गोडवाड़ की गौरव गाथा-८०

मीरां के आराध्य मुरलीधर, घाणेराव
जयमल-मीरां दो भाई-बहन सगुण वैष्णव भक्तों के रूप में भक्ति जगत में विख्यात हो चुके है। दोनों में अनेक दिव्य गुण थे जिनकी तुलना करते हुए चतुरसिंह रूपाहेली के शब्दों में-‘ज्येष्ठ भगिनी करूण और शान्त रस की सजीव मूर्ति थी तो कनिष्ठ भ्राता रौद्र और वीररस की प्रत्यक्ष प्रतिमा था। ज्येष्ठ भगिनी का इतना अधिक प्रभाव बढ़ा कि भारत वर्ष के मुख्य-मुख्य तीर्थ धामों, रामेश्वर, द्वारका, जगदीशपुरी आदि में उनकी प्रतिमाएं स्थापित होकर साधु-संतों, हरिभक्तों और सर्वसाधारण द्वारा देव पूजा होने लगी और अब तक वे मूर्तियां विद्यमान है। ठीक उसी प्रकार कनिष्ठ भ्राता की वीरता का भी इतना ही अधिक प्रभाव बढ़ा कि भारत वर्ष की मुख्य-मुख्य राजधानियां, आगरा, दिल्ली, मांडू (मालवा के बादशाह) काठमांडू या भाट गांव (नेपाल की राजधानी) क्षत्रिय, भूपालों और शूर सामन्तों द्वारा वीर पूजा होने लगी। मांडू तथा नेपाल में तो ऐसी मूर्तियां अब तक विद्यमान है। दोनों भाई बहन की अनेक बातों में समानता की तुलना ईश्वर कृपा से हुई है, ऐसी संसार में मिलना कठिन है। इस कथन बतुलना में अतिशयोक्ति नहीं है। भक्त आत्मा मीरां बाई को महाराणा विक्रमादित्य द्वारा अनेक कष्ट दिये जाने, विष का प्याला चरणामृत के रूप में भेजने तथा मानसिक संताप देने के कारण मेवाड़ की राजधानी चित्तौडग़ढ़ उजड़ गया, उसका राजवैभव समाप्त हो गया। कैसा संयोग हुआ कि चित्तौड़ दुर्ग की रक्षा के लिये मीरां बाई के प्रिय कनिष्ठ भ्राता जयमल ने अंतिम प्रयास कर अपने अमूल्य प्राणों का बलिदान चित्तौड़ रथार्थ हित कर दिया।’
भगवती मीरां ने प्रसन्न होकर अपने भाई जयमल को दो वरदान प्रदान किये थे, बाणो बधे तेरो परिवार, होवे नहीं समर में हार। ये दोनों वचन आज तक भी प्रत्यक्ष दृष्टि में आते है कि जोधपुर राज्य में चांपावत, कंपावत, वैरावत, उदावत आदि शाखाएं बहुत बड़ी मानी जाती है, परन्तु उनमें से किसी में भी छह हजार से अधिक जनसंख्या नहीं है।
मेड़तिया राजवंश में राव जयमल-प्रतापसिंह सबसे अधिक प्रतापशाली और प्रसिद्ध नरेश हुए। इनका नाम न केवल राजपूताने में प्रत्युत सारे भारत वर्ष में प्रसिद्ध है। प्रतिपक्षी मुसलमान लेखकों से भी इतिहासवेत्ताओं ने अपनी लिखी हुई तवारीखी किताबों में राव जयमल जी के लोकोत्तर शौर्य और साहस की मुक्त कंठ से प्रशंसा की है। वर्तमान काल में इतिहास विद्या के परमानुरागी कर्नल टॉड इतियह, स्मिथ, काउन्टर ओनर, स्ट्रेटन, वाल्टर तथा लेनपुल आदि अनेक प्रसिद्ध यूरोपियन गं्रथकारों ने भी जयमल जी के वीररस से भरे हुए जीवन चरित्र का बहुत ही गौरव के साथ वर्णन किया है। (क्रमश:)
डा. भंवरसिंह राठौड़ ‘घाणेराव’

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