गोडवाड़ की गौरव गाथा-८२

जुलाई 16, 2009

मीरां के आराध्य मुरलीधर-घाणेराव
मीरांबाई के पिता के रूप में रतनसिंह की इतिहास में अप्रकट युद्धवीरता का महत्वपूर्ण परिचय मिलता है।
मेड़ता नगर – तत्कालीन सर्वप्रभुसत्तासम्पन्न मेड़तिया शासकों की रियासत की राजधानी मेड़ता थी जो वर्तमान में मेड़तानगर के रूप में प्रसिद्ध है। इतिहासवेत्ताओं तथा साहित्य के विद्वानों के अनुसार मेड़ता का अति प्राचीन नाम मान्धातपुर था जो  अपभं्रश होकर पहले महारेत, बाद मे मेरूक्तक और अंत में मेड़ता बना। पूर्व में मेड़ता का नाम मेदिनीपुर भी था। ऐसा भी प्रसिद्ध है कि राजा नागभट्ट प्रथम की राजधानी मेड़ता ही थी जिसका समय ई. ७२५ से ७४० के बीच मान्य है।
‘जयमलवंश प्रकाश’ से  इस बात की पुष्टि होती है कि राव दूदा ने मांडू के बादशाह से मेड़ता छीन कर स्वतंत्र राज्य (रियासत) की स्थापना कर मेड़ता शहर का पुन: निर्माण करवाया। राव दूदा द्वारा मेड़ता राज्य की राजधानी मेड़ता नगर में स्थापित होने से उनके वंशज मेड़तिया कहलाये।
राजमहलों  का निमार्ण – मेड़ता नगर में वरसिंह व दूदा ने बेझपा जलाशय के समीप विक्रमी संवत् १५१८ की चैत्र सुदी ६ को राजमहलों की नींव रखी, जिसके अवशेष आज भी विद्यमान है। राव जयमल ने मेड़ता नगर में अनेक महलों तथा भवनों का निर्माण करवाया।
चारभुजानाथ का मंदिर- राव दूदा ने विक्रमी संवत १५३२ में श्री चारभुजा का मंदिर मेड़ता नगर में बनवाया।
इसी मेड़ता नगर में मीरांबाई का बाल्यकाल व्यतीत हुआ और यहीं वि.सं. १५७३ में राव वीरमदेव ने मीरां का विवाह मेवाड़ के महाराणा सांगा के ज्येष्ठ पुत्र भोजराज से किया था। कुड़की में कुछ वर्ष रहने के पश्चात राव दूदा ने बिना मां की उस राजकन्या को मेड़ता नगर में बुला लिया और वहीं मीरां की शिक्षा-दीक्षा हुई। राव दूदा प्रसिद्ध वैष्णव भक्त थे और अपने इष्टदेव विष्णु के चारभुजानाथ के रूप में अनन्य उपासक थे। ‘जयमल वंश प्रकाश’ में इस सम्बन्ध में यह विवरण भी लिपिबद्ध है-’राव दूदा बड़े पराक्रमी, नीतिज्ञ और दूरदर्शी नरेश थे। ये जैसे वीर थे वैसे ही धर्मात्मा भी थे। परम वैष्णव होने पर भी यह भगवती जगदम्बा के अनन्य भक्त थे। जोधपुर के  (तत्कालीन मारवाड़ राज्य) के शासक मालदेव ने वि.सं. १६१३ में मेड़ता पर आक्रमण कर अपने अधीन कर लिया और समस्त राजभवनों को विध्वंस करा दिया। उन्होंने केवल एक श्री चतुर्भुजजी के मंदिर को खंडित नहीं किया।
मुहणोत नैणसी लिखता है कि – ”राव जी जैतारण थी संवत १६१३ रा फागुण सुदि १२ मेड़ता पधारिया। मेड़तौ हाथ आयौ। ने जैमल रा घरां री ठौड़ मूला बुहाडीया। घर पाड़ीया। संवत १६१४ सोला सै चौधातरै लागतां मालगढ़ मंड़ायौ। नै संवत १६१६ री साल मालगढ़ पूरौ हुवौ। ने आधौ मेड़तौ रा: जैगमाल वीरमदेवोत नुं पटै दीयौ। ने रा: देवीदास नुं मालगढ़ थाणै राषीयौ।”
इतिहासकार गौरीशंकर हीराचंद ओझा रोहिड़ा वाला ने लिखा है- ‘भगवती मीरां के समकालीन मेड़ता राज्य के परम शत्रु जोधपुर नरेश राव मालदेवजी भी उनके भक्ति भाव से भयभीत हो गये थे कि मेड़ता विजय के उपरांत जब राव जयमल के समस्त राजभवनों को द्वेष से नष्ट करा दिया तब श्री चतुर्भुजजी के देवालय और मीरांबाई की भजनशाल-कोठरी को उन्हें सुरक्षित रखना पड़ा। (क्रमश:)
भंवरसिंह राठौड़ ‘घाणेराव’

गोडवाड़ की गौरव गाथा-८1

जुलाई 16, 2009

मीरां के आराध्य मुरलीधर, घाणेराव-८१
-  डॉ. भंवरसिंह राठौड़, घाणेराव, पाली

भक्त शिरोमणी मीरांबाई के पिता रतनसी मेड़तिया (राठौड़) के संबंध में आज तक थोड़ी-जानकारी साहित्य व इतिहास जगत को रही है। उनके संबंध में प्रो.कल्याणसिंह शेखावत के अनुसार एवं संस्थान द्वारा जो प्रामाणिक उल्लेख प्राप्त हुये है वे  प्रस्तुत है-
-रतनसिंह मेड़ता राज्य के संस्थापक राव दूदा के चौथे पुत्र व तत्कालीन मारवाड़ रियासत के शासक राव जोधा के पौत्र थे।
-रतनसिंह को राव दूदा ने जागीर में ९२ गांव प्रदान किये थे। जिनके नाम-नींबडी, पालड़ी, हकधर, नूंद,आकोदिया, मोटास, पीमणियां, डूमांणी, सुंदरी, कुड़की, नैया, मांझी-बाझोती थे।
-रतनसिंह का विवाह मेवाड़ के गोगुन्दा के झाला सरकार कहलाएं हमीर की पुत्री कुसुब कंवर से हुआ था। पुरोहित हरनारायणत्री ने मीरां की माता का नाम ‘वीर कुंवरी’ तथा नाना का नाम गोगुदां के झाला सुलतानसिंह लिखा है।
-रतनसिंह को इतिहासवेत्ता राव दूदा का द्वितीय पुत्र मानते है और कुछ चतुर्थ पुत्र मानते है।
जयमल वंश प्रकाश में रतनसिंह को रत्नसिंह लिखा गया हैं यथा  ”रावदूदा के पांच पुत्र और एक पुत्री गुलाब कुंवरी हुई। पुणोंका  क्रम जहां तक ज्ञात हो सका इस प्रकार है।
१ वीरमदेव- राव दूदा के उत्तराधिकारी हुए।
२ रायसल- ये रायसलोत शाखा के मूल पुरूष थे। इनके वंशजों के अधिकार में मारवाड़ में भड़ाना, बांसणी, जीलारी ठिकाणे है। मेवाड़ राज्य में हुरड़ा के कुछ ग्रामों में जागीरी है।
३ पंचायण- नि:संतान हुये।
४ रत्नसिंह- इनके कोई पुत्र नहीं हुआ। केवल एक पुत्री हुई जो मीरांबाई के नाम से विश्वविख्यात हुई। इस मीरांबाई का विवाह चित्तौड़ के प्रसिद्ध वीरवर महाराणा संग्रामसिंह के युवराज भोजराज से हुआ। रत्नसिंह को निर्वाह के लिए १२ बारह गांव दिए। वि.सं. १५८४ चौथ शुक्ला १४ (१५२६ ई) १७ मार्च को बयाने में माहाराणा संग्रामसिंह का मुगल बादशाह बाबर से प्रसिद्ध युद्ध हुआ था। उसमें वे मुसलमानों की बड़ी वीरता से युद्ध करके काम आए।
५ रायमलजी- मेड़तियों की रायमलोत शाखा का प्रारम्भ हुआ। जोधपुर  नरेश राव  मांगाजी ने  बयाने के युद्ध में महाराण सांगा की सहायतार्थ जो सेना भेजी उसके प्रधान सेनापति ये ही थे। ये भी इस युद्ध में बड़ी बहादुरी से लड़ कर मारे गये। मारवाड़ में इनके वंशजों के अधिकार में मुख्य ठिकाणे वेण और रायरा है। इतिहासवेत्ता हरिनाराणजी के शब्दों में ”दूदाजी के दो राणियों व पांच पुत्र थे। वीरमदेव ,रायमल ,पंचायण, रत्नसिंह, रायसल। रावरत्नसिंह (मीरां के पिता) बयाने तो  बाबर बादशाह के साथ, महाराण संग्राम-सिंहजी के साथ,  साथ जो प्रसिद्ध युद्ध हुआ था, उसमें (रत्नसिंह) वि.सं १५८४ में मिति चैत्रसुदी १४ को मुसलमानों से बड़ी वीरता के साथ  युद्ध करते हुए काम आये थे, उसी में रायमलजी भी था।
ऐसी ही तुजुक बाबरी, राजपूताणे के इतिहास में भी उल्लेखित है कुलगुरूओं की बहिया(मेड़तिया वंश) एक दोहा प्रसिद्ध जो उद्रत है-
”वीरमदे तगद वडो रायमल नै शयसल्ल’
रतन पंचायण पॅाचअे, दूद तणा सुता भल्ल”
बाकीदासजी ने अपनी ख्यात में ”दूदा जोधावत रे बेटा पांच हुआ वीरमदे, रतनसी, रायमल, रामसल, पंचायण। रतनसी, रायसल रे वंस रहयों नही, पंचायणोत पचास जणा है।
मीरां के पिता रतनसी (रत्नसिंह) अपने समय में विख्यात योद्धा व वैष्णव भक्त थे। उनके शौर्य से प्रभावित होकर अनेक कवियों ने डिंगल गीतों की रचना की थी।
सउदारहण
- रतनसिंह रिमराह अनै आषो आचगल। एक आगल अजमेर एक मेडता आगचल।’ आषौ पीसांगवणि रयणा कुडकी घर वासै। सांकड़ ही लै सीम वैसे हुआ भैवोसे। आसेना रहै बौले अक ास पग कूंडालै जिस प्रसंग। दम हुआ लोक सहिऊ  अचरै मुत्रिए कहे हेकै मरण।
-मीरअली महिपाली मारि संसार वदितौ। रणथंभरि रूघनाथ जुडै जिणी सैमरि जितौ” भडां काल सीमाल नाट झूटौ दोसारी। करमचंदी रंण छलि माहि अज्जैपुर भरी” आषालौ कहे पंमार ए रिणी सूरा अज भज्जणा। सौ को ई गरबौ रतनसीवदे पराक्रम अपणा”

गोडवाड़ की गौरव गाथा-८०

जुलाई 16, 2009

मीरां के आराध्य मुरलीधर, घाणेराव
जयमल-मीरां दो भाई-बहन सगुण वैष्णव भक्तों के रूप में भक्ति जगत में विख्यात हो चुके है। दोनों में अनेक दिव्य गुण थे जिनकी तुलना करते हुए चतुरसिंह रूपाहेली के शब्दों में-’ज्येष्ठ भगिनी करूण और शान्त रस की सजीव मूर्ति थी तो कनिष्ठ भ्राता रौद्र और वीररस की प्रत्यक्ष प्रतिमा था। ज्येष्ठ भगिनी का इतना अधिक प्रभाव बढ़ा कि भारत वर्ष के मुख्य-मुख्य तीर्थ धामों, रामेश्वर, द्वारका, जगदीशपुरी आदि में उनकी प्रतिमाएं स्थापित होकर साधु-संतों, हरिभक्तों और सर्वसाधारण द्वारा देव पूजा होने लगी और अब तक वे मूर्तियां विद्यमान है। ठीक उसी प्रकार कनिष्ठ भ्राता की वीरता का भी इतना ही अधिक प्रभाव बढ़ा कि भारत वर्ष की मुख्य-मुख्य राजधानियां, आगरा, दिल्ली, मांडू (मालवा के बादशाह) काठमांडू या भाट गांव (नेपाल की राजधानी) क्षत्रिय, भूपालों और शूर सामन्तों द्वारा वीर पूजा होने लगी। मांडू तथा नेपाल में तो ऐसी मूर्तियां अब तक विद्यमान है। दोनों भाई बहन की अनेक बातों में समानता की तुलना ईश्वर कृपा से हुई है, ऐसी संसार में मिलना कठिन है। इस कथन बतुलना में अतिशयोक्ति नहीं है। भक्त आत्मा मीरां बाई को महाराणा विक्रमादित्य द्वारा अनेक कष्ट दिये जाने, विष का प्याला चरणामृत के रूप में भेजने तथा मानसिक संताप देने के कारण मेवाड़ की राजधानी चित्तौडग़ढ़ उजड़ गया, उसका राजवैभव समाप्त हो गया। कैसा संयोग हुआ कि चित्तौड़ दुर्ग की रक्षा के लिये मीरां बाई के प्रिय कनिष्ठ भ्राता जयमल ने अंतिम प्रयास कर अपने अमूल्य प्राणों का बलिदान चित्तौड़ रथार्थ हित कर दिया।’
भगवती मीरां ने प्रसन्न होकर अपने भाई जयमल को दो वरदान प्रदान किये थे, बाणो बधे तेरो परिवार, होवे नहीं समर में हार। ये दोनों वचन आज तक भी प्रत्यक्ष दृष्टि में आते है कि जोधपुर राज्य में चांपावत, कंपावत, वैरावत, उदावत आदि शाखाएं बहुत बड़ी मानी जाती है, परन्तु उनमें से किसी में भी छह हजार से अधिक जनसंख्या नहीं है।
मेड़तिया राजवंश में राव जयमल-प्रतापसिंह सबसे अधिक प्रतापशाली और प्रसिद्ध नरेश हुए। इनका नाम न केवल राजपूताने में प्रत्युत सारे भारत वर्ष में प्रसिद्ध है। प्रतिपक्षी मुसलमान लेखकों से भी इतिहासवेत्ताओं ने अपनी लिखी हुई तवारीखी किताबों में राव जयमल जी के लोकोत्तर शौर्य और साहस की मुक्त कंठ से प्रशंसा की है। वर्तमान काल में इतिहास विद्या के परमानुरागी कर्नल टॉड इतियह, स्मिथ, काउन्टर ओनर, स्ट्रेटन, वाल्टर तथा लेनपुल आदि अनेक प्रसिद्ध यूरोपियन गं्रथकारों ने भी जयमल जी के वीररस से भरे हुए जीवन चरित्र का बहुत ही गौरव के साथ वर्णन किया है। (क्रमश:)
डा. भंवरसिंह राठौड़ ‘घाणेराव’

गोडवाड़ की गौरव गाथा-७९

जुलाई 16, 2009

मीरां के आराध्य मुरलीधर, घाणेराव
(अ) तठा पछै बरस। आडौ थाल नै राव मालदे अजमेर ऊ पर कटक कियौ। राठौड़ वीरमदे नुं अजमेर था ही परौ बाढियौ। अजमेर आपरै हाथ आयौ। पछै वीरमदे एक बार नहारणे (नारायण) गयौ। केहीक दिन कछहावे सेषावतां राषीयौ। पछै राव मालदे दिन-दिन जोर चढ़तौ गयौ। अजमेरे राठौड़ महेस घडसीहोत नुं पछै दीयौ। डीडवाणौ लीयौ। डीडवाणौ राठौड़ कूंपै महैराजोत नुं पटै दीयो। साहेभर (सांभर) लीनी। राव रा कामंदार आय-आय सांभर बैठा।  तेरे राठौड़ राव वीरमदे चाटसू गयौ। उठै ही राव री फौजा वांसे हुई आई। राठौड़ वीरमदे लालसोट गयौ। उठै ही रहण न दियौ। पछै वीरमदे बावजी आया, गाडा छोडिया।
(ख) नवागढ़ मालदे लीया तिणरी विग
१. मेड़तो मेड़तिया कना सूं बेला दोय लीयो।
२. संवत १५८८  वीरमदे कनां सू लीयौ।
३. संवत १६१३ रा जेमल कना सूं लीयौ
स्वर्गवास – राव वीरमदे का स्वर्गवास विक्रमी संवत १६०० अर्थात १५४४ ई. फरवरी में हुआ।
उपरोक्त प्रसंग से यह स्पष्ट होता है कि मेड़ता रा राव वीरमदे अजमेर, नाराणा, अमरसर, डीडवाना, सांभर, चाट्सू, लालसोट, बांवली आदि स्थानों पर रहा व अमरसर को छोड़कर कुछ समय के लिये ही सही अपना राज्य स्थापित किया।
राव जयमल – वीरवर जयमल मेड़ता राज्य के शासक राव वीरमदेव के ज्येष्ठ युवराज थे और राव वीरमदेव जी का स्वर्गवास होने के पश्चात् विक्रमी संवत १६०० के फाल्गुन (१५४४ ई. फरवरी) में वीर जयमल राठौड़ वीरमदेव (मेड़तिया) के ११ पुत्रों में सबसे बड़ा था। जिसका जन्म वि.सं. १५६४ अश्विनी सुदी ११ शुक्रवार (१५०७ ई. १७ सित.) का हुआ था।
वीर जयमल राठौड़, वीरमदेव के देहान्त के बाद उत्तराधिकारी जयमल के रूप में मेड़ता का शासक होकर राजगद्दी पर बैठा।
मीरांबाई राव जयमल के पिता के छोटे भाई रतनसी (रतनसिंह) की कन्या अर्थात चचेरी बहन थी। यह वीरम से नौ वर्ष बड़ी थी। इन दोनों भाई-बहिनों में अत्यन्त स्नेहभाव था। दोनों भाई बहिन सगुण वैष्णव भक्तों के रूप में भक्ति जगत में विख्यात हो चुके थे। (क्रमश:)
डा. भंवरसिंह राठौड़ ‘घाणेराव’

गोडवाड़ की गौरव गाथा-७८

जुलाई 16, 2009

मीरां के आराध्य मुरलीधर, घाणेराव
डीडवाना एवं अमरसर प्रवास- इस संबंध में हकीकत अनेक बयान करते है प्रसिद्ध इतिहासवेता सुरजनसिंह लिखते है- मेड़ता का राव वीरमदेव मेड़तिया अपने समय का महान योद्धा और बड़ा राजपूत था। उसने मुसलमानों को निकाल कर अजमेर पर भी अधिकार कर लिया था। जोधपुर के शासक राव मालदेव को वीरमदेव के बढ़ते हुए प्रताप और यश से ईष्र्या थी। उसने जेता, कूंपा आदि अपने प्रमुख राजपूतों को ससैन्य भेजकर वीरमदेव से अजमेर और मेड़ता दोनों छीन लिये। वीरम शान्त बैठने वाला नहीं था। उसने डीडवाना पर अपना अधिकार कर लिया किन्तु मालदेव की सेना ने उसका वहां भी पीछा किया और उसे डीडवाना से निकाल दिया। सब ओर से हताश अन्त में रायमल शेखावत के पास अमरसर गया। रायमल ने वीरम का बड़ा आदर सत्कार किया। मालदेव की कृपा अथवा उसके कोष की परवाह किये बिना उसने १२ महिनों तक वीरमदेव को अपने यहां आश्रय में रखा।
राव वीरमदेव का अमरसर प्रवास का एक कारण यह भी था कि मुगलों को भारतवर्ष से निकालकर दिल्ली के सुल्तान बनने वाले पठान शेरशाह सूरी का पिता मियां हसन खां भी अपनी जवानी के प्रारंभिक वर्षों में अमरसर के शासक राव रायमल की सेना में रह कर ही विकास कर उपर उठा था। अत: उन पुराने सम्पर्कों का लाभ उठाकर राव वीरमदेव शेरशाह से मिलने का मार्ग प्रशस्त करना चाहता था। अमरसर प्रवास से राव वीरमदेव को इसमें सफलता भी मिली।
अन्य मत – (देवीसिंह मंडावा) अनुसार- राव मालदेव द्वारा अजमेर पर १५३६ ई. में अधिकार कर लेने पर वीरमदेव डीडवाना चला गया। वहां भी मालदेव ने उसका पीछा किया। तब वह बाण अमरसर शेखावटी पहुंचा, जहां वहां का शासक राव रायमल शेखावत राव वीरमदेव का संबंधी था। ई. १५३७ में राव वीरमदेव ने चाटसू पर अधिकार कर लिया। फिर वह लालसोट, बेवाली, मोजावाद चला गया। जहां रणथंभोर की (नवाब को) सेना की मदद से वह शेरशाह के पास चला गया और उसे मालदेव के विरूद्ध चढ़ाई करने के लिये सहमत कर लिया।
मीरां की शिक्षा पंडित गजाधर की देखरेख में हुई। कुछ ही वर्षों में मीरां पूर्ण विदूषी एवं पंडिता हो गई।
वि.सं. १५८० में कुंवर भोजराज का देहान्त होने के पश्चात् मीरां का वैवाहिक सुखी जीवन समाप्त हो गया। संवत १५८४ में रतनसिंह की मृत्यु से मीरां को दूसरा आघात लगा। मीरां बाई आठ वर्ष तक द्वारिका में रही।
संवत १५९५ में मेड़ता पर मालदेव  के आक्रमण के बाद मीरां वृन्दावन और  द्वारका संवत १६०० में चली गई। (क्रमश:)
डा. भंवरसिंह राठौड़ ‘घाणेराव’

गोडवाड़ की गौरव गाथा-७७

जुलाई 16, 2009

मीरां के आराध्य मुरलीधर, घाणेराव
डा. भंवरसिंह राठौड़ ‘घाणेराव’

राव वीरमदेव वही से दिल्ली के शासक शेरशाह सूरी के पास गया। मुरणोत नैनसी ने इस संबंध में लिखा है कि जब मालदेव की फौज फैसलाबाद तक आ गई तब वीरमदेव ने खेमा मेड़ता से कहा कि इस बार मैं अवश्य कर मर जाऊं गा। तब मेड़ता ने कहा कि पराई धरती में क्यों मरे और यदि मरना ही है तो मेड़ते में ही जाकर क्यों न मरे? इस पर दोनों रणथंभोर के थानेदार के पास गये और उसकी सहायता से ये शेरशाह सूरी के पास चले गए।
डॉ. रघुवीर सिंह सीतामऊ  के मतानुसार, उधर मेड़ता का वीरमदेव, बीकानेर के जैतसिंह का पुत्र कल्याणमल आदि मालदेव के शत्रु भी मालदेव पर आक्रमण करने के लिये शेरशाह को निरन्तर प्रेरित कर रहे थे। अत एव सन् १५४३ ई. की वर्षा की समाप्ति पर युद्ध की पूरी तैयारी करके, शेरशाह ने मालदेव पर चढ़ाई कर दी। वीरम साथ था ही, कल्याणमल भी सिरसा से चलकर, राह में सैन्य सहित शेरशाह के साथ मिला।
प्रशस्ति-साक्ष्य -’इसी अवसर पर वीरमदेव मेड़तिया ने इस क्षेत्र (चाटसू) पर अचानक आक्रमण करके इसे जीत लिया। वि.सं. १५९४ में उसके शासनकाल में लिखी षट्वाहुड की एक ग्रंथ प्रशस्ति भी उल्लेखित है जो चाट्सू में लिखी गई थी।Ó
संवत १५९४ वर्षे माह सुदि २ बुधवार चम्पावती नगरे राठौड़ वंशे ग्राम श्री पीथास राठौड़ (पृष्ठ १७५) पाटन के शास्त्र भंडार में वीरमदेव की षटकर्म गं्रथावली की वि.सं. १५९२ की प्रशस्ति सुरक्षित है जिसमें स्पष्टत: मेड़ता पर वीरमदेव का राज होना उल्लिखित है।
अतएव ऐसा प्रतीत होता है कि वि.सं. १५९५ मे मारवाड़ के मालदेव ने मेड़ता आदि क्षेत्र वीरमदेव से ले लिये थे। तदनुसार वीरमदेव ने डीडवाना पर अधिकार कर लिया। जब मालदेव की सेना वहां भी पहुंच गई तब वीरमदेव अपने संबंधी राय रायमल शेखावत के पास अमृतसर चला गया।
राव वीरमदेव का अजमेर पर अधिकार हरविलास शारदा ने वि.सं. १५९०-१५९२ तक गुजरात के बादशाह का अधिकार होना लिखा है, एवं वीरमदेव का वि.सं. १५९२ के बाद ही अजमेर लेना वर्णित किया है। रेऊ  ने विक्रम संवत १५९७ में वीरमदेव का अजमेर पर अधिकार होना लिखा, जो सत्य नहीं माना जाता।
रामवल्लभ सोमानी, वि.सं. १५९२ वैशाख को लिखी षटकर्म ग्रंथावली पूरी की प्रशस्ति अनुसार उक्त तिथि तक का वीरमदेव का वहां अधिकार सिद्ध करते है।
प्रशस्ति – ‘संवत १५९२ वर्षे शाके प्रवर्तमाने वैशाख मासे शुक्ल पक्षे तृतीया तिथो खौवरि। मृगशिर नक्षत्रे।
श्री मेड़ता नगरे। राजधिराज श्री वीरमदेव राज्ये।’
श्री विश्ववेश्वरनाथ रेऊ  ने मालदेव का वि.सं. १५९२ पूर्व ही मेड़ता लेना लिखा है। इसी समय मालदेव ने अजमेर से भी वीरमदेव को हटाने को बाध्य कर दिया था। (क्रमश:)

