गोडवाड़ की गौरव गाथा-72

मीरां के आराध्य
मुरलीधर मंदिर घाणेराव

पूर्व में स्पष्ट वर्णन कर चुके हैं कि –
(1) गिरधर गोपाल की पहली मूर्ति जो सदैव मीरां के साथ रहा करती थी।
(2) दूसरी मूर्ति सम्वत 1624 चित्तौड़ दुर्ग की जो भगवंतदासजी के पुत्र मानसिंह ने आंबेर भिजवा दी थी।
(3) पुरोहित हरिनारायणजी के प्रतिष्ठाचार्यत्व में उदयपुर के जगदीश मंदिर में महाराणा जगतसिंहजी प्रथम ने मूर्ति पधराई वह मीरां वाली  की ही थी ।
(4) नूरपुर पंजाब का राजा बासू जब चित्तौड़ पर चढ़कर आया-मांगने पर राणाजी ने वह मूर्ति राजा बासू को दे दी थी । जिसे नूरपुर में स्थापित किया गया ।
उक्त विवरण से जो तथ्य स्पष्ट होते है, उनके अनुसार मीरांबाई ने विक्रमी संवत 1992 से पूर्व ही चित्तौड़ छोड़ दिया था और पुनः कभी वहां नहीं गई। मीरा का वि.सं. 1604 में द्वारिका में स्वर्गवास हो गया था। तब उसकी मृत्यु के 20 वर्ष पश्चात 1624 में गिरधर गोपाल की मूर्ति का चित्तौड़ में आमेर के शासकों का उसे अकबर से प्राप्त करना- इतिहास तथ्यों के सम्मत में नहीं लगता ।
नूरपुर (पंजाब) के नरेश राजा बासु तंवर ने 1669 में मेवाड़ पर चढ़ाई  की । प्रसंगोंचित्त-गौरीशंकर ओझा के अनुसार “मीरां समय के 65 वर्ष बाद बादशाह जहांगीर की आज्ञा से यह चढ़ाई की थी। तब राजा बासु ने मीरां की सेवा की प्रतिमा को अलभ्य मानकर उसे प्राप्त करने के लोभ से सारी शत्रुता भुलाकर और अपने मालिक बादशाह के कोप का भी विचार न करके राणा से मित्रता कर ली। पुरोहित को भेजकर “ब्रजराज“ नामक प्रतिमा राणा अमर सिंह से सहृदयतापूर्वक प्राप्त कर ली ।”
देवीसिंह मंडावा का मत इस प्रकार कि मीरां की उपास्य मूर्ति मेड़ता के चतुर्भुज जी के मंदिरों में, दूसरी नूरपुर के गिरी दुर्ग में, मुरलीधरजी के विशाल देवालय में प्रतिष्ठित है।
मुख्य तथ्यात्मक बातें भी आपके सामने प्रस्तुत है कि-
1. वि.सं. 1580 में कुंवर भोजराज का देहान्त होने के पश्चात मीरां का वैवाहिक सुखी जीवन समाप्त हो गया।
2. संवत 1584 में राव रतनसिंह की मृत्यु से मीरां को दूसरा आघात लगा।
मीरां 8 वर्ष तक द्वारिका में रही । संवत 1595 में मेडता पर मालदेव के आक्रमण के बाद मीरां वृन्दावन और संवत 1600 में द्वारका को चली गई।
मालदेव ने संवत 1588 में मेडता वीरमदेव से लिया। संवत 1613 में  जैमल से मेड़ता लिया ।
राव वीरमदेव का स्वर्गवास सं. 1600 (ई. सन 1544 फरवरी में) हुआ।  वीर जयमल वीरमदेवोत मेडतिया 11 भाइयों में बड़ा था । जन्म वि.सं. 1564 अश्विनी शुक्ला 11 (17 सित. 1507) में हुआ था। वीरमदेव के देहान्त बाद उत्तराधिकारी के रूप में जयमल हुआ । मीरां बाई राव जयमल के पिता के छोटे भाई रतनसी की कन्या थी, जो जयमल की चचेरी बहन थी और नौ वर्ष उनसे बड़ी थी। इस दोनों बहिन-भाई में अत्यन्त स्नेहभाव था । दोनों भाई-बहन सगुण वैष्णव भक्तों के रूप में भक्ति जगत में प्रसिद्ध हो चुके थे । दोनों में अनेक दिव्य गुण थे । रामेश्वर, द्वारका, जगदीशपुरी आदि में दोनों की प्रतिमाएं स्थापित होकर साधु-संतों-हरिभक्तों और सर्व साधारण द्वारा देवपूजा होने लगी और अब तक वे मूर्तियां विद्यमान हैं। (क्रमशः)
डा. भंवरसिंह राठौड़, `घाणेराव’

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