गोडवाड़ गौरव गाथा-61

तेरापंथ के तीन तीर्थ
भारत के कोने कोने में फैले हुए जैन तेरापंथ समाज का उद्गम स्थान पाली-गोडवाड़ होने का सौभाग्य मिला है क्योंकि तेरापंथ के प्रवर्तक आचार्य भिक्षु का जन्म इसी प्रदेश के ग्राम कण्टालिया में हुआ था इसी कारण ग्राम कण्टालिया एक तीर्थ बन कर पूरे भारत में प्रसिद्धि प्राप्त कर सका। इसके पश्चात संत भिक्षु ने अपने आचार्य से विचार भेद के कारण बगड़ी से अभिनिष्क्रमण किया रात्रि में जेतसिंह जी की छतरी में आकर ठहरे तो बगड़ी ग्राम ने भी एक तीर्थ का दर्जा प्राप्त कर लिया। इसी प्रकार आचार्य भिक्षु की निर्वाण स्थली भी इस प्रदेश में होने से सिरयाली गांव को सौभाग्य प्राप्त हुआ। यह गांव एक तीर्थ के रूप में उभर कर सामने आया। अब ये तीनों स्थान तेरापंथ समाज के तीर्थ बन गये।
जन्म स्थान-कण्टालिया ः संत भिक्षु का जन्म वि.सं. 1782 आषाढ़ शुक्ला त्रयोदशी को कण्टालिया गांव में हुआ। उनके पिता का नाम बलूजी सकलेचा तथा माता का नाम दीपा बाई था। कहते हैं जब वे गर्भ में आये तब माता दीपा बाई को एक रात स्वप्न में शक्तिशाली सिंह दिखाई दिया था जो इस बात का सूचक माना जाता है कि गर्भस्थ बालक  पराक्रमी और आयु प्रवर्तक होगा। जन्म के समय इसकी तेजस्विता के कारण ही इस का नाम भीखण (भीषण) रखा गया।
भीखण (िभक्षु) का बाल्यकाल सुख पूर्वक बीता। उनकी शिक्षा गांव की साधारण पोशाल में हुई। बचपन से ही बालक भीखण कुशाग्र एवं बुद्धिमान था इस कारण अध्ययन में भी अग्रणी था। धार्मिक अध्ययन के साथ-साथ वह महाजनी विद्या में भी निपुण हो गया, अतः व्यवसाय के कार्य को समझने में उसे देर न लगी। विवाह योग्य होने पर उनका विवाह बगड़ी गांव के बांठिया परिवार की कन्या के साथ हुआ उससे एक पुत्री का भी जन्म हुआ। फिर अचानक उनके जीवन में और विचारों  में परिवर्तन आया।
दीक्षा व ज्ञान स्थान बगड़ी ः विचारों में परिवर्तन के कारण सांसारिक जीवन के प्रति उनकी उदासीनता बढ़ती चली गई। उनकी अन्तरचेतना जाग उठी। उनका मन प्रवज्या लेने के लिये प्रबल हो उठा। पत्नी की आकस्मिक मृत्यु ने उनकी इस इच्छा को वेग दिया और छब्बीस वर्ष की अवस्था में वि.सं. 1808 में स्थानकवासी परम्परा मं बगड़ी ग्राम में आचार्य रघुनाथ के पास दीक्षित हुए। अब वे स्वामी भीखण कहलाने लगे। शात्रों के गंभीर मनन और सत्यान्वेषी मानस ने शीघ ही उन्हें गंभीर चिंतक बना दिया। आचार्य रघुनाथ को भी अपने मेधावी एवं सात्विक शिष्य पर गर्व था। भिक्षु स्वामी स्वभाव से विनम्र, सत्याग्रही व निश्छल थे। किसी भी समस्या के समाधान के लिये आचार्य प्रवर भिक्षु स्वामी को ही बुलाते थे।
दीक्षा के सात वर्ष पश्चात एक अद्भुत घटना घटी जिसमें क्रान्ति बिम्ब उभर आया। स्वामी के सम्मुख राजनगर के श्रावकों ने साधु समाज के अचार विचार की दयनीय स्थिति रखी और कहा- ‘जहां मर्यादाओं का खुलेआम उल्लंघन होता हो, जहां शुद्ध आचार न हो, जहां आपमें शुद्ध श्रद्धा न हो तो श्रावक वन्दन करें तो किस लिये।’ स्वामीजी को यह बात घर कर गई।
वि.सं. 1815 के राजनगर चतुर्मास से लेकर विक्रम संवत 1817 के चैत्र शुक्ला नवमी तक प्रायः एक वर्ष पांच महीने व्यतीत हो गये पर स्वामी जी आचार्य रघुनाथजी को उक्त बात समझा न सके। तब स्वामी जी विचार किया ‘आत्मकल्याण के जिस महान उद्देश्य से घर बार छोड़ कर मैं यहां दीक्षित हुआ, उसकी कुछ भी पूर्ति नहीं हो पा रही है। इस स्थिति में संघ के व्यामोह में फंसकर निरूद्देश्य यहां बैठे रहना मेरे लिये शोभास्पद नहीं हो सकता। मुझे आत्मकल्याणद को प्राथमिकता देनी चाहिये।’
इस विचार ने धर्म के क्षेत्र में धार्मिक शिथिलता के विरूद्ध एक क्रान्ति का बीज बोकर जैन मत के विकास क्रम में गौरवास्पद भूमिका का निर्वहन करते हुए स्वामी भिक्षु संघ से अलग हो गये। उनके साथ उस समय केवल चार संत ही थे। भिक्षु के अलग होते ही विशेष विरोध का तूफान उठा, भिक्षु को ठहरने के लिये स्थान और भोजन पानी न देने के लिये पंचों ने नियम बनाये। संत के ठहरने के लिये गांव में कही स्थान नहीं मिला। उन्होंने पहला वास बगड़ी गांव के बाहर श्मशान भूमि में किया। रात्रि विश्राम जेतसिंह जी की छतरी में किया जो आज भी संत भिक्षु के कष्ट-सहिष्णुता की गाथा गा रहा है। (क्रमशः)
डा. भंवरसिंह राठौड़

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