गोडवाड़ की गौरव गाथा-७६

जुलाई 16, 2009

मीरां के आराध्य मुरलीधर-घाणेराव
-डा. भंवरसिंह राठौड़ ‘घाणेराव’

मेवाड़ की सहायता – वीरमदेव का विवाह महाराणा सांगा की बहिन के साथ हुआ था। अत: महाराणा सांगा के साथ उनके अत्यन्त मधुर संबंध रहे और दिल्ली, गुजरात, मालवा और खानवा के युद्धों में वीरमदेव उनके सहयोगी बनकर सदा उनके साथ रहे तथा उन्होंने अद्भुत रणकौशल का परिचय दिया। उन्होंने गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह द्वारा चित्तौड़ पर किये गये दोनों हमलों में मेवाड़ की सहायतार्थ अपनी सेना लेकर युद्ध किया। खानवा के प्रसिद्ध युद्ध में भी वे चार हजार सैनिकों को साथ लेकर सम्मिलित हुए और महाराणा सांगा की अचेतावस्था में मुगल सेना को रोक कर उस भीषण संग्राम में महाराणा को सकुशल बाहर निकाला। इस युद्ध में राव वीरमदेव के भी अनेक घाव लगे थे। राव वीरमदेव द्वारा राणा को खानवा के युद्ध से निकाल कर सुरक्षित स्थान पर पहुंचा देने की घटना के प्रसंग में राजस्थानी भाषा का निम्नलिखित कवित्त अत्यन्त प्रसिद्ध है-
रतन रायमल्ल बंधव रहिया,
रामहर भिडदार वै ओसाप।
सांगो राण कुसल घर पोंचो,
(वो) वीरमदे तणो प्रताप।।
राव वीरमदेव अजमेर से डीडवाना, नरेना तथा सांभर होता हुआ रायमल शेखावत के पास पहुंचा और उससे सहायता लेकर उसने चाटसू बोली आदि के भूभाग पर अधिकार कर लिया। यह भूभाग उस समय टोंक के सोलंकियों के अधिकार में था और कछवाहों और उनमें संघर्ष चल रहा था।  सोलंकी शासक सूर्यसेन १५९६ तक जीवित था जिसके और उसके पुत्रों पृथ्वीराज तथा पूर्णमल के साथ वीरमदेव का संघर्ष हुआ था। वि.सं. १५९४ की ”षड पाहुड” ग्रथ की प्रशस्ति जो आमेर शास्त्र भण्डार में संग्रहित है उसमें वीरमदेव को चाटसू के शासक के रूप में वर्णित किया गया है।
”संवत १५९४ वर्ष महासुदी २ बुधवार श्रावण नक्षत्रे श्री मूलसंघे कलात्मार धणे सरस्वती गच्छे नथाम्याने कुन्दकुन्दाचार्यान्वये महारक श्री शुभचन्द्र देवास्त त्पहे भहारक श्री जिनचन्द्रदेवास्त त्पहे भहारक श्री प्रभाचन्द्र देवस्ता शिष्य श्री धर्मचन्द्र देवतदाम्नाये खंडेलवालान्वये चम्पावती नगरे राठौड़ वंश राव श्री वीरमथ राज्य बांकलीवाल गोत्रे..।”
आमेर शास्त्र भण्डार में संग्रहित ”वरांगरचित” की वि.सं. १५९५ की प्रशस्ति से ज्ञात होता है कि उस समय टोंक के आसपास तक राव मालदेव का राज्य था। प्रशस्ति इस प्रकार है-
संवत १५९५ वर्षे माघ मासे पक्षे षष्टी दिवसे
शनैश्चर वासरे उतरा नक्षत्रे राव श्री मालदेव राज्य
प्रवर्तमाने रावत खेतसी प्रताप सांखेण नाम नगरे
श्री शान्तिनाथ चैत्यालये।
विश्वेश्वरनाथ रेऊ  टोंक तक वि.सं. १५९५ के स्थान पर १५९७ में मालदेव का अधिकार लिखा है जो उक्त प्रशस्ति मिल जाने से स्वत: असत्य सिद्ध हो जाता है। (क्रमश:)

