गोडवाड़ की गौरव गाथा-७६

मीरां के आराध्य मुरलीधर-घाणेराव
-डा. भंवरसिंह राठौड़ ‘घाणेराव’

मेवाड़ की सहायता – वीरमदेव का विवाह महाराणा सांगा की बहिन के साथ हुआ था। अत: महाराणा सांगा के साथ उनके अत्यन्त मधुर संबंध रहे और दिल्ली, गुजरात, मालवा और खानवा के युद्धों में वीरमदेव उनके सहयोगी बनकर सदा उनके साथ रहे तथा उन्होंने अद्भुत रणकौशल का परिचय दिया। उन्होंने गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह द्वारा चित्तौड़ पर किये गये दोनों हमलों में मेवाड़ की सहायतार्थ अपनी सेना लेकर युद्ध किया। खानवा के प्रसिद्ध युद्ध में भी वे चार हजार सैनिकों को साथ लेकर सम्मिलित हुए और महाराणा सांगा की अचेतावस्था में मुगल सेना को रोक कर उस भीषण संग्राम में महाराणा को सकुशल बाहर निकाला। इस युद्ध में राव वीरमदेव के भी अनेक घाव लगे थे। राव वीरमदेव द्वारा राणा को खानवा के युद्ध से निकाल कर सुरक्षित स्थान पर पहुंचा देने की घटना के प्रसंग में राजस्थानी भाषा का निम्नलिखित कवित्त अत्यन्त प्रसिद्ध है-
रतन रायमल्ल बंधव रहिया,
रामहर भिडदार वै ओसाप।
सांगो राण कुसल घर पोंचो,
(वो) वीरमदे तणो प्रताप।।
राव वीरमदेव अजमेर से डीडवाना, नरेना तथा सांभर होता हुआ रायमल शेखावत के पास पहुंचा और उससे सहायता लेकर उसने चाटसू बोली आदि के भूभाग पर अधिकार कर लिया। यह भूभाग उस समय टोंक के सोलंकियों के अधिकार में था और कछवाहों और उनमें संघर्ष चल रहा था।  सोलंकी शासक सूर्यसेन १५९६ तक जीवित था जिसके और उसके पुत्रों पृथ्वीराज तथा पूर्णमल के साथ वीरमदेव का संघर्ष हुआ था। वि.सं. १५९४ की ”षड पाहुड” ग्रथ की प्रशस्ति जो आमेर शास्त्र भण्डार में संग्रहित है उसमें वीरमदेव को चाटसू के शासक के रूप में वर्णित किया गया है।
”संवत १५९४ वर्ष महासुदी २ बुधवार श्रावण नक्षत्रे श्री मूलसंघे कलात्मार धणे सरस्वती गच्छे नथाम्याने कुन्दकुन्दाचार्यान्वये महारक श्री शुभचन्द्र देवास्त त्पहे भहारक श्री जिनचन्द्रदेवास्त त्पहे भहारक श्री प्रभाचन्द्र देवस्ता शिष्य श्री धर्मचन्द्र देवतदाम्नाये खंडेलवालान्वये चम्पावती नगरे राठौड़ वंश राव श्री वीरमथ राज्य बांकलीवाल गोत्रे..।”
आमेर शास्त्र भण्डार में संग्रहित ”वरांगरचित” की वि.सं. १५९५ की प्रशस्ति से ज्ञात होता है कि उस समय टोंक के आसपास तक राव मालदेव का राज्य था। प्रशस्ति इस प्रकार है-
संवत १५९५ वर्षे माघ मासे पक्षे षष्टी दिवसे
शनैश्चर वासरे उतरा नक्षत्रे राव श्री मालदेव राज्य
प्रवर्तमाने रावत खेतसी प्रताप सांखेण नाम नगरे
श्री शान्तिनाथ चैत्यालये।
विश्वेश्वरनाथ रेऊ  टोंक तक वि.सं. १५९५ के स्थान पर १५९७ में मालदेव का अधिकार लिखा है जो उक्त प्रशस्ति मिल जाने से स्वत: असत्य सिद्ध हो जाता है। (क्रमश:)

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s


%d bloggers like this: