गोरवाड़ गौरव गाथा-७५

मीरां के आराध्य मुरलीधर मंदिर-घाणेराव
डा. भंवरसिंह राठौड़ ‘घाणेराव’

पूर्व में मीरा के जीवन गाथा के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला गया था। उनके प्रारम्भिक जीवन, उनका लालन पालन आदि के बारे में जानकारी दी गई थी। विवाह के पूर्व तक वह अपने दादा जी के पास रही। वह दूदाजी के चतुर्थ पुत्र रतनसिंह की एकमात्र संतान थी। पूर्व में मेड़ता मारवाड़ राज्य का ही अंग था। जोधपुर के संस्थापक जोधा का एक पुत्र दूदा भी था, जो मीरां का दादा था। दूदा का जन्म १४९७ संवत् में हुआ था। उसने संवत् १५१८-१९ में मेड़ता राज्य की अलग से स्थापना की और वह उसका स्वामी बना। दूदा का जेष्ठ पुत्र वीरमदेव हुआ जिसका जन्म संवत् १५३४ में हुआ था। वीरमदेव मीरां का ताऊ  था जो मीरां से लगभग २१ वर्ष बड़ा था। राव दूदा का देहावसान वि.सं. १५७२ में हुआ उस समय वीरमदेव ३८ वर्ष का था और मेड़ता का स्वामी बना।
मेवाड़ का मारवाड़ और मेड़ता से पुराना सम्बन्ध था। दूदा के समय मेवाड़ पर राणा रायमल (सांगा के पिता) का शासन था। उनकी सुपुत्री गोरज्या कुमारी का सम्बन्ध दूदा के सुपुत्र वीरमदेव से किया गया था। इनका विवाह वि.सं. १५५३ में (मीरां के जन्म से पूव) हुआ था। इस प्रकार गोरज्या कुमारी सांगा की बहन और वीरमदेव सांगा का बहनोई था।
राजपूताना के इतिहास को उजागर करने वाले कर्नल टॉड़ ने कुछ बातें ऐसी लिखी हैं जिससे इतिहास में भ्रान्तियां खड़ी हो गई थी। उनमें से एक यह बात भी थी कि मीरां महाराणा कुम्भा की पत्नी थी। महाराणा कुम्भा मोकल का जेष्ठ पुत्र था और मेवाड़ की गद्दी पर वि.सं. १४९० में बैठा था और लगभग ३५ वर्ष तक शासन करने के पश्चात् वि.सं. १५२५ में उसकी मृत्यु हो गई। उसके देहावसान के लगभग ९ वर्ष पश्चात् वीरमदेव का जन्म हुआ जो दूदा का जेष्ठ पुत्र था जबकि मीरां का पिता रतनसिंह दूदा का चतुर्थ पुत्र था और मीरां का जन्म तो वि.सं. १५५५ में बताया जाता है। ऐसी दशा में मीरां बाई का महाराणा कुम्भा की राणी होना सर्वथा असम्भव है।
महाराणा सांगा का जेष्ठ पुत्र भोजराज था। गौरीशंकर हीराचन्द ओझा ने उन्हें युवराज बताया है। उनके अनुसार, जिसे सभी इतिहासकारों ने भी मान्यता दी है, भोजराज का विवाह मेड़ते के राव वीरदमदेव के भाई रतनसिंह की पुत्री मीरां बाई के साथ हुआ। यह विवाह वि.सं. १५७३ में हुआ। पर विधि का विधान कुछ और था। महाराणा सांगा के जीवित दशा में ही भोजराज का देहावसान हो गया। विवाह के लगभग ७ वर्ष पश्चात् अर्थात् वि.सं. १५८० में ही यह दुर्घटना घटी। मीरां तो पूर्व में ही कृष्ण भक्ति में लीन थी, वह अब पूर्ण रूप से कृष्ण भक्ति में ही रम गई। उसके लिये तो सर्वस्व था-‘मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरो न काई।’
महाराणा सांगा का देहावसान भी वि.सं. १५८४ में हो गया। सांगा के बाद रत्नसिंह भी चार वर्ष तक शासन कर सका। वि.सं. १५८८ में विक्रम मेवाड़ के महारणा बने। उसने मीरां को बड़े कष्ट दिये जिसका वर्णन मीरां के पदों में भी मिलता है। मीरां तो इन तकलीफों से ऊ पर उठ चुकी थी अत: वि.सं. १५९१ में वह चित्तौड़ छोड़ कर मेड़ता चली गई। यहां वह तब तक रही जब तक मेड़ता पर जोधपुर के राजा मालदेव ने अधिकार नहीं कर लिया। मालदेव ने वीरमदेव से वि.सं. १५९३-९४ मेड़ता छीन लिया। मीरां बाई तब तीर्थ यात्रा पर निकल गई। वह अजमेर होती हुई वृन्दावन पहुंची वहां उसका प्रवास वि.सं. १५९५ से १५९७ तक रहा। यहां से यात्रा करती हुई मीरां बाई द्वारिका में वि.सं. १५९७ में पहुंची। ऐसी मान्यता है कि मीरां वि.सं. १६०४ में द्वारिकाधीश के विग्रह में विलीन हो गई।
मीरा के पिता का देहान्त तो पहले ही हो चुका था अत: मीरां का ध्यान विवाह के बाद वीरमदेव ने ही रखा। वह प्रबल पराक्रमी, सुदृढ़-देहधारी, बुद्धिमान, निपुण राजनीतिज्ञ व प्रतापी नरेश था। उसने अपने पराक्रम से अजमेर को वि.सं. १५९२ में तथा वि.सं. १५९३-९४ में चाटस् पर अधिकार कर लिया। अपने जीवन काल में उसने मालदेव से मेड़ता को अपने अधिकार में ले लिया था। वि.सं. १६०० में वीरमदेव के देहावसान के पश्चात् उसका जेष्ठ पुत्र जयमल गद्दी पर बैठा।

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