गोडवाड़ की गौरव गाथा-७४

मीरां के आराध्य मुरलीधर मंदिर-घाणेराव
डा. भंवरसिंह राठौड़  ‘घाणेराव’ (पाली)

मीरां अपने पितृवंश के कारण ‘मेड़तणी’ रूप में प्रसिद्धि पा ली। मीरा का जन्म समय, मीरा के तत्कालीन मेड़ता सियासत के शासक एवं मेड़तिया शाखा के संस्थापक राव दूदा के चौथे पुत्र रतनसिंह (रतनसी) की संतान थी। कुछ का मत है (इतिहासकार की दृष्टि से) कि मीरां के पिता रतनसिंह राव दूदा के द्वितीय संतान थे। मीरां का जन्म वि.सं. १५५६ वैशाख सुद बीज को रतनसिंह की जागीरी के प्रमुख गांव  बाजोली में हुआ था। अधिकतर विद्वानों ने वि.सं. १५५५ (१४०८ ई.) को मीरां का जन्म स्वीकार किया है। मीरां का विवाह वि.सं. १५७३ में हुआ था। विद्वान हरिनारायण पुरोहित के मतानुसार मीरां के एक भाई (उनके जन्म पूर्व) होने के प्रमाण मिले थे जिसका नाम कहीं गोपाल अन्यत्र दुरजनसाल मिलता है। इस बालक का बाल्यकाल में निधन हो गया था। बाद में मीरां का जन्म हुआ। कुल गुरूओं, राणी मंगा, राव, भाटो, चारणों की बहियों से भी इस तथ्य की सूचना मिलती है।
राव दूदा व परिवार – राव दूदा मीरां के दादा थे। दूदा जोधपुर के शासक राव जोधा (रिडमलोत) के पुत्र थे। माने तो राव जोधा की मीरां प्रपौत्री थी। राव दूदा के पांच पुत्र थे- १. वीरमदेव २.रायमल ३, रायसल ४. रतनसी ५, पिच्यासानी। ये पांचों पुत्र वीर, पितृभक्त, साहसी व स्वाभिमानी थे। कवि ने कहा है-
दुसमण दल देखि सिखे नहीं डारण
रिण गिरमेर उठावे रीठ।
दूदा आधा पग दे जाजे
पाछी फेर न जाणे पीठ।।
सरम कटे सिर देवे सोवत
स्याम धरम भुज लिया सधीर।
वागा ले जोणे वरदाई
वागा घरे न जाणो वीर।।
खाग तणो खाटयो धन खावे
सत्रवां दिये अमावे सूल।
भिडंणा री पौसाल भणीजे
मडणो परे नहीं अै मुल।।
पुत्र भोजराज के बारे में लिखना प्रासंगिक होगा, गौरी हीराचंद ओझा भोजराज को महाराणा संग्रामसिंह का श्रेष्ठ युवराज मानते है तथा उसका जन्म सोलंकी रायमल की पुत्री कुबेरबाई से होना सिद्ध करते है। ओझा ने बडने देवीदान की एकांत व वीरविनोद के आधार पर अपनी यह गाह्यता प्रतिपादित की है। गोपालसिंह मेड़तिया के अनुसार, राव दूदा मारवाड़ नरेश सुप्रसिद्ध अधिपति राव जोधा के चौथे पुत्र थे। इनकी माता जालोर के सोनिगरा चौहानवंशी राजा खीमा सतावत की पुत्री थी। दूदा का जन्म वि.सं. १४९६ आषाढ़ शुक्ला १५ बुधवार को मारवाड़ की प्रांत की तत्कालीन राजधानी मंडोर में हुआ था।
अपना मनोरथ सिद्ध करने के लिए वि.सं. १५१८ (१४१६ ई.) में अपने सहोदर कनिष्ठ भ्राता वरसिंह को साथ लेकर दूदा ने मेड़ता पर आक्रमण किया। मेड़ता उन दिनों मालवे के सुल्तान महमुद के अधिकार में था। मुसलमानों को परास्त कर दूदा जी ने मेड़ते पर अपना आधिपत्य स्थापित किया।
आयु सम्बन्धी भी इतिहासकार मानते है कि वरसिंह, दूदा से बड़े थे। परन्तु जयमल वेश प्रकाश में उन्हें कनिष्ठ लिखा गया है। (क्रमश:)

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