गोडवाड़ की गौरव गाथा-५१

बाली के जैन मन्दिर
– डा. भंवरसिंह राठौड़
जैन मान्यतानुसार तीर्थ दो प्रकार के बताये गये है। प्रथम सिद्ध क्षेत्र व दूसरा अतिशय क्षेत्र। सिद्ध क्षेत्र तीर्थ वे स्थान कहलाते है जहां तीर्थंकर भगवान का जन्म, दीक्षा, केवल्य ज्ञान, मोक्ष अथवा विहार हुआ है। अतिशय क्षेत्र वे कहलाते है जहां के मंदिर अति प्राचीन है- भव्य और कलापूर्ण हो, जहां की मूर्तियां प्रभाविक हो, जहां के अधिष्ठायक देव चमत्कारी हो या जहां का प्राकृतिक सौन्दर्य दर्शनीय हो।
पाली (गोडवाड़ क्षेत्र) के लगभग सभी तीर्थ अतिशय तीर्थों में ही आते है। इन अतिशय तीर्थों में सेसली का तीर्थ भी अति प्राचीन है लेकिन मुख्य सड़क पर नहीं होने के कारण जितनी प्रसिद्धि इस तीर्थ को मिलनी चाहिये थी उतनी नहीं मिल पाई।
सेसली के पार्श्वनाथ – सेसली गांव बाली कस्बे से तीन किमी दूर पूर्व दिशा में स्थित है। प्रताप चौक बाली से जाने के लिये यात्रा सुविधाएं प्राप्त है। यहां जैनों का एक भी परिवार निवास नहीं करता। प्राचीन जैन मंदिर एवं धर्मशाला इस बात को प्रमाणित करते है कि कालान्तर में यहां जैन परिवारों का निवास रहा होगा। यहां दादा पार्श्वनाथ का विशाल शिखरबन्द मंदिर है जिसका निर्माण वि.सं. ११८७ में होने का उल्लेख मिलता है। इसकी प्रतिष्ठा भट्टारक श्री आनन्द सूरिजी ने की थी। इस मंदिर के निर्माता श्री संघवी मांडण थे जिन्होंने सात लाख मुद्रायें व्यय करके इसका निर्माण करवाया था। कहते है कि मांडण ढालावत था इसलिये आज भी इस मंदिर पर प्रति वर्ष इनके वंशजों की ओर से ध्वजा चढ़ाई जाती है।
सेसली में पार्श्वनाथ भगवान के इस प्राचीन मंदिर के कारण ही यह तीर्थ का स्वरूप ले सका है। मंदिर में श्वेतवर्णी पार्श्वनाथ भगवान की प्रतिमा विराजमान है जो संवत १२५२ में प्रतिष्ठित है। ऐसा भी कहा जाता है कि यह प्रतिमा लालराई ग्राम से एक ध्वस्त मंदिर से लाकर स्थापित की गई है। इसके परिकर पर सं. १४९३ का लेख है लेकिन मूलनायक की प्रतिमा इससे भी प्राचीन है। मंदिर में कोई विशेष कलाकृति नहीं है फिर भी यह चमत्कारी तीर्थ अपने समृद्ध अतीत की कहानी का ज्वलंत उदाहरण है।
बाली जैन मंदिर – बाली कस्बा ११वीं शताब्दी का गोडवाड़ क्षेत्र का हृदय स्थल है, यहां से गोडवाड़ के सभी तीर्थों को मार्ग जाते है इसलिये बाली भी तीर्थ बन गया है। बाली में दो बड़े जैन मंदिर है, जिसमें कस्बे के बीचोंबीच बाजार में स्थित श्री मनमोहन पार्श्वनाथ भगवान का मंदिर है जो अधिक प्राचीन नहीं है लेकिन इसमें प्रतिमा काफी प्राचीन है जिस पर ११६१ सं. का लेख उत्कीर्ण है। कहते है कि यह प्रतिमा बाली से फालना जाने वाली सड़क पर बसा श्री सेला गांव के तालाब से खुदाई करने पर प्राप्त हुई थी। प्रतिमा बड़ी चमत्कारी है। इसके बारे में चर्चा करते है कि अधिष्ठायक देव ने गेमाजी श्रावक को सपने में कहा कि सेला गांव के तालाब में पार्श्व प्रभु की प्राचीन प्रतिमा है जिसे यहां लाकर प्रतिष्ठित कर।
सपने के आधार से तालाब की खुदाई में प्रतिमा प्राप्त हो गई लेकिन श्री सेला के श्रावकों की इच्छा के बीच तय हुआ कि इस प्रतिमा को बैलगाड़ी में रख दो और बैल जहां भी इस प्रतिमा को ले जाएंगे वहां इस प्रतिमा को प्रतिष्ठित कर दिया जाएगा। बैलगाड़ी प्रभु की प्रतिमा लेकर बाली की ओर चली तो बाली में भव्य मंदिर का निर्माण कराकर उसे स्थापित कर दिया गया। यह प्रतिमा सडेरगच्छीय आचार्य यशोभद्र सूरीश्वरजी के समय की होने का समय प्रकट करता है।
बाली में दूसरा मंदिर श्री आदिश्वर भगवान का है जिसकी प्रतिष्ठा आचार्य श्री विजय सूरिश्वरजी के द्वारा हुई। पूर्व में इस मंदिर के मूल नायक शांतिनाथजी भगवान थे। बार-बार जीर्णोद्धार से इस मंदिर की प्राचीन शिल्पकला भी समाप्त सी हो गई है।
बाली के यह दोनों ही जैन मंदिर संगमरमर की आधुनिकता की कला से परिपूर्ण एवं भव्य है। यात्रियों के लिये ठहरने के लिए धर्मशाला और भोजनशाला की पूर्ण व्यवस्था है। यह मुख्य रेल्वे स्टेशन (प.रे.) फालना से ७ किमी दूर, हर समय यात्रा की सुविधा प्राप्त है। इस बाली से करीब ४ किमी दूर श्री बोया गांव में भी एक प्राचीन जैन मंदिर है। यहां जैन बस्ती का पलायन से केवल मंदिर की पूजा की ही व्यवस्था है। (क्रमश:)

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