गोडवाड़ की गौरव गाथा-71

मीरां का आराध्य मुरलीधर मंदिर घाणेराव
डा. भंवरसिंह राठौड़ `घाणेराव’
मीरा के मुरलीधर (िगरधर) भक्ति एवं शिक्षा पंडित के बारे में विदित होना प्रासंगिक ही होगा। यह सत्य है कि इनकी शिक्षा पंडित गजाधर राय की देख-रेख में हुई। राव दूदा ने इस कार्य के लिये नियुक्त किया था। यह गुर्जर गौड़ ब्राह्मण थे। इनको व्यास की उपाधि मीरां बाई ने दी थी। गुरू इसको धार्मिक कथाएं, श्री मद्भागवत पुराण अन्य धर्म ग्रंथों का ज्ञान कराया करते थे। पद, रचना, नृत्य, संगीत की शिक्षा भी मीरांबाई को दी गई थी। निर्विवाद सत्य है कि मीरांबाई गजाधर व्यास को अपने विवाह के उपरांत चित्तौड़ लेकर गई थी। गुरू को मांडलपुर के परगने में भूमि का दान पत्र भी दिया था। यह कुछ वर्षों पहले इनके वंशजों के पास होना बताया गया था।
ठाकुर चतुरसिंह रूपाहेली द्वारा राजकुमारी मीरां के पीहर में वंशज ईश्वर भक्ति में लीन राव दूदाजी, वीरमदेवजी और जैमलजी परम वैष्णव थे। राव दूदाजी के पास रहने से बाल्यावस्था से ही कुमारी मीरां बाई परम भक्त बन गई। गुर्जर गौड़ ब्राह्मणों की ख्यातों तथा प्रमाणित लेख से ज्ञात होता है कि राव दूदाजी की आज्ञा से गुर्जर गौड़ गजाधर जो काट्या तिवाड़ी शाखा का था, राजकुमारी मीरां को पढ़ाने पर नियुक्त हुआ थ। यही ज्ञाता पाठ-पूजा अर्चना भी करता था। मीरां को विविध कथाएं, पुराण, स्मृतियां भी सुनाया करता था। जिससे प्रबल जिज्ञासु मीरां थोड़े ही वर्षों में पूर्ण विदुषी और पंडिता हो गई। विवाह पश्चात गुरू को चित्तौड़ ले गई। मीरां के पतिदेव के स्वर्गवास के पश्चात मीरां-कल्याण-साधना के निमित चित्तौड़ पर (दुर्ग में) श्री मुरली मनोहर (घर) का मंदिर बनवा कर उसकी सेवा-पूजा का समस्त भार पं. गजाधर को दे दिया। इस निमित बहुत सा धन, दो हजार बीघा सिंचाई योग्य जमीन मांडल तथा कस्बों में प्रदत्त की गई जो आज तक उनके वंशजों के अधिकार में है। पंडित को मीरां ने व्यास की पदवी तथा व्यासासन भी प्रदान किया था, जो उसके वंशजों को आज भी प्राप्त है। (मुरलीधर मंदिर का वृतान्त आगे वर्णित होगा) दानपत्र मांडलपुर में किसी वंशज के पास है, यह शोध का विषय है। यह मिल जावे तो अनेक नवीन, ऐतिहासिक बातों का संतोषप्रद प्रमाण एवं पता लग सकता है।
एक अन्य तथ्य में मीरां बाई के पदों में जिसे `म्हारो जुना जोगी’ के रूप में सम्बोधन मिलता है (वह दाहिमा जमना आसोप डा. कल्याण सिंह शेखावत ) है। इसे राव दूदा ने राज ज्योतिष बनाया था। यह जोशी वेश परम वैष्णव था, जिसकी छाप दूदा तथा इसके कुल में उत्पन्न मीरां पर भी पड़ी।
मीरां ने संत रैदास को गुरू माना है, ऐसा कुछ विद्वानों का मत है। यह विषय विवादास्पद है। चूंकि ये दोनों समकालीन थे या नहीं और वे चित्तौड़ भी गये थे ? मीरां बाई से भेंट हुई थी? यह भी खोज का विषय है। विदित हुआ कि रैदास की स्मृति में एक छत्री कुमश्याम के मंदिर (िचत्तौड़) के कोने में बनी हुई बतलाई जाती है। उस पर कोई शिलालेख या निर्माणकर्ता का स्मृति पट्ट नहीं है। (क्रमशः)

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