गोडवाड़ की गौरव गाथा-69

मीरां का आराध्य
मुरलीधर  मंदिर घाणेराव

यह समर वि.सं. 1584 में हुआ था। भोजराज द्वारा प्रश्रय दी गई मीरां को उनके मृत्यु उपरांत महाराणा विक्रमादित्य द्वारा मीरां प्रताड़ित की गई, फिर भी वह अपने भक्ति भाव में लगी रही तथा चित्तौड़ के द्वितीय जौहर शाके के पूर्व ही चित्तौड़ छोड़ कर वहां से चली आई। वि.सं. 1593 (ई.स.1536) में राव मालदेव द्वारा मीरां के बड़े पिता वीरमदेव को मेड़ता से निष्कासित करने पर ही मीरां पहले वृन्दावन फिर शेष जीवन द्वारिकापुरी में व्यतीत करते हुए अपने आराध्यदेव श्री गोपाल की ज्योति में सशरीर ही समा गई।
मीरांबाई के सम्पूर्ण जीवन की घटनाएं इतनी छितराई हुई है कि उन्हें एकत्रित कर पामाणिक जीवनवृत लिपिबद्ध करना कठिन कार्य है किन्तु असंभव नहीं है। मीरां के जीवनवृत पर जो सामग्री प्रकाश में आई है उससे स्पष्ट होता है कि इतिहासकार एक सीमित दृष्टि रखकर मान्यताएं प्रस्तुत करता रहा है। राजस्थानी साहित्य में उपलब्ध सामग्री का उपयोग नहीं करता रहा है। इस प्रकार साहित्यकारों, भक्तों-संतों एवं सामान्य जन का मीरांबाई संबंधी ज्ञान एक तरफा या अपूर्ण है। कुछ विदेशी विद्वान जो राजस्थान की संस्कृति-धार्मिक, सांस्कृतिक परम्पराओं को नहीं जानते थे, न ही उन्हें इस प्रदेश के इतिहास का पूर्ण ज्ञान था। अतः ऐसे लेखकों ने भी अपने लेखन में मीरांबाई संबंधी भमात्मक फैलावट की जिनमें कर्नल टाड, जोर्ज ए ग्रियसन, विल्सन, कैलंग जैसों का भी हाथ रहा हे। मीरां का उल्लेख कहीं न कहीं अप्रमाणिकता से पुष्ठित है, इस तरह एक विवाद का सूत्रपात हुआ। हमारे कविराजा श्यामलदास ने भी दो परस्पर विरोधी बातें लिखी कविवर सूर्यमल मिश्रण के काव्यग्रंथ, नैनसी ख्यात, लाला रामदास के भीमप्रकाश, सारदा, मुंशी देवी प्रसाद, कितने ग्रंथों में सामग्री उपलब्ध तो है इस पर शोधन एवं अनुसंधानपरक चिन्तन की पर्याप्त आवश्यकता है।
मेवाड़ के शासक राणा रायमल (मोकलोत) की राजकन्या एवं महाराणा सांगा (रायमलोत) की बहन गोरज्या से मेडताधीश राव वीरमदेव का विवाह हुआ था। महाराणा सांगा (संग्रामसिंह) के कुंवर भोजराज के साथ राव वीरमदेव के छोटे भाई रतनसी की पुत्री मीरांबाई का विवाह हुआ था। मेवाड़ व मारवाड़ (मेड़ता) के शासक परस्पर सगे संबंधी हुए।
पूर्व लेखन में `जगत शिरोमणी’ जयपुर राज्य घराने के अन्तर्गत मंदिर का उल्लेख किया गया। इसके पृष्ठभूमि में अमरसर (शंखावटी) के शासक एवं शेखावत शाखा के संस्थापक राव शेखा (मोकलोत) के पौत्र रायमल शेखावत के पुत्र सूजा (रायमलोत) का मेड़ता के स्वामी राव वीरमदेव के छोटे भाई (रेण के स्वामी) रायमल दूदावत से विवाह हुआ था। इस प्रकार अमरसर के शेखावत भी सगे-संबंधी हुए। जयपुर  के रानावत (कछवाह) भी मेड़ता के संबंधी ही हुए। इस प्रकार राव वीरमदेव का मेड़ता व अजमेर छूटने पर अमरसर के राय (शेखावत) के अतिथि बने थे, छः माह तक वहां रहे थे।
महाराणा सांगा ने भी मेड़ता को महत्व दिया, मेड़ता की राजकन्या मीरांबाई को अपनी पुत्रवधु बनाकर, संबंधों को नवीनीकरण कर पुष्ट किया। सांगा दूरदर्शी शासक, विख्यात योद्धा, कुशल नीतिज्ञ व मेडता के महत्त्व को भली प्रकार समझने वाला था, इसी कारण मड़डता के रणबांकुरे वीरों की तलवारें महाराणा के प्रत्येक युद्ध में चमकती रही, मेड़तिया वीरों ने ढाल बन कर महाराणाओं की रक्षा का उत्तरदायित्व भी संभाला। अकेले राव वीरमदेव ने राठौड़ शाखा के कई वीरों के साथ 18 युद्धों में भाग लिया। इसी कारण गौरज्या पुत्र प्रतापसिंह (वीरमदेवोत) एवं अग्रज राव जयमल ने वि.सं. 1624 ई. में चित्तौड़ रक्षा हेतु अपने प्राण दे दिये। (क्रमशः)
(भंवरसिंह राठौड़, घाणेराव के शोध से)

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