवती’ नाम बताया है। प्राचीन जैन ग्रन्थों, संस्कृत साहित्य एवं शिलालेखों में इसका नाम आघातपुर या आहपुर लिखा मिलता है। (वही.पृ.५९)
इस काल का दूसरा महत्वपूर्ण स्थान राजसमन्द जिले में गिलूण्ड है जो बनास नदी के तट पर बसा है। इस स्थान का उत्खनन सन् १९५९-६० में श्री बी.बी. लाल के निर्देशन में हुआ। तीसरा महत्वपूर्ण स्थान है बालाथल जो उदयपुर जिले के वल्लभनगर तहसील में स्थित है। यह उदयपुर से उत्तर पूर्व लगभग ४० किलोमीटर दूर है जिसका उत्खनन श्री बी.एम. मिश्र के निर्देशन में १९९३-९४ में हुआ। यह टीला बालाथल गांव के पास है जो तीन हेक्टर क्षेत्र में फैला है। इस टीले का उत्तरी आधा भाग सुरक्षित है तथा दक्षिणी आधा भाग एक स्थानीय कृषक द्वारा समतल कर दिया गया है और इस पर खेती होती है। (पुरातत्व विमर्श-जयनारायण पाण्डेय-पृ.४५१)

आयड़ संस्कृति
इस युग में ताम्बे और पत्थर दोनों के प्रयोग मानव जान चुका था अत: इस संस्कृति को ताम्र-पाषाण संस्कृति कहते है। श्री एच.डी. सांकलिया ने माना है कि इस क्षेत्र की खुदाई में लघु पाषाण उपकरणों का अभाव मिलता है और ताम्र उपकरणों का बहुलता में प्रयोग मिलता है अत: इसे ताम्र पाषाण संस्कृति न कह कर इसे केवल ताम्र संस्कृति कहा जाय तो उचित होगा। (वही-पृ.४६०) उन्होंने इस संस्कृति के अभ्युदय और विकास में बाहर के प्रभावों की ओर संकेत किया है। उनकी मान्यता है कि जो मृदभाण्ड के अवशेष आयड़ में मिले है वे ट्राय (टर्की) नामक पुरास्थल से प्राप्त नमूनों के समान हैं और पशु शीर्ष वाले हत्थों से युक्त हैं वे भी शाह तेपे और तेपे हिसार के नमूनों के समान है। पर ये सभी अभी अध्ययन के विषय हैं। (वही-४६३)
आयड़ की संस्कृति के कालानुक्रम का यदि अध्ययन किया जाय तो उपलब्ध साक्ष्यों को दो श्रेणियों में रखा जा सकता है-प्रथम में वे प्रमाण जिन्हें पुरा तात्विक साक्ष्य कर सकते हैं। दूसरे वर्ग में कतिपय रेडियो कार्बन तिथियां आती है जो इस संस्कृति के लिये निरपेक्ष तिथियां प्रस्तावित करती हैं। (वही-पृ.४५९)
प्रथम आधार पर यह संस्कृति मालवा की संस्कृति से पहले की हैं क्योंकि श्वेत रंग के चित्रित कृष्ण लोहित पात्रखण्ड अधिक संख्या में आयड़ में मिले हैं और चित्रण अभिप्राय से यह विविधता दृष्टिगोचर होती है। आयड़ संस्कृति में इस तरह के प्रथम चरण से अन्तिम चरण तक ये अवशेष मिले है जबकि मालवा में ऐसे पात्र खण्डों का विस्तार निचले स्तरों तक ही सीमित है।
द्वितीय आधार पर आयड़ में ९-९ रेडियो कार्बन तिथियां उपलब्ध है। इसके अनुसार आयड़ संस्कृति की सीमा १७०० वर्ष ई.पू. से १५०० वर्ष ई.पू. है। बालाथल के ताम्र पाथाणिक स्तरों से चार रेडियो कार्बन तिथियां अहमदाबाद स्थित फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी के सौजन्य से प्राप्त हुई हैं। ये ताम्र पाषाणकाल के मध्यवर्ती स्तरों की हैं जो २३५० वर्ष ई.पू. से २३०० वर्ष ईसा पूर्व के मध्य की है जिसका अन्त लगभग १८०० वर्ष ई.पू. हुआ। अत: बालाथल के उद्भव और विकास का समय २३५० वर्ष ई.पू. से १८०० वर्ष ई.पू. का माना जाता है। (क्रमश:)

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