गोडवाड़ की गौरव गाथा -60

जैन मंदिर पाली (मारवाड़)
डा. भंवरसिंह राठौड़
कहावत चरित्रार्थ होती है-
गोडवाड़ में घाणेराव, मारवाड़ में पाली
कांटों में कंटालियों, आडावल्ला में बाली
इस भूभाग के चार स्तम्भ है। पाली में अनेक जैन मंदिर होने के कारण यह भी जैन तीर्थ की श्रेणी में गिना जाता है। यहां छोटे बड़े दस जैन मंदिर है लेकिन इनमें प्राचीन जैन संस्कृति के प्रतीक स्वरूप में यदि कोई मंदिर जाना जाता है तो नवलखा पार्श्वनाथ का जैन मंदिर। जहां प्रतिवर्ष हजारों तीर्थ यात्री दर्शनार्थ आकर के अपने आपको धन्य मानते है। इस मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी पूर्वाद्ध में वि.सं. 1144 का उल्लेख मिलता है।
घाणेराव के चौमुख सूरजकुण्ड के शिलालेख के समानार्थ से यहां के मन्दिरों में जो प्रतिमाएं है- 1188, 1178 व 1201 के लेखों में इस मन्दिर में मूलनायक भगवान महावीर स्वामी के होने का उल्लेख मिलता है। वि.सं. 1686 में हुए जीर्णोद्धार के समय मूलनायक भगवान महावीर स्वामी के स्थान पर पार्श्वनाथ भगवान की यह प्रतिमा प्रतिष्ठित होने का लेख है।
कहते हैं कि इस मन्दिर को लुटेरों द्वारा बार-बार तोड़ा गया था इसलिये इस मंदिर की चारदिवारी किसी सुदृढ़ दुर्ग के समान दृढ़-मजबूत व बुर्जियों के साथ बनाई गई। इस मंदिर के नाम के पृष्ठ भूमि के पीछे कुछ रोचक कहावतें प्रचलित है। कुछ लोगों का मानना है कि उस काल में मंदिर निर्माण में नौ लाख रूपये व्यय हुए, इसलिये इसका नाम ‘नवलखा’ मंदिर पड़ा। इस मंदिर की भव्यता और इसमें बने बावन जिनालय को देखते हुए यह कोई अतिशियोक्तिपूर्ण बात नहीं लगती। एक अन्य किवदन्ती के अनुसार नवलखा नाम के एक सेठ ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था इसलिये इसे नवलखा मंदिर कहा जाने लगा। इसे नवलखा कहे जाने के पीछे एक मान्यता यह भी रही है कि यह मंदिर नौ लाख रूपये घी की कीमत से निर्मित हुआ है। 11वीं वि.सं. में साण्डेराव के मंदिर की प्रतिष्ठा महोत्सव पर यशोभद्र सूरीश्वरजी द्वारा मंत्रशक्ति से पाली से घी मंगवाया था, जिसका घी व्यापारी को पता न लग सका। पश्चात साण्डेराव के श्रावकगण घी की लागत के रूपयों का भुगतान करने पाली आये तो व्यापारी ने रूपया लेने से इन्कार कर दिया और घी की मूल्य राशि नवलखा रूपयों से पाली में मंदिर का निर्माण करवाया जो नवलखा मंदिर से जाना गया।
प्राचीन जैन पुस्तकों में पाली के नवलखा जैन मंदिर के निर्माण के बारे में ऐसा भी उल्लेख मिलता है कि इसे गुजरात के राजा कुमारपाल सोलंकी ने आचार्य हेमचन्द्र सूरि की प्रेरणा से बनवाया था। राजा कुमारपाल जब गुजरात के प्रभाव क्षेत्र से लुटेरों के आक्रमण से बचाते हुए सोमनाथ का शिवलिंग लाये तब पाली में भी एक जैन मंदिर का निर्माण करवाया था। इससे पूर्व कुमारपाल ने जैन धर्म स्वीकार कर लिया था।
विशाल सभा मण्डप वाला पाली का यह नवलखा मंदिर भव्य है। हाल ही में इसके जीर्णोद्धार के समय इसका प्राचीन सभा मंडप नया बनाया गया है। मंदिर का गर्भ गृह काफी प्राचीन है। मंदिर के चारों ओर अनेक देहरियां बनी होने से इसे बावन जिनालय वाला मंदिर कहा जाता है। प्रत्येक देहरी में जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाएं स्थापित है। मंदिर का शिखर विशाल एवं कलात्मक है। मंदिर की बनावट और इसकी प्राचीन कला के कारण ही यह मंदिर धर्म और कला का अद्भुत संगम बन गया है। जैनों में पल्लीवालगच्छ के उत्पति का स्थान यही पाली है। यही पर खंडेरेक गच्छ के आचार्य यशोभद्र सूरिश्वर को आचार्य पदवी से विभूषित किया गया था।
पाली में नवलखा पार्श्वनाथ भगवान के मंदिर के अतिरिक्त दस मंदिर और चार दादावाड़ियां है जिसमें शांतिनाथजी का मंदिर व गौड़ी पार्श्वनाथ भगवान का मंदिर तथा पाली शहर से पांच किलोमीटर दूर हेमावास की भाकरी पर बना पार्श्वनाथ भगवान का मंदिर भी प्राचीन है। यात्रियों के ठहरने के लिए धर्मशाला व भोजनशाला की सुचारू व्यवस्था है। पाली शहर नेशनल राजमार्ग के जोधपुर-मारवाड़ जंक्शन के बीच स्थित है। यह राष्ट्रीय मार्ग 14 पर अजमेर-अहमदाबाद के बीच जुड़ा हुआ है। (क्रमश:)

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