गोडवाड़ की गौरव गाथा-७३

मीरां के आराध्य मुरलीधरजी मंदिर-घाणेराव
डा. भंवरसिंह राठौड़  ‘घाणेराव’ (पाली)

वर्तमान में कुड़की दुर्ग में राव दूदा के वंशज चांदावत मेड़तिया राठौड़ों का निवास है। मीरांबाई के बड़े पिता वीरमदेव के पुत्र चांदा के वंशज चांदावत मेड़तिया राठौड़ों का निवास है। मीरां के बड़े पिता राव वीरम के पुत्र चांदा के वंशज चांदावत कहलाए। चांदा ने मेड़ता के शत्रु, मारवाड़ के शासक राव मालदेव की सेवा में रहते हुए अपने ही भाई मेड़ता के शासक राव जयमल का विरोध किया था। चांदा अंत में नागौर के सुबायत हुसैन अली के साथ युद्ध करता हुआ मारा गया था। कुड़की इसके वंशजों के पास आज भी है। कुड़की के स्वर्गवासी ठा. जोजावर सिंह और उनके परिवार का मीरांबाई के प्रति अत्यन्त आदर भाव था और वे मीरां से प्रत्येक विरासत को सुरक्षित रखते थे। १९७५ ई. के आस-पास कुड़की गया सो ठा. का देहान्त का सुना था। उनकी (वंश) की गढ़ में एक काली घोड़ी विद्यमान है, जिसका संबंध मीरां बाई से है। मीरांबाई के उपास्यदेव ‘गिरधर नागर’ की जब सवारी निकलती थी तब इस घोड़ी की पूर्व पीढ़ी वाली घोड़ी की पीठ पर निकला करती थी। यह घोड़ी केवल उनकी सवारी के अतिरिक्त वह घोड़ी घुड़साल में ही बंधी रहती थी। उसकी संतान को ना ही बेचना तथा कहीं देने की भी मनाही थी। अचम्भे की बात तो यह थी कि वि.सं. १५७३ पूर्व से लेकर २०२३ तक उस तेजरूप घोड़ी से एक ही घोड़ी जन्म लेती रही जिसका उपयोग उपास्यदेव की सवारी के लिये होता रहा। उस घोड़ी के ‘ठाण’ में एक शिलालेख भी था जिसकी छाप अभी तक मौजूद है।

‘ठीकाणा कुड़की राज मारवाड़’
शपथ :- पुराना शिलालेख में १५७३ का देख कर नया कायम किया गया। तेज रूप घोड़ी की औलाद से मादा जो हो उसको ठीकाणे में ही रखा जावे। ना तो औलाद को दी जावे न बेची जावे। इसके लिये ठा. बहादुरसिंहजी साहब के समय से तलाक दी हुई है। इस शपथ को जो तोड़ेगा वह अपने धरम से विमुख होगा।………मगसद वदि १२ सं. २०२३ जोजावरसिंह।

मीरांबाई का पितृ परिवार
जगत विख्यात सगुण वैष्णव भक्त मीरांबाई तत्कालीन मारवाड़ सियासत अथवा जोधपुर राजा के शासक राव जोधा राठौड़ की परपौत्री, मेड़ता राज्य के संस्थापक नरेश राव दूदा की पौत्री तथा मेवाड़ के सिसोदिया महाराणा सांगा (संगामसिंह) पुत्रवधु, मेवाड़ के ज्येष्ठ राजकुमार भोजराज की पत्नी थी। मीरां को तत्कालीन राजपरिवार की राजकन्या और राजवधू होने का सम्मान प्राप्त था।
मीरांबाई का पितृ परिवार क्षत्रियों में राठौड़ शाखा से संबंधित है। वीरवर राव दूदा एवं वरसिंह ने जिस मेड़ता रियासत की स्थापना की थी, उसकी राजधानी मेड़ता नगर को बनाया और उसी के कारण राव दूदा के वंशज मेड़तिया राठौड़ कहलाने लगे। मेड़तिया राठौड़ों की राजकुमारी होने के कारण ही मीरांबाई को   ‘मीरा मेड़तणी’ भी कहा जाता है। राजस्थान के क्षत्रिय समाज की परम्परा के अनुसार विवाह के पश्चात् भी कन्या अपने पितृ परिवार के वंश से ही संबोधित की जाती है पति के वंश से नहीं। इसी कारण मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश में विवाह होने के बाद भी मीरां अपने पितृवंश मेड़तिया के कारण ‘मेड़तणी’ के रूप में प्रसिद्धि पा ली। (क्रमश:)

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