गोडवाड़ की गौरव गाथा-55

गोडवाड़ के जैन मंदिर जाखोड़ा
डा. भंवरसिंह राठौड़
गोडवाड़ क्षेत्र में जैन संस्कृति कितनी प्राचीन और विस्तार में रही है। इसकी साक्षी, प्रमाण तो यहां के तीर्थ दे रहे है- जहां आज जाखोड़ा में एक भी जैन परिवार निवास नहीं करता परन्तु वहां के तीर्थों का विस्तार अधिक है। जाखोड़ा का एक तीर्थ श्री शांतिनाथ भगवान का वह मंदिर है जिसमें भगवान की पद्मासनरूप प्रवाल वर्ण की चमत्कारी प्रतिमा विद्यमान है। मंदिर की प्रभु की प्रतिमा की अंजनशलाका आचार्य श्री मानतुंग सूरिश्वर जी की पावन निश्रा में उन्हीं के हाथों सम्पन्न हुई थी। विक्रम की पन्द्रहवीं शताब्दी में मेघ कवि द्वारा रचित तीर्थमाला में इस तीर्थ का उल्लेख है। मूलनायक की प्रतिमा के परिकर पर सं. 1504 का लेख उत्कीर्ण है लेकिन इस परिकर के बारे में यह मान्यता है कि यह किसी अन्य मंदिर से श्री पर्श्वनाथ भगवान का परिकर लाकर यहां लगाया गया है।
जाखोड़ा गांव पर्वतीय शिखरियों की गोद में देखते ही बनता है। इस भू-भाग में शिखरबन्ध धवल मंदिर एकान्त में होने के बावजूद भी अपने चमत्कारों से यहां के निवासियों को चमत्कृत कर रहा है। कहते हैं कि गांव में पेयजल का बड़ा संकट था, कि मंदिर के अधिनायक देव ने कोलीवाड़ा के चान्दाजी को सपने में मंदिर के निकट ही पानी होने का संकेत दिया जिससे विश्वास से कुंआ खुदवाया गया जिसमें पानी का भंडार जो मीठा पानी की प्राप्ति हुई। इसी प्रकार जनश्रुति से अनेक चमत्कारों के बारे में यहां के लोग बतियाते है।
इस तीर्थ पर यात्रियों के ठहरने के लिये धर्मशाला है, जहां सभी सुविधाएं सुलभ है। जाखोड़ा तीर्थ स्थल पाली-सुमेरपुर सड़क मार्ग पर सुमेरपुर से दस किलोमीटर की दूरी पर सड़क से पांच किलोमीटर पूर्व की ओट अन्दर में स्थित है।

खीमेल
खीमेल गांव भी गोडवाड़ क्षेत्र का प्राचीन एवं जैन समाज की घनी आबादी वाला गांव है। यहां तीन जैन मंदिर है जिसमें सबसे प्राचीन मंदिर गांव के पूर्वी किनारे नदी तट पर स्थित है। मूलनायक भगवान श्री शान्तिनाथजी है। यहां के लेख अनुसार इस गोपर का निर्माण वि.सं. 1189 में लीलाशाह ओसवाल द्वारा करवाया गया था। मूलनायक भगवान के परिकर की कला दर्शनीय है। शांतिनाथ भगवान की प्रतिमा पर उत्कीर्ण लेख से ज्ञात होता है कि उनकी अंजनशलाका से 1130 वैशाख शुक्ला 10 को हेमसूरिजी द्वारा हुई थी। इसी मंदिर के पास एक बड़ी प्राचीन प्रतिमा स्थापित है जो आकर्षक होने के साथ ही कलापूर्ण है। इस मंदिर के रंगमंडप व गूढमंडप की शिल्प कला दर्शनीय है और बाहर द्वार पर दो हाथी इसकी शोभा बढ़ा रहे है।
खीमेल का दूसरा जैन मंदिर गांव के बाहर स्थित है। इस बावन जिनालय वाले भव्य मंदिर का निर्माण वि.सं. 1920 में सेठ श्री खूमजी गदैया की धर्मपत्नी श्रीमती नगीबाई ने करवाया था। एक महिला को मन्दिर निर्माण की प्रेरणा एक मिसाल है। प्रेरणा कैसे हुई, जानकारी प्राप्त न हो सकी। कहते है कि नगीबाई को एक स्वप्न के द्वारा मंदिर बनाने की इच्छा दिखाई दी, इस धर्मव्रतधारी महिला ने अपने ध्येय और मेहनत से गांव के जैन संघ तथा अन्य संघों से भी धन एकत्रित करके मंदिर निर्माण का संकल्प पूरा किया।
वि.सं. 1928 में यहां मूलनायक भगवान ऋषभदेव की श्यामवर्णी प्रतिमा स्थापित कर दी गई थी जबकि मंदिर की केवल 14 देहरियों का ही निर्माण हुआ था और 1958 वि सं. में मन्दिर का प्रतिष्ठा समारोह आयोजित किया गया। इस समारोह में भाग लेने के लिये अपार जनसमूह उमड़ पड़ा था। खीमेल गांव के बाहर नदी के किनारे मेहता मोकमसिंह द्वारा निर्मित एक विशाल बावड़ी के पास ही श्री विजयराजेन्द्र सूरिजी का समाधि स्थल (मंदिर) भी विद्यमान है। यहां तीर्थयात्रियों के लिये सुविधाजनक धर्मशाला भी है। खीमेल गांव रानी गांव से 6 कि.मी. की दूरी पर स्थित है।(क्रमशः)

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