गोरवाड़ गौरव गाथा-70

मुरलीधर मंदिर : घाणेराव
(डॉ. भंवरसिंह राठौड़, घाणेराव के शोध से)
मीरां का आराध्य

राव वीरमदेव जोधपुर के संस्थापक जोधा के पौत्र व मेवाड़ के दामाद थे। मीरां वीरमदेव के भाई रतन सिंह की पुत्री थी। रतन सिंह केवल 12 गांवों का ठाकुर था अतः छोटा जागीरदार था। अतः लोगों का पूछना स्वाभाविक है कि जो मेड़ता की छोटी जागीर (12 गांवों की) का स्वामी था, मेवाड़ाधीश राणा सांगा के राजकुमार भोजराज से उसकी कन्या का संबंध हो गया यह कैसे? वस्तुतः वीरमदेव के मेवाड़ से पूर्व में संबंध थे और जोधपुर के वंश के थे इस कारण अपने ही भाई की रूपगुणवती पुत्री मीरां बाई का संबंध मेवाड़ के राजकुमार भोजराज से कराने में कोई कठिनाई नहीं उठानी पड़ी। अपने लघुभाता रतन सिंह की मृत्यु के पश्चात् वीरमदेव ने मीरां का अपनी पुत्री की भाँति पालन पोषण किया था। राणा सांगा स्वयं भी यह संबंध रखना चाहते थे। आगे के इतिहास में भी हम देखते है कि इस राठौड़ कुल ने मेवाड़ का हर कठिन घड़ी में सहयोग किया था।
मीरां बाई के जन्म स्थान के बारे में भांति होना पूर्व में लिख आये हैं- इसी कारण “रास्ता भूल-पुनः प्रयाण एवं सही मार्ग पकड़ना” एक  लोकोक्ति है। मीरां के भक्ति ग्रंथों में अनेकानेक संतें, भक्तों ने मेड़ता, कुड़की, चौकड़ी आदि स्थानों का उल्लेख किया है।  इतिहासकारें, ख्यातकारों, कुलगुरूओं एवं राणी मुंगाओं की बहियों, चारणों की प्राप्त जानकारी से भी जन्म स्थान के नाम प्राप्त होते हैं। श्री कल्याण सिंह शेखावत जी ने भी पूरी लगन से वर्तमान नागौर जिले के डेगाना कस्बे से 9-10 कि.मी. दक्षिण-पूर्व में स्थित, जो बाजोली बीजारण नाम से जाना जाता है,  ग्राम को मीरां का जन्म स्थान माना है।
बीजारण तो खंडहर में परिणित विद्यमान है। बालोली गांव आज भी आबाद है-राव दूदा के वंशज माधोदास मेड़तियां का वहीं निवास है। मीरां के पिता राव रतनसिंह को पिता दूदा ने बाजोली व कुड़की सहित 12 गांव जागीर में दिये थे। रतनसिंह ने सर्वप्रथम बाजोली गांव में ही निवास कर अपने गांवों की देखभाल की थी। उस समय व्यापार की मण्डी थी, वहां बहुत सी दुकानें थी। बाजोली में धूलकोट मिट्टी का दुर्ग बना था जिसके पुराअवशेष दिखाई देते है।
वि.सं 1555 में भक्त आत्मा मीरांबाई का जन्म हुआ, गुरू द्वारा ज्ञात हुआ कि मीरां का जन्म मूल नक्षत्र में है, इस संतान से माता-िपता के लिये `भारी’ (घातक) मानकर दान दक्षिणा दी गई। मीसण शाखा के चारणों को राव रतन द्वारा `रतनास’ गांव भी दान दिया था। यह बाजोली से 1 कोस (3 किमी.) दूर पर है।
नैनसी द्वारा रतनास के सन्दर्भ में उल्लेखः “रा. रतनसी दूदावत रौ दत, चारण डाहवत रतना’ मीसण नुं। पछै रा सुरतांण जैमलोत मीसण कानो। डरौ ले ने बाहारेट (बारहठ) चुतरा जैमलोत नूं दीयौ। पछै चुत आधो गांव आपरी बेन मीसणदांना गांगावत नुं परणाई थी तिणनुं दीयौ ने आधौ आप राखीयौ।”
बाजोली एवं कुड़की सहित 12 गांव राव दूदा ने मीरांबाई के जन्म के पूर्व ही जागीर में दे दिये थे। नैनसी  `बाजोली दूदा जोधावत रौ दत।’ बाजोली के अतिरिक्त नींबाडी, फलडी, आकोदिया, आवाआकोदा, हफधर, नूंद गांव उनके अधीन थे। यह लिखना कि रतन सिंह को कुड़की राव वीरमदेव ने वि.सं 1572 के पश्चात् दिया इतिहास सम्मत नहीं है।
बाजोली “धूलकोट” में मीरां के उपास्यदेव `सालगराम’ के मंदिर के अवशेष दिखाये गये थे। यह मंदिर मीरांबाई के जन्म के समय में बना हुआ माना जाता है। कोई शिलालेख उपलब्ध नहीं है। यह सालगराम (श्यामरंग के गोल चिकने पत्थर के रूप में पूजा जाने वाले कृष्ण) धूलकोट परकोटे के बाहर स्थित चारभुजा के मंदिर में रख दिये गए है। देखने में यह मंदिर प्राचीन है जिसका जीर्णोद्धार करवाया गया था। मंदिर में “श्रीचारभुजा नाथ” की मूर्ति तथा “ सालगराम” रखे गये है। लोक धारणा-सालगराम मीरां के उपास्य देव है। (क्रमशः)

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