गोडवाड़ की गौरव गाथा-५०

गोडवाड़ के जैन मन्दिर, राता महावीर-बीजापुर
डा. भंवरसिंह राठौड़
प्रसिद्ध जैन मंदिर राता महावीरजी के नाम से विख्यात प्राचीन मंदिर जवाई बान्ध रेल्वे स्टेशन से २० किलोमीटर दूर पूर्व दिशा की ओर बीजापुर गांव के पास ५ किलोमीटर दूर एकांत जंगल में अरावली पर्वत शृंखलाऒं के बीच स्थित है। स्वयं लेखक एवं प्राचीन पांडुलिपियों-शिलालेखों के आधार पर कभी यहां विशाल नगरी के रूप में थी। इस नगरी को हस्तिकुंडी या हथूण्डी के नाम से पुकारा जाता था और यह राष्टकुटों की राजधानी थी। इस उजड़ी नगरी का वैभव राता महावीर का ही मंदिर रह गया है जो पुरातन इतिहास को संजोये हुए अनेक उतार-चढ़ाव की कहानी दोहरा रहा है। वैसे अनेक मंदिर-खंडहर एवं बिखरे प्राचीन किले के अवशेष इस बात को पुष्ट करते है कि यहां कभी कोई विशाल नगरी अस्तित्व में थी। यहां के शिलालेखों से तो उस काल के राजाऒं की व्यवस्था और जैनाचार्यों के प्रति उनकी श्रद्धा की पूरी जानकारी मिल रही है।
राजस्थान के इतिहासकारों ने इस नगरी को व यहां के निर्माण कार्य को ५वीं शताब्दी से आंका है। इस मंदिर के बारे में इसका निर्माण राजस्थान के ५५६ जैन मंदिरों में भगवान पार्श्वनाथ के तीसरे पट्टधर आचार्य सिद्धीश्वरजी के उपदेश से श्रेष्टी गोत्र के वीरदेव ने बनवा कर आचार्य द्वारा प्रतिष्ठा करवाई थी। ऐसा भी उल्लेख मिलता है कि इस मंदिर की प्रतिष्ठा के पश्चात वि.सं. ६२३ में भीषण अकाल पड़ा था उस समय ३९वें पट्टधर आचार्य देवगुप्त सूरिश्वरजी के उपदेश से हस्तीकुंडी के लोगों ने धन एकत्रित किया और पशुऒं के चारा तथा मनुष्यों को अन्न वितरण करके `जीवदया’ का महान कार्य किया था। वि.सं. ७७८ में आचार्य कंकू सूरिश्वरजी के उपदेश से हस्तीकुंडी में २६ मंदिरों का निर्माण करवाया गया था।
इतिहासकारों के अनुसार उन दिनों हस्तीकुंडी बड़ी समृद्ध नगरी थी। यहां के राजा के पास असंख्य हाथी थे। इसी हस्ति सेना के बल पर राष्ट्रकूटों ने दूर-दूर तक अपना साम्राज्य का विस्तार किया था। यही कारण है कि राता महावीरजी की प्रतिमा के नीचे जो सिंह का जो लांछन अंकित है उसका मुख हाथी का है। संभवत: हाथियों से इस नगरी की प्रसिद्धि हुई होगी इसलिए इसका नाम हस्तीकुंडी पड़ा हो। हस्तीकुंडी के राठौड़ अत्यन्त कुशल वास्तुविद् थे, उनकी नीति-निपुणता एवं प्रजा परायणता के कारण वह नगरी बहुत सुन्दर भवनों और देवालयों से सुसज्जित थी। मंदिरों के शिखरों पर स्वर्णकलश दूर से चमकते थे। यहां की मधुर घंटियों की आवाज से घाटी गंुजायमान होती रहती थी। यहां नदी के दोनों ओर साठ कुएं और नौ बावड़ियां तथा सोलह सौ पनिहारियों की लौकिक युक्तियां आज भी इस प्रदेश में चरितार्थ होती है।
संवत १०८० में महमूद गजनवी ने सोमनाथ जाते पहले नाडोल के रामपाल चौआण व बाद में हस्तीकुण्डी के दत्तवर्मा राठौड़ से युद्ध किया। इस युद्ध में गजनवी ने हस्तीकुण्डी को बुरी तरह लूटा और उजाड़ दिया। सभी मंदिरों को तोड़ा और देव प्रतिमाऒं को भी क्षतिग्रस्त किया। हस्तीकुण्डी नगर के साथ-साथ राता महावीरजी के मंदिर ने भी थपेड़ों को झेला परंतु संतों के उपदेशों से इसका जीर्णोद्धार व पुन: निर्माण होता रहा जिससे मंदिर के मूल स्वरूप में भी बदलाव आ गया, किन्तु यह जैन मंदिर आज भी अतीत का बखान कर रहा है।
