गोडवाड़ की गौरव गाथा-७८

मीरां के आराध्य मुरलीधर, घाणेराव
डीडवाना एवं अमरसर प्रवास- इस संबंध में हकीकत अनेक बयान करते है प्रसिद्ध इतिहासवेता सुरजनसिंह लिखते है- मेड़ता का राव वीरमदेव मेड़तिया अपने समय का महान योद्धा और बड़ा राजपूत था। उसने मुसलमानों को निकाल कर अजमेर पर भी अधिकार कर लिया था। जोधपुर के शासक राव मालदेव को वीरमदेव के बढ़ते हुए प्रताप और यश से ईष्र्या थी। उसने जेता, कूंपा आदि अपने प्रमुख राजपूतों को ससैन्य भेजकर वीरमदेव से अजमेर और मेड़ता दोनों छीन लिये। वीरम शान्त बैठने वाला नहीं था। उसने डीडवाना पर अपना अधिकार कर लिया किन्तु मालदेव की सेना ने उसका वहां भी पीछा किया और उसे डीडवाना से निकाल दिया। सब ओर से हताश अन्त में रायमल शेखावत के पास अमरसर गया। रायमल ने वीरम का बड़ा आदर सत्कार किया। मालदेव की कृपा अथवा उसके कोष की परवाह किये बिना उसने १२ महिनों तक वीरमदेव को अपने यहां आश्रय में रखा।
राव वीरमदेव का अमरसर प्रवास का एक कारण यह भी था कि मुगलों को भारतवर्ष से निकालकर दिल्ली के सुल्तान बनने वाले पठान शेरशाह सूरी का पिता मियां हसन खां भी अपनी जवानी के प्रारंभिक वर्षों में अमरसर के शासक राव रायमल की सेना में रह कर ही विकास कर उपर उठा था। अत: उन पुराने सम्पर्कों का लाभ उठाकर राव वीरमदेव शेरशाह से मिलने का मार्ग प्रशस्त करना चाहता था। अमरसर प्रवास से राव वीरमदेव को इसमें सफलता भी मिली।
अन्य मत – (देवीसिंह मंडावा) अनुसार- राव मालदेव द्वारा अजमेर पर १५३६ ई. में अधिकार कर लेने पर वीरमदेव डीडवाना चला गया। वहां भी मालदेव ने उसका पीछा किया। तब वह बाण अमरसर शेखावटी पहुंचा, जहां वहां का शासक राव रायमल शेखावत राव वीरमदेव का संबंधी था। ई. १५३७ में राव वीरमदेव ने चाटसू पर अधिकार कर लिया। फिर वह लालसोट, बेवाली, मोजावाद चला गया। जहां रणथंभोर की (नवाब को) सेना की मदद से वह शेरशाह के पास चला गया और उसे मालदेव के विरूद्ध चढ़ाई करने के लिये सहमत कर लिया।
मीरां की शिक्षा पंडित गजाधर की देखरेख में हुई। कुछ ही वर्षों में मीरां पूर्ण विदूषी एवं पंडिता हो गई।
वि.सं. १५८० में कुंवर भोजराज का देहान्त होने के पश्चात् मीरां का वैवाहिक सुखी जीवन समाप्त हो गया। संवत १५८४ में रतनसिंह की मृत्यु से मीरां को दूसरा आघात लगा। मीरां बाई आठ वर्ष तक द्वारिका में रही।
संवत १५९५ में मेड़ता पर मालदेव  के आक्रमण के बाद मीरां वृन्दावन और  द्वारका संवत १६०० में चली गई। (क्रमश:)
डा. भंवरसिंह राठौड़ ‘घाणेराव’

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