मेवाड़ के गौरव-२३०

सन्त सूरमाल दास
सन् १८७४ तक संत सूर जी का भगत आन्दोलन दक्षिणी राजस्थान के डूंगरपुर, बांसवाड़ा, दक्षिणी मेवाड़, भोमट के क्षेत्र व गुजरात के मही काण्ठा व उसके समीपवर्ती स्थानों के भीलों में स्थान प्राप्त कर चुका था। इस क्षेत्र को चुन कर गांव-गांव जाकर अपने वाणी से उन्हें प्रभावित किया। अपने पंथ के विस्तार के लिये वे व्यक्तिगत रूप से बातचीत करते थे, जो उनके शिष्य बनने योग्य होता उसे चुनते तथा तीन चरणों में उसका परीक्षण कर उसे शिष्य बनाते थे। इस प्रकार से जो उनके शिष्य बनते थे वे फिर उस पंथ को छोड़ कर नहीं जाते थे। सन् १८७४ में उनके लगभग १००० शिष्य बन चुके थे जो १८७७ ई. में बढ़ कर तीन हजार हो गये थे। इस भगत आन्दोलन के कारण भीलों के जीवन में काफी अन्तर आ रहा था।
सूर जी के उपदेश ही कुछ ऐसे थे जो व्यक्ति को नैतिक जीवन व्यतीत करने को प्रेरित करते थे। उनके अनुसार ईश्वर एक है जो सभी जीवों में समान रूप से व्याप्त हैं अत: हिंसा करना ईश्वर का ही हनन है। उन्होंने मांस भक्षण को महापाप माना। हर जीव के प्रति दया और सभी के प्रति प्रेम और सद्भावना रखने का उनका हमेशा आग्रह रखता था। मद्यपान, चोरी, व्यभिचार, झूठ बोलने आदि का उन्होंने सदा निषेध किया। उनका विश्वास था कि घर की स्वच्छता, शरीर की स्वच्छता और सात्विक आहार व्यक्ति को ईश्वर के समीप ले जाता है। ईश्वर की आराधना के लिये वे हमेशा `रामनाम’ के जाप के लिये ही कहा करते थे। इसीलिये इस पंथ के अनुयायी आज भी जब आपस में मिलते है तो `जय सीताराम’ कह कर ही एक दूसरे का अभिवादन करते हैं। (वागड़ के संत- पृ.- १३३)
इस प्रकार के उदार और सुधारात्मक उपदेशों के कारण इस आन्दोलन को सामाजिक आधार मिल चुका था। अपने पंथ के विस्तार के लिये संत सूर जी व्यक्तिगत सम्पर्क स्थापित कर व्यक्ति का चयन कर जहां अपने अनुयायी बनाते थे वही अपने तीन प्रमुख सहयोगियों (शिष्यों) के माध्यम से भी अपने अनुयायियों में वे वृद्धि कर रहे थे। ये तीनों उनके पदचिह्नों पर चलते हुए इस पंथ में परिवर्तन करवाने में सहयोग कर रहे थे।
संत सूर जी के पंथ का प्रमुख केन्द्र उनका गांव लसोड़िया ही था जहां उन्होंने प्रथम घूणी स्थापित की थी। इसके अतिरिक्त बांसवाड़ा में अर्थूणा, कोना, डूंगरपुर में बीजा, माथुगामड़ा, हीराता, माल चौकी, सीमलवाड़ा व उदयपुर राज्य में केसरियाजी, पोगरा, निम्बोद व सराड़ा आदि जगहों पर संत सूरमाल दास की धूणिया है। इन धूणियों की जीवन्तता और वहां पर आने वाले अनुयायियों को देख कर कहा जा सकता है कि उनका यह पंथ आज भी इस क्षेत्र के भीलों में उनके उपदेशों और सिद्धांतों की छाप छोड़ रहा है। (वही पृ.- १३५)
उनके देवलोकगमन के बाद भी उनके उत्तराधिकारियों तथा शिष्यों द्वारा यह पंथ विकास के मार्ग पर अग्रसर होता रहा। इस पंथ के प्रथम उत्तराधिकारी हुए उनके एक मात्र पुत्र जलदास। जलदास के दो पुत्र कानदास और धनदास हुए। कानदास के पांच पुत्र हुए उनमें से एक श्री रणछोड़ दास डूंगरपुर की लासोड़िया गांव में धूणी के प्रधान थे। (वही. पृ.-१३४)
आज उनके पंथ के प्रभाव का यदि हम मूल्यांकन करे तो हम पायेंगे कि संत सूर जी के पंथ के विस्तार के कारण ही भीलों में नैतिकता का विकास हुआ। आगे चल कर गोविन्द गुरू और मोतीलाल तेजावत के भील आन्दोलन के सफलता के पीछे इनका ही भगत आन्दोलन था। यह आन्दोलन यदि पूर्व में न हुआ होता तो भील इतनी जल्दी उनके नेतृत्व में संगठित न हो पाते। गोविन्द गुरू का भगत आन्दोलन तो संत सूरी जी के कारण व्यापक रूप ले सका।
सन्त सूरमालदास के पंथ का भीलों पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि वे नैतिक जीवन जीने लगे। पूर्व में भील चोरी करते थे, डाका डालते थे, लूट खसोट करते थे, संत जी के प्रभाव के कारण बहुत सारे भील खेती की ओर उन्मुख हुए और किसानों की भूमि पर व्यवस्थित हो कृषि कार्य करने लगे और विशेष रूप से पोल पट्टा के भीलों ने मेवाड़ भील कोर्पस तथा मही काण्ठा एजेंसी फोर्ट पुलिस में भाग लिया और अपने व्यवहार से सभी को प्रभावित किया। इस संदर्भ में `द इम्पीरियल गजेटियर ऑफ मही काण्ठा’ ने १८८० ई. में यह तथ्य दिया है कि इस क्षेत्र का एक भी भील ऐसा नहीं था जो किसी अपराध में दोषी पाया गया हो। (वही-पृ. १३६)
वास्तव में संत सूरमालदास का एक ही उद्देश्य था कि समस्त भील समाज विकास की ओर हो, अपना जीवन उन्नत बनाते हुए देवत्व की ओर अग्रसर हो। उनका कार्य भील समाज में सुधारवादी कार्य था। उन्होंने कभी भीलों को शासकों व जागीरदारों के विरूद्ध विद्रोह करने का सुझाव नहीं दिया। उनके अनुयायियों ने धार्मिक व सामाजिक आधार पर ही अपने व्यक्तिगत जीवन का विकास किया। निश्चित ही संत सूरमालदास ने संत मावजी द्वारा प्रज्वलित समाज सुधार की ज्वाला को जलाए रखा। (क्रमश:)

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