गोडवाड़ की गौरव गाथा-64

“श्री आदेशवर” “आदिनाथ” मंदिर
पश्चिमी रेल्वे से फालना-चारभुजा गढबोर राजमार्ग 14 पथ पर सादड़ी से सात कि.मी. दूर “श्री छोड़ा आदिनाथ” मार्ग प्रवेश द्वारा से पांच कि.मी. दूर उत्तर की ओर छोड़ा ग्राम के लिए डमरीकृत मार्ग से सुविधा साधन द्वारा इस स्थान पर पहुंचना होता है। यह स्थान चारों तरफ प्राचीन अवशेष नग्न पहाड़ियों के बीच इस ग्राम के पूर्वी छोर पर मंदिर के रूप में दूर से ही दृष्टिगोचर होता है। समीप जाने पर यह मंदिर तीन ओर से पहाड़ियों के बीच सुरम्य स्थल पर ऐसा प्रतीत होता है मानो देवराज इन्द्र के नन्दकानन में कोई भव्य शिल्प का अद्भुत करिश्मा उतर आया हो। सुन्दर सोनाना पत्थर से निर्मित शिल्प की अद्भुत कारीगरी का छेनी की बारिकियां जीवंत सी दृश्य उपस्थित करती है। चारों तरफ से चहदिवारी युक्त मंदिर त्रिवेणी जैन मंदिर जैन धर्म की आस्था का स्थल के रूप में प्रसिद्ध है। ऊं चे चबूतरे पर मंदिर के चौकोर स्थल पर मंदिर सुबह दिखाई देता है। गर्भ द्वारा के आंगण से पश्चिमीनिभुख श्री आदिनाथ मंदिर श्वेत प्रतिमा की भव्य मूर्ति (िजनबिंब) के दर्शन कर मन मुग्ध हो उठता है। पद्मासन में कानन कुंडल सिर पर स्वर्णमय ताज से दमकता तेजस्वी आभायुक्त प्रभावमय, आध्यात्मिक प्रकृतिकृत वातायन से मन रंजित होकर आनन्द रस प्राप्त होता है। इनके साथ ही इसी प्रांगण में भगवान पद्मप्रभुजी की भव्य दिव्य दर्शन से चंचल मन स्थिर होकर एकाग्रचित हो उठता है।
इसी आदिनाथ के बांयी ओर स्थापित अनन्तनाथजी की सुन्दर चिताकर्षक छवि से मन मोहित हो उठता है। आस्था से सिर नतमस्तिष्क हो जाता है। ताज की आकर्षित आभायुक्त अनन्त आनन्द का त्रोत बहने लगता है।
यह मंदिर 11वीं शताब्दी के समय से स्थापित है। इसी मंदिर के कोने में शिलालेख से उल्लेखित निर्माता का छेनी युक्त मूर्ति के दर्शन होते है। यशोभद्र सूरि के परम परम्परा के शिष्य के समय में इस मंदिर का निर्माण हुआ है।
कहा जाता है कि उस काल में यहां जैन समाज की बस्ती थी। जिसके प्रमाण इस ग्राम के पूर्वी पहाड़ियों के ऊं चे भू भाग में आज भी खंडहरों के अवशेष व उसकी पक्की ईंटें दृष्टिगोचर होती है। दुर्गम स्थल में निवास-रक्षा व्यवस्था नहीं होने से आक्रांताओं व दूदर्म्य दस्युओं के घात-प्रतिघात व आक्रमणों से विवश होकर यह जैन बस्ती यहां से पलायन कर आसपास के सुरक्षित कस्बों-नगरी में स्थापित हो गई।
यहां की (जैन मंदिर) की व्यवस्था घाणेराव श्री ओसवाल संघ पेढ़ी के अन्तर्गत चलती है। वैष्णव पुजारी द्वारा पूजा-अर्चना एवं कार्य सुचारू रूप से चलता है। ठहरने के लिए आवास व भेजनशाला पौषधशाला धर्मशाला का यात्रियों के लिए प्रबन्ध है। आदेश पर भोजन की व्यवस्था हो जाती है। मुख्य मार्ग से जुड़ाव एवं यातायात की सुविधा हो जाय तो यह जैन तीर्थ स्थल के रूप में विकसित हो सकता है। इससे इसके पर्यटन के रूप में विकास की संभावना है। (क्रमश:)
– डा. भंवरसिंह राठौड़

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