गोडवाड़ की गौरव गाथा-54

वरकाणा के जैन मन्दिर
डा. भवरसिंह राठौड़
पार्श्वनाथ भगवान के मंदिर में प्रवेश करते ही नव चौकी आती है जहां मुख्य मंदिर के ठीक सामने एक हाथी और उस पर बैठे सेठ-सेठाणी की प्रतिमा है जिस पर कोई लेख नहीं होने के कारण ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि इस मंदिर के निर्माण में इसका विशेष सहयोग रहा होगा। मूल मंदिर में प्रवेश करने से पूर्व कलापूर्ण झरोखा और बारीक नक्काशी वाले खंम्भे मंदिर के अन्दर की स्थापत्य कला का आभास दिला देते है। आध्यात्म एवं कला का अद्भुत संगम वरकाणा तीर्थ में आते ही प्रत्येक व्यक्ति आश्चर्यचकित हुए बिना नहीं रहता। अनेक बार तो यह आभास होने लगता है कि यह मंदिर  रणकपुर मंदिर की छोटी कृति मान लें! मंदिर की शिल्पकला बेजोड़ है, रंगमंडप की कोरणी और तोरणद्वार की बनावट भी सुन्दर है। लगता है शिल्पियों ने अपनी सम्पूर्ण कला से इस मंदिर को सजाया गया है, संवारा है। मंदिर में शान्त मुद्राओं वाली जैन प्रतिमाएं इस तीर्थ की अमूल्य निधि है। मंदिर के चारों ओर खंभों की कतार और उनकी एकरूपता भी यहां के शिल्प कौशल का चमत्कार है। रंगमंडप, कलापूर्ण स्तम्भों व गुम्बज बना कर निर्मित किया है परन्तु दीवारों पर अनेक प्रकार की भावभंगिमाओं के साथ जिन प्रतिमाओं का निर्माण किया गया है, उसे देखकर दर्शक दंग रहे बिना नहीं रह सकता। मंदिर से ही जुड़ी प्रदक्षिणा में छोटी-छोटी देवकुलिकाओं की लम्बी कतार है जिसमें चलने के लिए छोटा मार्ग है।
वरकाणा तीर्थ के मूलनायक भगवान श्री पार्श्वनाथजी की नागफणी वाली प्रतिमा चित्त का आनन्द करने वाली है। इस प्रतिमा के दर्शन करने से लगता है जैसे मैंने आज सब कुछ पा लिया हो, यही अनुभूति हजारों यात्रियों को बार-बार यहां आने को विवश करती हैं। इस मूल प्रतिमा के अतिरिक्त अन्य कई छोटी-बड़ी प्रतिमाएं इस मंदिर में प्रतिष्ठित हैं। यहां अन्य जेन तीर्थंकरों की प्रतिमाओं के दर्शन भी होते हैं। प्राकृतिक प्रकाश वाले रंगमण्डप की छत पर नृत्य मुद्राओं में अनेक मोहक मूर्तियां है, कहीं श्रृंगार में लीन तो कहीं दर्पण देखती हुई। इन कलापूर्ण मूर्तियों को देखकर दर्शक मौन हो जाता है और यह मूर्तियां जैसे बोलने लगती है।
वरकाणा तीर्थ के जिनालय का मुख्य शिखर और उसके चारों ओर छोट-छोटे शिखर ऐसे लगते है जैसे खिला हुआ कमल। उंचे और तीखे शिखरों के साथ गोलाकार घुमट भी बहुत सुन्दर लगते है। मंदिर के बाहर अधिष्ठायक देव की प्रतिमा है जो अत्यन्त चमत्कारी है। देश के सभी भागों से धर्मपेमी यहां प्रतिदिन आते है तथा भगवान श्री पार्श्वनाथ के दर्शन कर अपना जीवन सफल बनाते है। मंदिर के पास ही यात्रियों के लिये भोजनशाला तथा आवासीय आधुनिक सुविधाओं से युक्त धर्मशाला भी है।
यहां भगवान पार्श्वनाथ के नाम पर ही चल रहे जैन विद्यालय के छात्रों को सुसंस्कृत तथा धर्मप्रेमी बनाने में इस तीर्थ की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। विद्यालय के बालक नियमित रूप से भगवान के दर्शन करने मंदिर जाते है, वहां पूजा अर्चना करते है।
आधुनिक भौतिकवाद की चकाचौंध से बेचैन तथा अशान्त व्यक्ति इस तीर्थ पर आकर परमशान्ति अनुभव करता है तथा भगवान पार्श्वनाथ के दर्शन करने से उसकी आत्मा जागृत होती है। वरकाणा तीर्थ रानी स्टेशन से 6 किलोमीटर दूर है तथा रानी से देसूरी मार्ग पर स्थित है। वरकाणा के बिल्कुल पास ही बीजोवा गांव में भी आकर्षक जैन मंदिर है जिसमें गांव के बीच चिंतामणी पार्श्वनाथ का प्राचीन मंदिर कलापूर्ण है तथा दूसरा नवनिर्मित मंदिर सड़क पर, बस स्टेण्ड पर है, जिसमें घंटाकर्ण महावीर भगवान की प्रतिमा स्थापित है।
इन सभी मन्दिरों के कारण वरकाणा गोरवाड़ क्षेत्र के पंचतीर्थों में से एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। राणकपुर आने वाला यात्री इन मन्दिरें में आकर इन मन्दिरों के दर्शन अवश्य करता है। (क्रमशः)

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