गोडवाड़ की गौरव गाथा-५३

वरकाणा के जैन मंदिर
– डा. भंवरसिंह राठौड़
गोडवाड़ में अनेक जैन तीर्थ है लेकिन वरकाणा तीर्थ जहां एक ओर अपने समृद्ध अतीत और स्थापत्य कला के लिए प्रसिद्ध है, वहीं साथ ही धार्मिक दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। वरकाणा गांव कोई दो सौ घरों की बस्ती है लेकिन आज एक भी जैन परिवार का स्थाई निवास यहां नहीं है। फिर भी वरकाणा, जैन समाज का एक बड़ा तीर्थ है क्योंकि यहां पार्श्वनाथ भगवान का प्राचीन मंदिर होने के साथ ही गोडवाड़ जैन महासभा का मुख्यालय भी है और यहां एक शिक्षण संस्था है जहां प्रतिवर्ष सैकड़ों आदर्श जैन व्यक्तित्व का निर्माण किया जा रहा है।
कहते है कि प्राचीनकाल में यहां एक विशाल नगर था जिसमें हजारों जैन परिवार निवास करते थे लेकिन प्रकृति की विडम्बना के कारण यह नगर भूगर्भ में समाकर तिरोहित हो गया। पुरातत्व विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि इस क्षेत्र में हुई राजनैतिक क्रान्ति के कारण यहां के समस्त जैन परिवार यह नगर छोड़कर चले गये जिससे यह नगर उजड़ गया। वरकाणा को प्राचीनकाल में वरकणपुर या वरकणनगर के नाम से पुकारा जाता था। कहते है उस समय यहां अनेक जैन मंदिर होने का उल्लेख तीर्थ वंदना स्त्रोत में मिलता है जिससे भी वरकाणा की प्राचीनता पुष्ट होती है। ऐसा अनुमान है कि आज का दादाई गांव और बिजोवा गांव भी उसी प्राचीन वरकाणा की पवित्र भूमि पर बसे हुए है।
वरकाणा का पार्श्वनाथ भगवान का मंदिर किसने बनवाया इसके कोई ठोस प्रमाण प्राप्त नहीं है लेकिन कहा जाता है कि लगभग चार सौ वर्ष पूर्व एक किसान को खेत की जुताई के समय पार्श्वनाथ की यह प्रतिमा मिली थी जो राजा सम्प्रति के काल की बताई जाती है। इस प्रतिमा को विजोवा एवं दादाई गांव के जैन संघों ने मिलकर यहां एक मंदिर बनवाया था और इस प्रतिमा को उस मंदिर में प्रतिष्ठित करा दी। इस प्रतिमा के साथ ही मंदिर के खम्भेे, तोरण और अन्य कलापूर्ण पत्थर भी मिले जिन्हें श्री मालपुर के एक सेठ ने मंदिर को विशाल रूप देते समय उसमें लगा दिये। इस मंदिर के निर्माण के बारे में कोई शिलालेख नहीं है किन्तु मंदिर के नवचौकी के एक स्तम्भ पर एक शिलालेख है जिस पर १६वीं शताब्दी का समय अस्पष्ट उल्लेख है जिससे और इसकी बनावट के काल से ही अनुमान लगाया जा सकता है कि यह मंदिर चार सौ साल से अधिक पुराना है। इस मंदिर के लिए महाराणा अमरसिंह के समय दी गई भेंट के संबंध में ताम्रपत्र आज भी उपलब्ध है जो इस मंदिर के प्रति तत्कालीन राजाआें की भक्ति को प्रमाणित करता है।
वरकाणा तीर्थ में श्री पार्श्वनाथ भगवान के बावन जिनालय वाले भव्य एवं रमणीय मन्दिर होने के कारण यह नगर प्रसिद्ध रहा है। यह मन्दिर मूलत: पूर्वाभिमुख है। सामान्यत: भारत के मन्दिर पूर्वाभिमुख ही हुआ करते है पर यह मंदिर दो द्वारों से युक्त है। पूर्व के द्वार के साथ इसका एक द्वार उत्तराभिमुख भी है। दोनों दरवाजों के ऊपर विशाल कलापूर्ण बारादरियां व झरोखे होने से प्रवेश द्वार बड़े आकर्षक लगते है। इनमें पूर्व दिशा वाला द्वार बंद रखा जाता हैं और उत्तर की ओर वाले प्रवेश द्वार को ही मुख्य द्वार माना गया है। यह मुख्य द्वार इसीलिये माना गया है क्योंकि इस द्वार के आगे दो विशालकाय हाथी खड़े किये गये हैं। यहीं पर ही एक शिलालेख भी लगा हुआ है जिससे पता चलता है कि मेवाड़ के राणाआें पर जैन आचार्यों की सात्विक सिद्धि का प्रभाव था।
गोडवाड़ के प्रदेश सदा (महाराणा अरि सिंह तक) मेवाड़ के राणाआें के अधीन रहा है अत: इस क्षेत्र में मेवाड़ राज्य के प्रशासनिक आदेश लागू होते थे। वरकाणा में सैकड़ों वर्षों से पोष दशमी को मेला भरता है उसमें हजारों जैन यात्री भाग लेने के लिए यहां आते थे। इस मेले की व्यवस्था करने के लिये उस समय प्रत्येक यात्री से कर लिया जाता था और मेवाड़ के राणा इस मेले की पूरी व्यवस्था करते थे। महाराणा जगत सिंह के समय उनका सम्पर्क तपागच्छीय श्री विजयदेव सूरि से आया। उनके उपदेश का राणा पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि राणा ने संवत १६८६ में मेले के अवसर पर चार दिन तक यात्री कर वसूल करने पर रोक लगा दी थी। (क्रमश:)

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