गोडवाड़ की गौरव गाथा-८२

मीरां के आराध्य मुरलीधर-घाणेराव
मीरांबाई के पिता के रूप में रतनसिंह की इतिहास में अप्रकट युद्धवीरता का महत्वपूर्ण परिचय मिलता है।
मेड़ता नगर – तत्कालीन सर्वप्रभुसत्तासम्पन्न मेड़तिया शासकों की रियासत की राजधानी मेड़ता थी जो वर्तमान में मेड़तानगर के रूप में प्रसिद्ध है। इतिहासवेत्ताओं तथा साहित्य के विद्वानों के अनुसार मेड़ता का अति प्राचीन नाम मान्धातपुर था जो  अपभं्रश होकर पहले महारेत, बाद मे मेरूक्तक और अंत में मेड़ता बना। पूर्व में मेड़ता का नाम मेदिनीपुर भी था। ऐसा भी प्रसिद्ध है कि राजा नागभट्ट प्रथम की राजधानी मेड़ता ही थी जिसका समय ई. ७२५ से ७४० के बीच मान्य है।
‘जयमलवंश प्रकाश’ से  इस बात की पुष्टि होती है कि राव दूदा ने मांडू के बादशाह से मेड़ता छीन कर स्वतंत्र राज्य (रियासत) की स्थापना कर मेड़ता शहर का पुन: निर्माण करवाया। राव दूदा द्वारा मेड़ता राज्य की राजधानी मेड़ता नगर में स्थापित होने से उनके वंशज मेड़तिया कहलाये।
राजमहलों  का निमार्ण – मेड़ता नगर में वरसिंह व दूदा ने बेझपा जलाशय के समीप विक्रमी संवत् १५१८ की चैत्र सुदी ६ को राजमहलों की नींव रखी, जिसके अवशेष आज भी विद्यमान है। राव जयमल ने मेड़ता नगर में अनेक महलों तथा भवनों का निर्माण करवाया।
चारभुजानाथ का मंदिर- राव दूदा ने विक्रमी संवत १५३२ में श्री चारभुजा का मंदिर मेड़ता नगर में बनवाया।
इसी मेड़ता नगर में मीरांबाई का बाल्यकाल व्यतीत हुआ और यहीं वि.सं. १५७३ में राव वीरमदेव ने मीरां का विवाह मेवाड़ के महाराणा सांगा के ज्येष्ठ पुत्र भोजराज से किया था। कुड़की में कुछ वर्ष रहने के पश्चात राव दूदा ने बिना मां की उस राजकन्या को मेड़ता नगर में बुला लिया और वहीं मीरां की शिक्षा-दीक्षा हुई। राव दूदा प्रसिद्ध वैष्णव भक्त थे और अपने इष्टदेव विष्णु के चारभुजानाथ के रूप में अनन्य उपासक थे। ‘जयमल वंश प्रकाश’ में इस सम्बन्ध में यह विवरण भी लिपिबद्ध है-‘राव दूदा बड़े पराक्रमी, नीतिज्ञ और दूरदर्शी नरेश थे। ये जैसे वीर थे वैसे ही धर्मात्मा भी थे। परम वैष्णव होने पर भी यह भगवती जगदम्बा के अनन्य भक्त थे। जोधपुर के  (तत्कालीन मारवाड़ राज्य) के शासक मालदेव ने वि.सं. १६१३ में मेड़ता पर आक्रमण कर अपने अधीन कर लिया और समस्त राजभवनों को विध्वंस करा दिया। उन्होंने केवल एक श्री चतुर्भुजजी के मंदिर को खंडित नहीं किया।
मुहणोत नैणसी लिखता है कि – ”राव जी जैतारण थी संवत १६१३ रा फागुण सुदि १२ मेड़ता पधारिया। मेड़तौ हाथ आयौ। ने जैमल रा घरां री ठौड़ मूला बुहाडीया। घर पाड़ीया। संवत १६१४ सोला सै चौधातरै लागतां मालगढ़ मंड़ायौ। नै संवत १६१६ री साल मालगढ़ पूरौ हुवौ। ने आधौ मेड़तौ रा: जैगमाल वीरमदेवोत नुं पटै दीयौ। ने रा: देवीदास नुं मालगढ़ थाणै राषीयौ।”
इतिहासकार गौरीशंकर हीराचंद ओझा रोहिड़ा वाला ने लिखा है- ‘भगवती मीरां के समकालीन मेड़ता राज्य के परम शत्रु जोधपुर नरेश राव मालदेवजी भी उनके भक्ति भाव से भयभीत हो गये थे कि मेड़ता विजय के उपरांत जब राव जयमल के समस्त राजभवनों को द्वेष से नष्ट करा दिया तब श्री चतुर्भुजजी के देवालय और मीरांबाई की भजनशाल-कोठरी को उन्हें सुरक्षित रखना पड़ा। (क्रमश:)
भंवरसिंह राठौड़ ‘घाणेराव’

4 Responses to “गोडवाड़ की गौरव गाथा-८२”

  1. चंद्र मौलेश्वर Says:

    अच्छी जानकारी। बधाई।

  2. Jitendra Dave Says:

    बहुत सराहनीय प्रयास है. दुनिया को हमारे राजस्थान की आन-शान और इतिहास के बारे में जानकारी देने में यह बहुत सार्थक रहेगा. कृपया इसे जारी रखें. सादर शुभकामनाएं.

  3. govind goyal,sriganganagar Says:

    narayan narayan

  4. संगीता पुरी Says:

    बहुत सुंदर…..आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्‍लाग जगत में स्‍वागत है…..आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्‍दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्‍दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्‍त करेंगे …..हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

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