गोडवाड़ की गौरव गाथा-67

मीरा का आराध्य मुरलीधरजी मन्दिर `घाणेराव’
मीरां के उपास्य मूर्ति के बारे में अनेक प्रस्तुतीकरण करणों के आलेख है, जिसमें मीरां के उपास्य मूर्ति राणा अमरसिंह ने दे दी थी- इस प्रकार उदयपुर के राजमहलों तथा आमेर के जगत शिरोमणी मंदिर में पंडित झावरमल शर्मा ने इस विवाद पर अपने लेख में दो और मूर्तियों का उल्लेख किया है, जिन्हें मीरां का उपास्य माना जाता है। इनमें से एक उत्तर प्रदेश में फतहपुर जिले में शिवराजपुर नामक ग्राम में विराजमान है। शिवराजपुर के वृद्ध जानकार लोगों के अनुसार यह मूर्ति अब से कोई चार सौ वर्ष पूर्व वहां लाई गई थी और इसके मंदिर के जीर्णोद्धार के लिये कानपुर की सनातन धर्म प्रवर्दिनी सभा ने 1910 ई. में हिन्दी समाचार पत्रों में एक आपत्ति भी प्रकाशित कराई थी। कहा जाता है कि मीरा के परमपद प्राप्त करने के अनन्तर उसके सेवक को प्रेरणा प्राप्त हुई और उसने मूर्ति को काशी ले जाने के लिए प्रस्थान किया, शिवराजपुर पहुंचने पर मूर्ति वहीं अटक गई, आगे जाने के लिये तैयार नहीं हुई । तभी से वह प्रतिमा मीरांबाई व गिरधर गोपाल के नाम से वहां प्रतिष्ठित है। एक बार ग्वालियर राज्य के खजांची और मथुरा के मशहूर द्वारिकाधीश मंदिर के सेठ लक्ष्मणदास ने भी इस मूर्ति को मथुरा ले जाने, वहां उपर्युक्त मंदिर में विराजमान करने का प्रयत्न किया था, किन्तु मूर्ति वहां से नहीं ले जाई जा सकी। इस मूर्ति को लेकर तब प्रयाग के `अभ्युदय’ और बंबई के `श्री वेडक्टेश्वर समाचार’ में बहुत कुछ चर्चा हुई थी। `अभ्युदय` ने 1910 को जब इसके मंदिर के जीर्णोद्धार की अपील प्रकाशित की तो `श्री वेडक्टेश्वर समाचार में’ इतिहास प्रेमी के नाम से 20 मई के अंक में इसका विरोध किया गया। किन्तु 7 जुलाई 1910 को `अभ्युदय में ही जब राजस्थान के इतिहासकार मुंशी देवीप्रसाद और 24 जुलाई को डा. गौरीशंकर हीराचंद ओझा के अभिमत प्रकाशित हुए तो विवाद शिवराजपुर की प्रतिमा के पक्ष में ही जाता लगा पं. झाबरमल शर्मा को इस विवाद का स्मरण 1983 में अपनी मृत्युपर्यन्त था और उन्होंने श्री `मरू भारती’ के अपने लेख में `वृहत काव्य-दोहन (भाग सप्तम) के मीरां बाई के जीवन-वृतांत से यह पंक्तियां भी उद्धृत की है जो 1911 ई.  में तनसुखराम-मनसुखराम त्रिपाठी ने लिखी थी।
`उदयपुर मां रणछोड़जी की मूर्ति सह मीरां बाई की मूर्ति पूजाय छे-एम कहिवाय छे पण त्यां कोई पण मंदिर के मूर्ति गिरधर गोपालजी न थी` अर्थात उदयपुर में रणछोड़जी की मूर्ति के साथ मीरांबाई की मूर्ति पूजी जाती है,  ऐसा कहा जाता है, किन्तु वहां कोई मूर्ति या गिरधर गोपाल का कोई मंदिर नहीं है। उदयपुर, आमेर और शिवराजपुर की मूर्तियों के बाद चौथी मूर्ति नुरपुर में राजा वासु के मंदिर में है, जिसके लिये भी कहा जाता है कि  वह मीरांबाई के उपास्य ठाकुर की है। तंवर वंशीय क्षत्रिय राजा वासु मरू और पठानकोट के इलाके के बीच के इलाके के स्वामी थे। उसने टोडरमल की सलाह से बादशाह की अधीनता स्वीकार की थी और जहांगीर ने उसे साढ़े तीन हजारी मनसव अता किया था, मेवाड़ के राजकीय इतिहास `वीर विनोद’ में कविराजा श्यामलदास ने लिखा है कि 1611 ई. में जब जहांगीर ने अब्दुलाखां को गुजरात की सूबेदारी पर भेजा तो मेवाड़ लड़ाई पर उसके एवज राजा बासू (वासु) को रवाना किया गया। `वीर विनोद’ में हमारे संदर्भ की दिलचस्प टिप्पणी इस प्रकार है ।
`राजा दिलीप से जब दिल्ली की राजधानी छूटी और उनके पुत्र जैतपाल भेटने नूरपुर को अपनी राजधानी बनाया, उससे 24 पीढ़ी में राजा बासू हुआ, जो बादशाह जहांगीर के भेजने से अपने प्रधान पुरोहित व्यास समेत चित्तौड. आया। उस समय राजा बासू ने महाराणा अमरसिंह से एक मूर्ति, जो अब नूरपुर (कांगड़ा) के किले में ब्रजराज स्वामी के नाम से प्रसिद्ध है और मीरां बाई की पूजी हुई बताते हैं, मांगी इस पर महाराणा ने उनके प्रधान पुरोहित व्यास को वह मूर्ति एक ग्राम समेत संकल्प करके दे दी । इसमें मालूम होता है कि महाराणा अमरसिंह से राजा वासु मिल गया था। संकल्पित ग्राम के ताम्रपत्र में जिसकी नकल भी `वीर विनोद’ में दी गई है, इस ग्राम का नाम रेवल्या के पास `झीत्या’ बताया गया है। ताम्रपत्र वि.सं. 1669 का है’ डा. गौरीशंकर ओझा ने भी राजा वासु के पुरोहित को मूर्ति और `झीत्या` नामक गांव दिये जाने की बात लिखी है। (क्रमशः)
डा. भंवरसिंह राठौड़ `घाणेराव  (पाली)’

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