गोडवाड़ की गौरव गाथा-७७

मीरां के आराध्य मुरलीधर, घाणेराव
डा. भंवरसिंह राठौड़ ‘घाणेराव’

राव वीरमदेव वही से दिल्ली के शासक शेरशाह सूरी के पास गया। मुरणोत नैनसी ने इस संबंध में लिखा है कि जब मालदेव की फौज फैसलाबाद तक आ गई तब वीरमदेव ने खेमा मेड़ता से कहा कि इस बार मैं अवश्य कर मर जाऊं गा। तब मेड़ता ने कहा कि पराई धरती में क्यों मरे और यदि मरना ही है तो मेड़ते में ही जाकर क्यों न मरे? इस पर दोनों रणथंभोर के थानेदार के पास गये और उसकी सहायता से ये शेरशाह सूरी के पास चले गए।
डॉ. रघुवीर सिंह सीतामऊ  के मतानुसार, उधर मेड़ता का वीरमदेव, बीकानेर के जैतसिंह का पुत्र कल्याणमल आदि मालदेव के शत्रु भी मालदेव पर आक्रमण करने के लिये शेरशाह को निरन्तर प्रेरित कर रहे थे। अत एव सन् १५४३ ई. की वर्षा की समाप्ति पर युद्ध की पूरी तैयारी करके, शेरशाह ने मालदेव पर चढ़ाई कर दी। वीरम साथ था ही, कल्याणमल भी सिरसा से चलकर, राह में सैन्य सहित शेरशाह के साथ मिला।
प्रशस्ति-साक्ष्य -‘इसी अवसर पर वीरमदेव मेड़तिया ने इस क्षेत्र (चाटसू) पर अचानक आक्रमण करके इसे जीत लिया। वि.सं. १५९४ में उसके शासनकाल में लिखी षट्वाहुड की एक ग्रंथ प्रशस्ति भी उल्लेखित है जो चाट्सू में लिखी गई थी।Ó
संवत १५९४ वर्षे माह सुदि २ बुधवार चम्पावती नगरे राठौड़ वंशे ग्राम श्री पीथास राठौड़ (पृष्ठ १७५) पाटन के शास्त्र भंडार में वीरमदेव की षटकर्म गं्रथावली की वि.सं. १५९२ की प्रशस्ति सुरक्षित है जिसमें स्पष्टत: मेड़ता पर वीरमदेव का राज होना उल्लिखित है।
अतएव ऐसा प्रतीत होता है कि वि.सं. १५९५ मे मारवाड़ के मालदेव ने मेड़ता आदि क्षेत्र वीरमदेव से ले लिये थे। तदनुसार वीरमदेव ने डीडवाना पर अधिकार कर लिया। जब मालदेव की सेना वहां भी पहुंच गई तब वीरमदेव अपने संबंधी राय रायमल शेखावत के पास अमृतसर चला गया।
राव वीरमदेव का अजमेर पर अधिकार हरविलास शारदा ने वि.सं. १५९०-१५९२ तक गुजरात के बादशाह का अधिकार होना लिखा है, एवं वीरमदेव का वि.सं. १५९२ के बाद ही अजमेर लेना वर्णित किया है। रेऊ  ने विक्रम संवत १५९७ में वीरमदेव का अजमेर पर अधिकार होना लिखा, जो सत्य नहीं माना जाता।
रामवल्लभ सोमानी, वि.सं. १५९२ वैशाख को लिखी षटकर्म ग्रंथावली पूरी की प्रशस्ति अनुसार उक्त तिथि तक का वीरमदेव का वहां अधिकार सिद्ध करते है।
प्रशस्ति – ‘संवत १५९२ वर्षे शाके प्रवर्तमाने वैशाख मासे शुक्ल पक्षे तृतीया तिथो खौवरि। मृगशिर नक्षत्रे।
श्री मेड़ता नगरे। राजधिराज श्री वीरमदेव राज्ये।’
श्री विश्ववेश्वरनाथ रेऊ  ने मालदेव का वि.सं. १५९२ पूर्व ही मेड़ता लेना लिखा है। इसी समय मालदेव ने अजमेर से भी वीरमदेव को हटाने को बाध्य कर दिया था। (क्रमश:)

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