इस मंदिर का जीर्णोद्धार कार्य वि.सं. २००१ में बीजापुर रहनवासियों द्वारा आरंभ करवा कर २००६ वि.सं. में मूल मंदिर का कार्य सम्पन्न करवाया। बीजापुर श्रीसंघ की विनती पर आचार्य श्रीमद् विजय वल्लभ सूरीश्वरजी ने यहां आकर के अन्जनशलाका तथा प्रतिष्ठा महोत्सव सम्पन्न करवाया। तब से लगातार निर्माण कार्य चल रहे है। अभी वि.सं. २०६५ के अन्तर्गत इस लेख को लिखने हेतु जाने पर देखा कि नवनिर्मित-नवशिल्प के आधार पर पुन: निर्माण मंदिर का अभ्युउत्थान कार्य चल रहा है। कायापलट हो रही है। महावीर समोसरण का भी निर्माण कार्य हो रहा है। जो अपने आप में अद्भुत एवं दर्शनीय है।
राता महावीर के मुख्य मंदिर के सामने एक छोटा सा महावीर यक्ष का प्राचीन मंदिर है जिसको भी नया स्वरूप दिया जाना है। राता महावीर में मुख्य मंदिर में कुल २४ देव कुलिकाएं है। द्वार के दोनों ओर दाएं-बांए ६-६ है। अन्दर प्रवेश होने पर रंगमंडप दिखाई पड़ता है जहां दो कलापूर्ण आले है जिनमें एक में मातंग यक्ष दूसरे में सिद्धायिका देवी की प्रतिमाएं है। सामने ही मूलनायक भगवान महावीर की भव्य प्रतिमा है जिस पर लाल विलेप चढ़ा हुआ है। भगवान के प्रभासन पर दोनों ओर सिंह और बीच में हाथी के मुख है, यह प्रभासन भी नया बना हुआ है तथा पुराना प्रभासन जिस पर संव. १०५३ का लेख अंकित है वह मंदिर के एक कमरे में सुरक्षित रखा गया है। रंगमंडप की गुम्बज की स्थापत्यकला दर्शनीय-अवलोकनीय-नयनाभिराम है। मंदिर में एक भूमिगत मंदिर भी है जिसमें उतरते ही सामने लालवर्णी भगवान महावीर की प्रतिमा हैं, बाहर प्रदिक्षणा में यक्षों की प्राचीन प्रतिमाएं है और वहीं एक कमरे में एक पट्ट पर यशोभद्रसूरी, बालभद्राचार्य एवं क्षमा त्र+षि की प्रतिमाएं अकित है।
राता महावीरजी के मंदिर की यह विशेषता रही है कि जब-जब इसका जीर्णोद्धार हुआ तो प्राचीन अवशेषों को भूमि में नहीं दबा कर उन्हें एक कमरे में रख दिया गया या कमरे की दीवारों में जड दिया गया जिससे मंदिर की प्राचीनता का पता लग सके। यह कमरा इस मंदिर के इतिहास का साक्षी बना हुआ है। इस कमरे की चौखट पुराने रंग मंडप की चौखट है। कमरे में अनेक प्राचीन प्रतिमाएं, प्रभासन, शिलालेखों के अतिरिक्त प्राचीन कलाकृतियां जड़ी हुई है जो मंदिर के प्राचीन कला वैभव की अनुभूति दिलाता है।
मुख्य मंदिर के बाहर एक गुरू मंदिर भी बना हुआ है जिसमें श्रीमद् विजय वल्लभ सूरीश्वरजी की प्रतिमा स्थापित है। पास ही एक उपाश्रय है और आगे यात्री भवन बना हुआ है। यहां एक विशाल यात्री भवन और है, जिसे राता महावीर (राष्ट्रकूट) राता महावीर जैन यात्री भवन के नाम से पुकारा जाता है। इसी भवन में मंदिर की पेढ़ी, भोजनशाला और आयंबिल खाता भी चल रहा है। यहां प्रतिवर्ष चैत्र शुक्ला एवं कार्तिक शुक्ला १० को मेला भरता है जिसमें आस-पास के वन प्रान्तर से आदिवासी आकर नृत्य करते हुए भगवान महावीर की आराधना करते है।
राता महावीर तीर्थ पर पहुंचने के लिए जवाई बांध रेल्वे स्टेशन पर बीजापुर के लिये बसें व टेक्सियां उपलब्ध हो जाती है और बीजापुर से भी टेक्सियों की सुविधा प्राप्त है।
बीजापुर-हटुण्डी पर शोधकर्ताऒं से निवेदन है कि इस क्षेत्र में अपार संभावनाएं धरोहर संबंधी प्राप्ति हेतु उपलब्ध हो सकती है।

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