गोडवाड़ की गौरव गाथा-58

गोडवाड़ के जैन मन्दिर कोरटा
प्राचीन ग्रंथों में कोरटा के जैन मन्दिर का वर्णन विभिन्न कालों में मिलता है इससे स्पष्ट है कि ये मन्दिर प्राचीन है जो काल कवलित हो गये। प्राकृतिक विपदाओं के कारण या तो ये ध्वस्त हो भूमिगत हो गये अथवा इस्लामिक आंधी में ये मन्दिर ध्वस्त होने के कारण ये मन्दिर भूमि को अर्पित हो गये। पुरातत्व विभाग यदि यहां उत्खनन का कार्य हाथ में ले तो निश्चित ही उन अवशेषों का हम पता लगा सकते है क्योंकि यहां जैन साहित्य में मन्दिरों के समूहों का वर्णन मिलता है। साथ ही खुदाई में कहीं-कहीं भग्न मन्दिर के अवशेष भी मिलते हैं। ये अवशेष नवीन मन्दिर के संग्रहालय में आज भी संग्रहित है जिसका वर्णन पहले किया जा चुका है। कोरटा के भगवान महावीर के मन्दिर के निर्माण के समय भी भूमि से कुछ प्रतिमाएं निकली थी जिन्हें मन्दिर में प्रतिष्ठापित किया गया है। कहने का तात्पर्य यह है कि कोरटा आज चाहे छोटा कस्बा रह गया हो, मन्दिरों की संख्या चाहे कम रह गई हो और चाहे जैन मतावलम्बियों की संख्या भी नगण्य हो पर अतीत में यह स्थान जैन संस्कृति का प्रमुख केन्द्र रहा होगा।
तपागच्छ पट्टावलीकार श्री धर्मसागर उपाध्याय द्वारा पुष्टि की गई है कि एक समय कोरटा में वृद्धदेव सूरि के वि.सं. 1252 में चातुर्मास के अन्तर्गत मंत्री नाहड़ एवं उसके लघु भाता सालिग आदि कुटुम्बियों को प्रतिबोध कराया जिससे नाहड़ ने यहां 72 मंदिरों का निर्माण करवाया तथा जीवन भर भोजन करने से पूर्व जिन पूजा करने की प्रतिज्ञा ली।
कोरटा का दूसरा मंदिर नाहड़ के पुत्र ढाहवल द्वारा निर्मित है जिसमें मूलनायक ऋषभदेव भगवान की प्रतिमा प्रतिष्ठित है। इस मंदिर का निर्माण 13वीं शताब्दी से अधिक पुराना नहीं माना जा रहा है। मंदिर में ढाहवलजी द्वारा प्रतिष्ठित मूर्ति अब नहीं है परन्तु इसके स्थान पर वि.सं. 1903 में प्रतिष्ठित प्रतिमा विराजमान है।
कोरटा का तीसरा मंदिर श्री पार्श्वनाथ भगवान को समर्पित है। इसका निर्माण कब हुआ और किसने करवाया, यह उल्लेख नहीं मिल रहा है परन्तु इस मंदिर की नवचौकी के एक स्तम्भ पर अस्पष्ट अक्षरों से अनुमान लगाया जा रहा है कि यह मंदिर भी नाहड़ के किसी परिजनों से निर्मित है। इसका जीर्णोद्धार 17वीं शताब्दी में हुआ था उस समय इस मंदिर में शांतिनाथ भगवान की प्रतिभा स्थापित कर दी थी लेकिन वि.सं. 1959 में यहां पुनः पार्श्वनाथ भगवान की प्रतिमा प्रतिष्ठित कर दी गई जो आज भी विद्यमान है।
यहां का चौथा मंदिर इस कोरटा गांव के पूर्व में स्थित है । यह मंदिर भव्य होने के साथ ही अन्य मंदिरों से अधिक प्राचीन है। इसमें ऋषभदेव की प्रतिमा स्थापित है जिसके दोनों ओर स्थित श्री शांतिनाथ भगवान एवं श्री संभवनाथ भगवान की काउसगिया प्रतिमाएं है जिन पर 1143 का लेख है। कहते है कि यह मूर्तियां भगवान महावीर के मंदिर का जीर्णोद्धार कराते समय भूमि के अन्दर से प्राप्त हुई थी।
इन मंदिरों की प्राचीन शिल्पकला अद्भुत है, यहां प्राचीन प्रतिमाओं और तोरण आदि को एक संग्रहालय में प्रदर्शित किया गया है जिससे कोरटा के इन मंदिरों की प्राचीनता का बोध होता है, अन्यथा बार-बार होने वाले जीर्णोद्धार के बाद इनके निर्माण काल का अनुमान लगाना कठिन हो जाता है।
कोरटा में यात्रियों के लिये सुविधाजनक धर्मशाला एवं भोजनशाला की भी व्यवस्था तीर्थ पेढ़ी द्वारा की जाती है। यहां पहुंचने के लिये स्टेशन जवाई बांध है जहां से 12 किलोमीटर दूर बस द्वारा शिवगंज पहुंच कर यहां से कोरटा तक  का आठ किलोमीटर का रास्ता तांगा या टेक्सी से तय करना होता है। शिवगंज शहर जोधपुर-अहमदाबाद के राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 14 पर स्थित है। (क्रमशः)
– भंवरसिंह राठौड़

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