गोडवाड़ की गौरव गाथा-८1

मीरां के आराध्य मुरलीधर, घाणेराव-८१
–  डॉ. भंवरसिंह राठौड़, घाणेराव, पाली

भक्त शिरोमणी मीरांबाई के पिता रतनसी मेड़तिया (राठौड़) के संबंध में आज तक थोड़ी-जानकारी साहित्य व इतिहास जगत को रही है। उनके संबंध में प्रो.कल्याणसिंह शेखावत के अनुसार एवं संस्थान द्वारा जो प्रामाणिक उल्लेख प्राप्त हुये है वे  प्रस्तुत है-
-रतनसिंह मेड़ता राज्य के संस्थापक राव दूदा के चौथे पुत्र व तत्कालीन मारवाड़ रियासत के शासक राव जोधा के पौत्र थे।
-रतनसिंह को राव दूदा ने जागीर में ९२ गांव प्रदान किये थे। जिनके नाम-नींबडी, पालड़ी, हकधर, नूंद,आकोदिया, मोटास, पीमणियां, डूमांणी, सुंदरी, कुड़की, नैया, मांझी-बाझोती थे।
-रतनसिंह का विवाह मेवाड़ के गोगुन्दा के झाला सरकार कहलाएं हमीर की पुत्री कुसुब कंवर से हुआ था। पुरोहित हरनारायणत्री ने मीरां की माता का नाम ‘वीर कुंवरी’ तथा नाना का नाम गोगुदां के झाला सुलतानसिंह लिखा है।
-रतनसिंह को इतिहासवेत्ता राव दूदा का द्वितीय पुत्र मानते है और कुछ चतुर्थ पुत्र मानते है।
जयमल वंश प्रकाश में रतनसिंह को रत्नसिंह लिखा गया हैं यथा  ”रावदूदा के पांच पुत्र और एक पुत्री गुलाब कुंवरी हुई। पुणोंका  क्रम जहां तक ज्ञात हो सका इस प्रकार है।
१ वीरमदेव- राव दूदा के उत्तराधिकारी हुए।
२ रायसल- ये रायसलोत शाखा के मूल पुरूष थे। इनके वंशजों के अधिकार में मारवाड़ में भड़ाना, बांसणी, जीलारी ठिकाणे है। मेवाड़ राज्य में हुरड़ा के कुछ ग्रामों में जागीरी है।
३ पंचायण- नि:संतान हुये।
४ रत्नसिंह- इनके कोई पुत्र नहीं हुआ। केवल एक पुत्री हुई जो मीरांबाई के नाम से विश्वविख्यात हुई। इस मीरांबाई का विवाह चित्तौड़ के प्रसिद्ध वीरवर महाराणा संग्रामसिंह के युवराज भोजराज से हुआ। रत्नसिंह को निर्वाह के लिए १२ बारह गांव दिए। वि.सं. १५८४ चौथ शुक्ला १४ (१५२६ ई) १७ मार्च को बयाने में माहाराणा संग्रामसिंह का मुगल बादशाह बाबर से प्रसिद्ध युद्ध हुआ था। उसमें वे मुसलमानों की बड़ी वीरता से युद्ध करके काम आए।
५ रायमलजी- मेड़तियों की रायमलोत शाखा का प्रारम्भ हुआ। जोधपुर  नरेश राव  मांगाजी ने  बयाने के युद्ध में महाराण सांगा की सहायतार्थ जो सेना भेजी उसके प्रधान सेनापति ये ही थे। ये भी इस युद्ध में बड़ी बहादुरी से लड़ कर मारे गये। मारवाड़ में इनके वंशजों के अधिकार में मुख्य ठिकाणे वेण और रायरा है। इतिहासवेत्ता हरिनाराणजी के शब्दों में ”दूदाजी के दो राणियों व पांच पुत्र थे। वीरमदेव ,रायमल ,पंचायण, रत्नसिंह, रायसल। रावरत्नसिंह (मीरां के पिता) बयाने तो  बाबर बादशाह के साथ, महाराण संग्राम-सिंहजी के साथ,  साथ जो प्रसिद्ध युद्ध हुआ था, उसमें (रत्नसिंह) वि.सं १५८४ में मिति चैत्रसुदी १४ को मुसलमानों से बड़ी वीरता के साथ  युद्ध करते हुए काम आये थे, उसी में रायमलजी भी था।
ऐसी ही तुजुक बाबरी, राजपूताणे के इतिहास में भी उल्लेखित है कुलगुरूओं की बहिया(मेड़तिया वंश) एक दोहा प्रसिद्ध जो उद्रत है-
”वीरमदे तगद वडो रायमल नै शयसल्ल’
रतन पंचायण पॅाचअे, दूद तणा सुता भल्ल”
बाकीदासजी ने अपनी ख्यात में ”दूदा जोधावत रे बेटा पांच हुआ वीरमदे, रतनसी, रायमल, रामसल, पंचायण। रतनसी, रायसल रे वंस रहयों नही, पंचायणोत पचास जणा है।
मीरां के पिता रतनसी (रत्नसिंह) अपने समय में विख्यात योद्धा व वैष्णव भक्त थे। उनके शौर्य से प्रभावित होकर अनेक कवियों ने डिंगल गीतों की रचना की थी।
सउदारहण
– रतनसिंह रिमराह अनै आषो आचगल। एक आगल अजमेर एक मेडता आगचल।’ आषौ पीसांगवणि रयणा कुडकी घर वासै। सांकड़ ही लै सीम वैसे हुआ भैवोसे। आसेना रहै बौले अक ास पग कूंडालै जिस प्रसंग। दम हुआ लोक सहिऊ  अचरै मुत्रिए कहे हेकै मरण।
-मीरअली महिपाली मारि संसार वदितौ। रणथंभरि रूघनाथ जुडै जिणी सैमरि जितौ” भडां काल सीमाल नाट झूटौ दोसारी। करमचंदी रंण छलि माहि अज्जैपुर भरी” आषालौ कहे पंमार ए रिणी सूरा अज भज्जणा। सौ को ई गरबौ रतनसीवदे पराक्रम अपणा”

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s


%d bloggers like this: