गोडवाड़ की गौरव गाथा-४९

मंदिर-मूर्ति-तीर्थ
– डा. भंवरसिंह राठौड़
प्राचीन काल से मानव वास्तविक शांति व आनन्द की खोज में रहा है। सांसारिक वातावरण व कार्योंकलापों तथा वर्तमान भौतिक संसाधनों से जब उसे आत्मिक शांति व आनन्द नहीं मिला तो उसने मूल स्वरूप एवं अपने पर्यावरण को जानने व उसे सुख-शांतिमय बनाने का प्रयास किया। उसने प्रकृति के सुरम्य वातावरण में शांत-एकान्त व पवित्र स्थलों को खोजा या स्वयं द्वारा ऐसे स्थलों में निर्माण करवाया। पर्वत शिखरों के नीचे गुफाऒं या सरिताऒं के तट, किनारे आश्रमों में साधना करना प्रथम प्रयास रहा। तीर्थ मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे, गिरजाघर या अन्य आध्यात्मिक स्थल उन्हीं पर्वत शिखरों या गुफाऒं के परिष्कृत रूप है।
इन स्थलों की वास्तुकला व शिल्पकला को यदि गहनता से समझें तो निश्चित ही हम पायेंगे कि इनकी बनावट हमारे घरों-आवासों से बिल्कुल अलग-थलग है। मंदिरों में पर्वतों की तरह शिखर होते है और आकाश के प्रतीक स्वरूप अर्द्ध गोलाकार गुम्बज होते है। जो आत्मलीन साधक को ब्रह्माण्ड की परम शक्तियों से या यूं कहें परमात्मा से सीधे नाता जोड़ने में परम सहायक होते है। गुम्बज के नीचे बैठकर जब हम प्रार्थना करते है या बीज मंत्र- मंत्रोच्चारण करते है तो वह गुम्बज से पुन: (इको साउण्ड) हम पर ही बरसती है।
ध्वनि विज्ञान से यह स्पष्ट हो गया है कि मधुर, लयबद्ध, कर्णप्रिय ध्वनि के प्रवाहमय-प्रभावमय ध्वनि का हमारे तन-मन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। मंत्रों की दिव्य ध्वनि हमें तरोताजा कर दिव्यता-भव्यता के धारावाहिकता से सरोबार कर देती हैं। आत्मा सहोदर से आनंद छा जा जाता है, हमारे शरीर तंत्रिका में एक नई शक्ति का संचार होता है। ऐसी ही दिव्य ध्वनि चाहे वह मंत्र ध्वनि हो, घंटानाद हो या शंखनाद, नगाड़े, ध्वनि यंत्र हमें ही नहीं पूरे मंदिर को एक बैटरी की तरह नव ज्योति- नव जागृति से चार्ज कर देती है। मंदिर से यह निकली हुई यही ध्वनि- विद्युत तरंगें आस-पास के पूरे वातायन को पवित्र-पावन कर देती है। मंदिर में घी के दीपकों की ज्योति, चंदन, धूप सुगंध इन सबके साथ निराकार परमात्मा की नयनाभिराम, वितरागमयी प्रतिमा हमें अपनी आत्मानुभूति करने में सहायक होती है। यह आत्मानुभूति नृत्य और संगीत की भक्तिपूर्ण आत्माभिव्यक्ति बन कर स्वत: प्रस्फुटित हो जाती है। मंदिरों की भव्य शिल्पकला इन्हीं पवित्र भावनाऒं की समर्पित अभिव्यक्ति है। मंदिर के बाहर भोग विलास युक्त सांसारिक, क्षणिक, तुच्छ सुख का आभास देता है, वहीं भीतर की शिल्पकला और वास्तुकला हमें आत्मीय आनंद की अनुभूति कराती है। यही तो है आसक्ति से विरक्ति की ओर प्रवेश। राग और द्वेष से मुक्त होकर वितरागता की ओर बढ़ते कदम।
मंदिर में प्रतिष्ठित मूर्तियां उन्हीं महान आत्माऒं की है जिन्होंने अपने जीवन में उस सर्वोच्च परम पद को प्राप्त किया, उनके प्रति हमारे मन में समर्पित भावों की अभिव्यक्ति है-मूर्ति। सच तो यह है कि मंदिरों में प्रतिष्ठित प्रतिमाएं किसी व्यक्ति विशेष की नहीं, उनके गुणों की, उनके आदर्शों की या उस सर्वोच्च परम पद की अवस्था ही है।
जैन मंदिरों में तीर्थंकरों की कायोत्सर्ग की मुद्रा में खड़ी या पद्मासन की मुद्रा में बैठी हुई प्रतिमाएं मिलती है। काम, क्रोध, मद (अहंकार) मोह और लोभ से विरक्त, राग व द्वेष से मुक्त वीतरागता की मूर्ति।
प्रभु प्रतिमा के दर्शन, पूजन, चिन्तन, मनन और वैसी ही स्थिति में अपने आपको समाधिस्थ करना अपूर्व अलौकिक आनंद की अनुभूति है। जब यह अनुभूति प्रगाढ़ हो जाती है तो मानव का शरीर स्वयं मंदिर और आत्मा-परमात्मा हो जाता है।
सैंकड़ों-हजारों वर्षों पूर्व तीर्थंकरों ने, आत्मसाधकों या महापुरूषों ने अपनी साधना द्वारा उस दिव्य-अलौकिक परमपद को प्राप्त किया और अपनी उस दिव्यता से जिन-जिन स्थलों को आलोकित किया, जहां-जहां उनके चरण कमल पड़े वे सभी स्थल तीर्थ बन गये। आज भी उनकी दिव्य विद्युत तरंगे उन तीर्थ स्थानों में सघनता से मिलती है, जहां मानव निर्मित कलुषित वातावरण नहीं पहुंचा है। आज भी ऐसे दुर्गम, शांत, एकांत, रमणीय पर्वत शिखरों, झरनों या नदियों के तट पर बने तीर्थ स्थल आत्म साधक को तीकाता से, सघनता से परमात्मा से जोड़ देने में सक्षम है, या ऐसे समझे कि मूर्ति और मंदिर और तीर्थ, एक प्रकोष्ठ है। जहां कोई नहीं जाता। ऐसा कहते है कि यह उस भूमिगत सुरंग का द्वार है जो नारलाई तक बनी हुई है। इस भूमिगत प्रकोष्ठ के द्वार पर आचार्य मानदेव सूरिजी की प्रतिमा प्रतिष्ठित की गई है तथा यहां पर १७५० वर्षों से अखंड ज्योति प्रज्वलित है। नेमीनाथ भगवान के मंदिर की अन्य देव कुलिकाऒं में अनेक देवताऒं की मूर्तियां स्थापित है। इस मंदिर की बनावट भी प्राचीन लगती है।
पद्म प्रभु एवं नेमीनाथ भगवान के दो मंदिरों के अतिरिक्त नाडोल में दो जैन मंदिर और भी है, जो भगवान त्र+षभदेव तथा जीरावला पार्श्वनाथ के है। इन सभी मंदिरों की व्यवस्था नाडोल का श्री संघ देखता है। यहां यात्रियों के ठहरने के लिये मंदिर के निकट ही धर्मशाला है, जहां बिजली, पानी, बिस्तर तथा पूजा के लिए वस्त्र एवं भोजनशाला की भी सुविधा उपलब्ध है। नाडोल के लिये रानी स्टेशन से बसें एवं टैक्सियों की सुविधा सुलभ है। नाडोल रानी से १५ किमी दूर पूर्व की ओर है। (क्रमश:)

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