मेवाड़ के गौरव-235

कविराजा श्यामलदास
महाराणा सज्जन सिंह और श्यामलदास में परस्पर अनन्य प्रेम था। पारिवारिक जीवन में तो दोनों एकात्म थे केवल दरबारे में उनका व्यवहार स्वामी-सेवक का रहता था। जहां कविराजा की हमेशा राणाजी के प्रति स्वामी भक्ति थी वहीं महाराणा सज्जन सिंह में कविराजा के प्रति सहोदर का सा भाव था। महाराणा साहब कविराजा के परिवार को अपना परिवार मानते थे। कविराजा अपनी मां को  `बहुजी’ और बहिन को `बाईजी’ कहकर पुकारते थे वैसे ही महाराणा कभी उनके घर पधारते थे तो वो भी कविराजा की तरह ही मां अथवा बहन को `बहुजी’ या `बाईजी’ पुकारते थे। उनके जीवन की  अनेक घटनाएं है जो उनके प्रगाढ़ प्रेम को प्रदर्शित करे हैं। उनमें कुछ घटनाएं यहां दी जा रही है।
एक बार महाराणा अपने साथियों के साथ हाथियों पर जगदीश चौक तक पहुंचे। वहां पहुंच कर महाराणा ने कहा- `सांवल जी (महाराणा श्यामदलदास को इसी नाम से पुकारते थे) आप अपने साथियों के साथ बाजार होते हुए कोतवाली जाओ। मैं घाणेराव से होते हुए कोतवाली (घण्टाघर) पहुंचता हूं देखें कौन वहां पहले पहुंचता है।’ ऐसा कह कर महाराणा घाणेराव की घाटी ओर मुड़ गये। कविराजा की हवेली भी घाणेराव की घाटी पर ही थी। महाराणा सीधे हवेली पहुंचे। हाथी से उतरे और हाथी को सामने वाले मकान के ढूंढे में छिपा दिया और स्वयं चुपके से एक अंधेरी नाल में से होते हुए गौयाण की हवेली, जो उस समय कविराजा के उपयोग में आती थी, की छत पर पहुंच गये और पहरे वाले को हुक्म दे गये कि कविराजा आये तो कुछ मत कहना। कविराजा ने कोतवाली पहुंच कर देखा कि दरबार अभी तक नहीं पहुंचे। श्यामलदास को यह समझते देर न लगी कि महाराणा  ने अपना मार्ग घाणेराव का क्यों चुना है। वे सीधे अपनी हवेली पहुंचे, सिपाही से पूछा। वह कविराजा के प्रभाव से कांपने लगा पर कुछ बोला नहीं पर संकेत से बता दिया कि महाराणा कहां गये ? कविराजा दौड़ते हुए छत पर पहुंचे जहां महाराणा जी बैठे हुए थे। छत पर जनानियों के कपड़े सूख रहे थे। आते ही कपड़े बटोरते हुए कुछ बड़बड़ाने लगे। राणाजी उनके गुस्से का कारण समझ कर बोले कि नाराज न हो, बेचारी घर छोड़ कर कहां सुखाती। फिर दोनों हंसते हुए हाथियों पर बैठकर महलों की ओर चले गये। (कान्तिकारी बारहठ केसरी सिंह, पृष्ट 249)
गर्मी के दिन थे। कविराजा महलों में अपने कमरे में जिसे `कविराजा की ओवरी’ कहते हैं में मध्याह्न में सुस्ता रहे थे। उनका निजी सचिव था- दशोरा ब्राह्मण दुर्लभराम, जो दुबला पतला था। उसके जांघ पर अपना सिर रखकर वे लेटे हुए थे। दुर्लभराम पंखी से हवा कर रहा था उस हवा में कब नींद आ गई उन्हें पता न चला। महाराणा सुख महलों में विराजते थे। महाराणा को एक पुस्तक की आवश्यकता पड़ी जो महलों के ऊ परी भाग में सरस्वती भण्डार में थी। वे चाहते तो किसी सेवक को भेज कर वह पुस्तक वहां से मंगा सकते थे। पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। इस बहाने वे अपने अनन्य से मिलने भी जाना चाहते थे। प्रेमवश उस गर्मी में एक पुस्तक लेने के लिए महाराणा कविराजा की ओवरी में पहुंचे तो देखते क्या है कि दुर्लभराम की जंघा पर सिर रखकर कविराजा सो रहे है और दुर्लभराम पंखा कर रहे है। महाराणा को वहां पाकर वह ब्राह्मण तो घबरा गया। पर महाराणा ने हाथ के इशारे से शान्त रहने को कहा और इशारे में यह भी कह दिया कि कविराजा को जगाओ मत। तुम ऊ पर जाकर सरस्वती भण्डार से अमुक पुस्तक निकाल लाओ। परन्तु दुर्लभराम की जंघा पर तो कविराजा का सिर था वह कैसे उठता। अतः राणा ने धीरे से उसका सिर अपनी जांघ पर ले लिया और पंखी लेकर उसे हवा करने लगे। दुर्लभराम ऊ पर के महलों में गये। इधर उस ब्राह्मण की पतली जांघ के स्थान पर महाराणा की पुष्ट जांघ थी और पंखी के हवा के झोके में भी बल कुछ दूसरा ही था। इस परिवर्तन से कविराजा की आंख खुल गई, देखा स्वामी सेवा कर रहे हैं। वे घबरा कर उठ बैठे और कहा- ‘कहां गया वह नालायक मुझे जगाया तक नहीं।’ महाराणा ने उसे कहा, नाराज मत हो, मैंने ही उसे ऐसा करने को कहा था। (वही-पृ.249)
ऐसी छोटी मोटी अनेक घटनाएं है जो युवा, गंभीर और तेजस्वी असाधारण महाराणा के उछलते प्रेम और प्रौढ़ सेवक कविराजा की अगाध स्वामी भक्ति की असाधारणता को प्रकट करती हैं। ये ही व्यवहार असंदिग्ध रूप से सिद्ध करते है कि महाराणा सज्जन सिंह के यशस्वी शासन काल में मेवाड़ ने जो आधुनिक सुधारों का पहला डंका बजाया उसमें नवीन भाव और व्यवस्था का उद्गम था। कविराजा का हृदय और उद्घोषणा की गुण ग्राही महाराणा की आज्ञा ने। शब्द और अर्थ के समान वे दो नहीं एक ही थे। (वही पृ.250) (क्रमशः)

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