मेवाड़ के गौरव-२२९

संत मोहनलाल चौहान
मोहन जी के जीवन में हम दृष्टिपात करे तो लगता है कि ईश्वर ने ही भक्ति और योग की धारा में निरन्तरता रहे इसीलिये उन्हें इस भूमि पर अवतरित किया। जिस भक्ति धारा को ठाकुर गुमानसिंह जी ने प्रवाहित किया और बावजी चतरसिंह महाराज ने जिसे गति प्रदान की उसी धरा को निरन्तर प्रवाहित करने के लिये उन्हें इस संसार में इस पवित्र कुल में भेजा- वे लिखते है-
बिना पाप का धन्धा पाया दरजी का जाया पाया रे।
गरभ मास में सतगुरू पाया अजपा जाप जगाया।
उलटा होय तप कीन्हा गर्भ दु:ख सरल मिटाया रे।।
स्वयं मोहन जी स्वीकार करते है कि जन्म से पहले गर्भ में ही परम तत्व का ज्ञान उन्हें प्राप्त हो गया था और ऐसे परिवार में जन्म लिया जिसमें आय के स्रोत निष्पाय थे। यही नहीं आगे स्वयं लिखते है कि साधना का सारा ज्ञान उन्हें अपने पैदा गुरू (दादाजी-संत थाना जी) से ही प्राप्त हो गया था। उन्हीं की दी हुई शिक्षा से घर बैठे ही ईश्वर की प्राप्ति हो गई थी-
पैदा गुरू कह सीख बालपन मुद्रा साधन लाया।
मन को दमन सुरत कर निरता आतम ज्ञान जगाया रे।
पुण्य खरीदो हीरा देवो निश्चय हाट लगाया।
मोहन कहत सुनो भाई साधो घट पर साहन पाया रे ।।
बाल्यकाल में ही मोहनजी को योग साधना की शिक्षा मिल गई थी जिसके कारण उनमें आत्मज्ञान की जागृति हो गई थी। यही कारण है कि उनके योग सम्बन्धी पद भी अधिक है। योग साधना में उन्होंने कठिन से कठिन योग मुद्राआें और त्र+तंभ्ज्ञरा प्रज्ञा का भी अभ्यास किया था। इन मुद्राऒं में खेचरी, भूचरी, अगोचरी, चांचरी, उन्मनी आदि प्रमुख है। ये सब उन्हें गुरू प्रसाद के रूप में प्राप्त हुई थी- इस साधना के बारे में वे लिखते है-
मन मेरो मुद्रा को साधन कीजे, साधन कर सुख लीजे।
पहेली पहली मुद्रा खेचरी कहीजे, वी रो साधन कीजे।
शशि मणुल सूं अभरित बरसे जीब उलट कर पीजे।
मोहनजी ने १५ वर्ष की अवस्था में ही लिखना प्रारंभ कर दिया था। उनके लेखन में योग विषय तो था ही साथ ही उनके लेखन पर गीता का बहुत अधिक प्रभाव था जो उनके उदाहरणों में यत्र तत्र दिखाई देते है। जो श्लोक उन्हें अधिक भाते थे उन्हें  उन्होंने लोकवाणी में अनुवाद भी कर डाला। वे कहा करते थे `जीवन ही तो है गीता। गीता के पास शंका ले जाओ वह हर शंका का समाधान कर देगी।’
मोहन जी ने जो पद लिखे है उनमें पद्य और गद्य दोनों लिखे पर पद्यों की संख्या अधिक है। ये पद्य विभिन्न रागों पर आधारित लिखे गये है। राग-रागिनियों को देखकर लगता है मोहन जी को संगीत का भरपूर ज्ञान था। इसी आधार पर आपने पद, सवैये, दोहे, छप्पय, कवित्त और रासों आदि लिखे है। लोकतर्ज पर आपने गीतों की रचना भी की है। उनकी इस समस्त कृतियों में तेरह विश्व देव, पतंजलि गीता, प्रेम तार, भजन माला, गुरू महिमा, सप्तक, अनुभव प्रकाश, प्रश्नोत्तरी गीता, योगतत्व, रामचरितम, श्रीकृष्ण चरीतम, मोहन सतसई, कुण जाणै, चेतावनी, मोहन भाव, भजन माला, सत्सबद प्रकाश आदि का अब तक पता चला है। ४५ वर्ष तक आपने जो लेखन किया है उसमें लगभग ५०,००० पद लिखे हैं जिनका विश्लेषण करना अभी बाकी है।
ये समस्त पद अभी अप्रकाशित हैं। उनके लिखे पद कई लोग गा रहे है। वास्तव में उनका साहित्य लोगों की कसौटी पर खरा उतरा और एक कण्ठ से दूसरे कण्ठ में प्रवाहित होता रहा और समाज व्यापी हो निखार पाता रहा। लोक तर्ज पर तैयार किये भजन जल्दी ही जन-जन में व्याप्त हो गये। उनके पद चाहे साहित्य के रूप में प्रकाशित न हुए हो पर उनके गेय पदों से समाज परिचित है। उनके पदों में सुने गये पदों में एक पद यह भी है-
अणी रे जनम री मौज लूट, मनख जमारो अमर जड़ी।
आठ मास ने तीस दिनां ताई अणी मूरत ने राम घड़ी।
छ: चक्कर ने अष्टकमल में होद आतमा गुपत गाड़ी।
त्रिवेणी में पाप धोई ले उठा ध्यान में भजन घड़ी।
मोहन मिनखा देह मिली है गुरू सेन सूं परख पड़ी।।
उनका सम्पर्क तत्कालीन साहित्यकारों, भक्तों, एवं ईश्वर में आस्था रखने वाले महानुभावों से रहा था इनमें स्वामी अखण्डानन्द सरस्वती मुम्बई, श्री जयदयाल गोयन्दका, भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार, हजरत दीवानाशाह कपासन, महात्मा भूरीबाई नाथद्वारा, गोस्वामी गोविन्दलाल जी महाराज, नाथू बा लाल मादड़ी व आचार्य तुलसी आदि प्रमुख है।
मोहन जी का विवाह १७ वर्ष की अवस्था में सन १९४८ में साकरोदा के मोतीलाल जी गहलोत की पुत्री श्रीमती संतोष देवी के साथ हुआ। अपने गृहस्थ जीवन का निर्वाह करते हुए आपने खूब लिखा। आपके कुल सात संताने हुई- छ: पुत्र और एक पुत्री। इसमें दूसरे क्रम में पुत्र श्री कृष्ण डा. जुगनू है इनका जन्म भी जन्माष्टमी के दिन ही हुआ है। मोहन जी के देहावसान के पश्चात ही उनके साहित्य के खोज का काम डा. जुगनू कर रहे है जो स्वयं भी विपुल साहित्य का सृजन कर चुके हैं।
(यह सम्पूर्ण जानकारी संत मोहनलाल जी के सुपुत्र डा. श्रीकृष्ण जुगनू से प्राप्त हुई है-आभार) (क्रमश:)

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