मेवाड़ के गौरव- 234

कविराजा श्यामल दास
महामहोपाध्याय कविराजा श्यामलदास के पूर्वज मारवाड़ के मेड़ता परगने में दधिवाड़ा ग्राम के रहने वाले देवल गोत्र के चारण थे। इस गांव में रहने के कारण ये दधिवाड़िया कहलाये। इनके पूर्वज जैता जी के पुत्र महपा (महिपाल) जी को राणा सांगा ने वि.स. 1575 वैशाख शुक्ला 7 को ढोकलिया ग्राम सांसण दिया जो आज तक उनके वंशजों के पास है। महपाजी की ग्यारहवीं पीढ़ी में ढोकलिया ग्राम में वि.सं. 1867 के जेष्ठ माह में कम जी का जन्म हुआ। बड़े होने पर वे उदयपुर आ गये। वे महाराणा स्वरूपसिंह व शम्भुसिंह के दरबार में रहे जहां उन्होंने दोनों राणाओं से सम्मान पाया। इनका विवाह किशनगढ़ के उदयपुर ग्राम के रोहडिया बारहठ परिवार में एजनबाई के साथ हुआ जिनकी कोख से श्यामलदास का जन्म आषाढ़ कृष्णा 7 वि.स. 1893 के दिन ढोकलिया ग्राम में हुआ। इनके तीन भाई और दो बहिनें थीं।
इनका अध्ययन घर पर ही हुआ परम्परा से प्राप्त प्रतिभा तो इनमें भरपूर थी। फारसी और संस्कृत में उनका विशेष अध्ययन हुआ। इनका प्रथम विवाह साकरड़ा ग्राम के भादा कलू जी की बेटी के साथ  हुआ। इनसे एक पुत्री का जन्म हुआ। दूसरा विवाह मेवाड़ के भड़क्या ग्राम के गाड़ण ईश्वरदास जी की बेटी के साथ हुआ। इनसे संतानें तो कई हुई पर उसमें से दो पुत्रियां ही जीवित रहीं। (क्रांतिकारी बारहठ केसरीसिंह-पृ. 235)।
वि.सवत 1927 के वैशाख में उनके पिता कमजी का देहावसान हो गया। उस समय श्यामलदास की आयु 34 वर्ष की थी। पिता के देहावसान के पश्चात् श्यामलदास गांव से उदयपुर आ गये और पिताजी के दायित्व का निर्वहन करने लगे । इसी वर्ष के आषाढ़ में महाराणा शम्भुसिंह जी मातमपूर्सी के लिए श्यामलदास जी की हवेली पर पधारे । तब से महाराणा की सेवा में रहने लगे । (वही- 236)
एक बार मेहता पन्नालाल की सलाह पर महाराणा शम्भुसिंह जी अपनी यात्रा का व्यय नगर के धनाढ्य लोगों से लेने की योजना बना रहे थे। यह बात श्यामलदास को ठीक न लगी, उन्हें इस योजना के पीछे ईर्ष्या-द्वेष व बदले की  भावना दिखाई दे रही थी। महाराणा को सीधा कहने का उन्हें साहस नहीं था पर लिखित में उन्हें यह न करने की सलाह दी और लिखा कि इससे आपकी बदनामी होगी। यदि यात्रा करनी ही आवश्यक हो तो राजकोष के खर्चे से करिये। यह पत्र उन्होंने ‘अवतार चरित’ नामक पुस्तक में रखा जिसे महाराणा रोज पढ़ते थे। पढ़ते समय किताब में पड़े इस पत्र को जब राणा ने पढ़ा तो बड़े प्रसन्न हो गये और श्यामलदास को इस नेक सलाह का धन्यवाद दिया। बाद में राणा ने निजी कागजों का बक्स श्यामलदास को सुपुर्द कर दिया। श्यामलदास धीरे-धीरे महाराणा के विश्वस्त बनते जा रहे थे तभी भरी जवानी में राणाजी का स्वर्गवास वि.स. 1931 में हो गया। श्यामलदास इससे बड़े निराश हुए। (वही पृ. 237)।
राणा शम्भुसिंह जी ने अपने जीवनकाल में ही सज्जन सिंह जी को गोद ले लिया था। अतः श्यामलदास का उनसे निकट का सम्पर्क था। सज्जनसिंह जी अल्पवयस्क होते हुए भी विलक्षण बुद्धि वाले थे अतः वे श्यामलदास जी के व्यक्तित्व पर मुग्ध थे। गद्दी पर बैठते ही राणा ने श्यामलदास को उसी प्रेम से अपनाया। महाराणा सज्जनसिंह का राजत्व काल बहुत लम्बा नहीं रहा पर उनके उस काल को मेवाड़ का यशस्वी राजत्व काल कहा जा सकता है जिसका श्रेय तत्कालीन प्रधान श्री श्यामलदास को जाता है। उनके राजत्वकाल में पुलिस के नवीन संगठन की अवस्था, कवायदी फौज की स्थापना कर मामा अमानसिंह को उसका कमाण्डर-इन-चीफ बनाया जाना, अभियांत्रिकी विभाग का गठन, सामन्तों के साथ सं. 1935 में दीवानी और फौजदारी के मुकदमों के अधिकारों बाबत नई कलमबद्दी, मेवाड़ में 10 जिलों का निर्माण कर उस पर हाकिमों की नियुक्ति, सभी वस्तुओं से कर हटाकर केवल 9 वस्तुओं पर जकात (कर) तथा डाण (कस्टम) महकमें का प्रबन्ध, जंगलात कायम करना, वि.सं. 1936 में भूमि की पैमाइश कराकर पुख्ता बंदोबस्त करना, वि.सं.  1937 में इजलास खास के स्थान पर सबसे ऊ पर की अदालत महकमा खास मुकर्रर करना, मेवाड़ के इतिहास का लेखन, रेल मार्ग की स्वीकृति, सज्जन यंत्रालय का खोला जाना, साप्ताहिक समाचार पत्र  `सज्जन कीर्ति सुधाकर’ का प्रकाशन, आदि कई काम प्रारम्भ हुए। प्रशासनिक दृष्टि से जहां मेवाड़ में नये प्रबंधन का शुभारम्भ हुआ वहीं इतिहास लेखन, समाचार पत्र प्रकाशन, सज्जन औषधालय जैसे शिक्षा और सेवा के कार्य भी शुरू किये गये।
सज्जन सिंह के समय में समाज के दुख को भी पहिचाना गया था। पहले हर वस्तु पर जकात दी जाती थी इससे प्रजा कष्ट में थी उसे पहिचान कर उस जकात को कम करके केवल 9 वस्तुओं पर ही जकात कर दिया गया। डाण के विभाग को शुरू करके उन्होंने नये आर्थिक स्रोत ढूंढ निकाले जिससे जनता को बहुत राहत मिली। इस प्रकार हर पक्ष का चिन्तन कर प्रशासन के काम को अनुशासित किया गया जिसका सम्पूर्ण श्रेय श्यामलदास को दिया जा सकता है। (वही-पृष्ठ 238-247)
(इतिहास के पुरोधा-मेवाड़ के  इतिहास को उजागर करने वाले मेवाड़ के गौरव-कविराज जी, ओझाजी व 31 गोपीनाथ शर्मा – आगामी लेखों में उनके बारे में जानकारी मिलेगी।  – प्रातःकाल)

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