गोडवाड़ की गौरव गाथा-५२

जैन मंदिर सेवाडी
सेवाडी तीर्थ अति प्राचीन है। यहां जैन मंदिर में उत्कीर्ण लेखों से ज्ञात होता है कि यह कभी बडे नगर के रूप में विख्यात रहा होगा। उसको श्री वाडी, शतवाटिका, श्वेत पाटी, सीमापाटी, सिव्वाडी-सेवाडी आदि नामों से पुकारा जाता रहा। इसकी प्राचीनता के संबंध में वि.सं. ११६७ व ११७२ के लेख मंदिर में है जो इसके पुरातन इतिहास को संजोये हुये है। यहां दो जैन मंदिर है। गांव के मध्य में स्थित मंदिर प्राचीन है, दूसरा मंदिर गांव के बाहर है। यह नवनिर्मित है।
प्राचीन मंदिर में शांतिनाथ भगवान की पद्मासनस्थ श्वेत वर्ण की आकर्षक प्रतिमा प्रतिष्ठित है लेकिन वि.सं. ११७२ के लेख में यहां मूल नायक श्री महावीर भगवान के प्रतिष्ठित का उल्लेख है। लेकिन सं. २०१४ में जीर्णोद्वार के समय श्री शांतिनाथ जी भगवान की प्रतिमा प्रतिष्ठित की गई है और प्राचीन प्रतिमा को बाहर स्थापित किया है। मंदिर के मूलनायक को बदलने के पीछे भी कुछ वजह अवश्य रही है जिसके बारे में कहा जाता है कि किसी जैनाचार्य ने कहा कि यहां मंदिर में शान्तिनाथ की प्रतिमा स्थापित करने से सेवाडी के श्रावकों में समृद्धि आयेगी, इसलिये जीर्णोद्धार के समय मूलनायक की प्रतिमा भगवान महावीर के स्थान पर शांतिनाथ भगवान की प्रतिष्ठा करवाई गई। कहते हैं उसके बाद सेवाडी के श्रावक काफी समृद्ध हुये है।
इस मंदिर की सभी प्रतिमाएं तेरहवीं शताब्दी की प्रतीत होती है, अनेक प्रतिमाऒं पर कोई लेख नहीं है। संडेरगच्छीय आचार्य यशोभद्र सूरीश्वर जी की परम्परा के शिष्य गुणरत्न सूरिश्वर जी की प्रतिमा कलापूर्ण होने के कारण विशेष दर्शनीय व प्रभावित है जिस पर वि.सं. १२८८ का लेख उत्कीर्ण है। बावन  जिनालय वाले इस प्राचीन मंदिर की देवकुलिकांऒं में अनेक देवताऒं की प्राचीन मूर्तियां स्थापित है लेकिन मंदिर के मूल गंभारे के पाट पर १६ मिथदेवियों की मूर्तियां और धन कुबेर की मूर्तियों में प्राचीन कला सोष्ठव छैनी का कमाल हासिल करता है। शिलालेखों के अनुसार चौहान कटुकराज के महान सेनापति यशोदेव द्वारा इस जिनालय के एक गोखले में शांतिनाथ भगवान की प्रतिमा प्रतिष्ठित करवाये जाने का उल्लेख है।
सेवाडी पूर्व काल में एक समृद्धशाली व्यापारिक, धार्मिक, क्षेत्र का, जैन मतावलम्बियों का केन्द्र स्थल के रूप में पहचान कराता है। वर्तमान गांव के आसपास अनेक पुरातत्व व ऐतिहासिक सामग्री बिखरी पड़ी है। बस स्टेण्ड, वर्तमान उच्च मा.वि. के सामने ११-१४ शताब्दि की अनेकानेक प्रतिमाएं एवं पुरातत्व खुदाई से प्राप्त सामग्री है। ऐसी ही कुछ प्राचीन प्रतिमाएं जैन मंदिर के पीछे की ओर देरियों के बाहर लगाई गयी है। एक मां सरस्वती की दुर्लभ प्रतिमा भी कला सौष्ठव  एवं प्राचीनता से अद्वितीय है जिसको देखते ही बनता है। गंभारे में गजलक्ष्मी की अलंकारिक प्रतिमा अपने आप में अनूठी है।
सेवाडी नगर में बावड़िययों का झूलरा था जहां पणीहारियों के जल भरने के लोकगीत आज भी लोकजीवन को स्मृति रूप से ताजा कर देते है। जैतल बावड़ी राव मूंझा के सम्बंध में कान्हड़देव जालोर की अन्तर्कथा भी यहां प्रचलित है कि उनके द्वारा यह बावड़ी निर्मित है जहां गजानंद, हनुमान की मूर्तियां जीर्ण-शीर्ण बावड़ी में मौजूद है।
एक प्राचीन ताम्रपत्र में समीपाटी (सेवाडी) के अनिल विहार में भगवान पार्श्वनाथ के मंदिर का होना अंकित है। इस मंदिर की खोज के अन्तर्गत सेवाडी से कुछ दूर जंगल में यहां का प्राचीन दुर्ग अटेरगढ के भग्नावशेष प्राप्त हुए है। यदि यहां उत्खनन का कार्य करवाया जाए तो सेवाडी के प्राचीन इतिहास के साक्ष्य उपलब्ध हो सकते है।
गांव के बाहर पश्र्चिम में एक प्राचीन बावड़ी के पास दूसरा जैन मंदिर है जो नवनिर्मित है। इसमें वासुपूज्य भगवान की प्रतिमा मूलनायक है। इस मंदिर की प्रतिष्ठा सं. १९८२ में यति प्रतापरत्न जी द्वारा की गई थी। कहते है कि यति जी बड़े चमत्कारी थे इनके उपाश्रय में सुनहरी चित्रकारी से अनेक यंत्र तथा भगवान की लीलाएं चित्रित थी। वह प्राचीन उपाश्रय अब ध्वस्त हो गया है।
सेवाडी में यात्रियों के ठहरने के लिए धर्मशाला व आयम्बिल शाला की सुव्यवस्था है। सेवाडी पहुंचने के लिये बाली से अनेक यातायात सुविधाएं प्राप्त है। बाली से सेवाडी १० किमी दक्षिण में स्थित है।
(सेवाडी के शांतिनाथ मंदिर में प्राप्त नई जानकारी के आधार पर यह नया लेख पाठकों की राय के लिये प्रस्तुत है।) (क्रमश:)
– डा. भंवरसिंह राठौड़

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