गोरवाड़ गौरव गाथा-७५

जुलाई 16, 2009

मीरां के आराध्य मुरलीधर मंदिर-घाणेराव
डा. भंवरसिंह राठौड़ ‘घाणेराव’

पूर्व में मीरा के जीवन गाथा के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला गया था। उनके प्रारम्भिक जीवन, उनका लालन पालन आदि के बारे में जानकारी दी गई थी। विवाह के पूर्व तक वह अपने दादा जी के पास रही। वह दूदाजी के चतुर्थ पुत्र रतनसिंह की एकमात्र संतान थी। पूर्व में मेड़ता मारवाड़ राज्य का ही अंग था। जोधपुर के संस्थापक जोधा का एक पुत्र दूदा भी था, जो मीरां का दादा था। दूदा का जन्म १४९७ संवत् में हुआ था। उसने संवत् १५१८-१९ में मेड़ता राज्य की अलग से स्थापना की और वह उसका स्वामी बना। दूदा का जेष्ठ पुत्र वीरमदेव हुआ जिसका जन्म संवत् १५३४ में हुआ था। वीरमदेव मीरां का ताऊ  था जो मीरां से लगभग २१ वर्ष बड़ा था। राव दूदा का देहावसान वि.सं. १५७२ में हुआ उस समय वीरमदेव ३८ वर्ष का था और मेड़ता का स्वामी बना।
मेवाड़ का मारवाड़ और मेड़ता से पुराना सम्बन्ध था। दूदा के समय मेवाड़ पर राणा रायमल (सांगा के पिता) का शासन था। उनकी सुपुत्री गोरज्या कुमारी का सम्बन्ध दूदा के सुपुत्र वीरमदेव से किया गया था। इनका विवाह वि.सं. १५५३ में (मीरां के जन्म से पूव) हुआ था। इस प्रकार गोरज्या कुमारी सांगा की बहन और वीरमदेव सांगा का बहनोई था।
राजपूताना के इतिहास को उजागर करने वाले कर्नल टॉड़ ने कुछ बातें ऐसी लिखी हैं जिससे इतिहास में भ्रान्तियां खड़ी हो गई थी। उनमें से एक यह बात भी थी कि मीरां महाराणा कुम्भा की पत्नी थी। महाराणा कुम्भा मोकल का जेष्ठ पुत्र था और मेवाड़ की गद्दी पर वि.सं. १४९० में बैठा था और लगभग ३५ वर्ष तक शासन करने के पश्चात् वि.सं. १५२५ में उसकी मृत्यु हो गई। उसके देहावसान के लगभग ९ वर्ष पश्चात् वीरमदेव का जन्म हुआ जो दूदा का जेष्ठ पुत्र था जबकि मीरां का पिता रतनसिंह दूदा का चतुर्थ पुत्र था और मीरां का जन्म तो वि.सं. १५५५ में बताया जाता है। ऐसी दशा में मीरां बाई का महाराणा कुम्भा की राणी होना सर्वथा असम्भव है।
महाराणा सांगा का जेष्ठ पुत्र भोजराज था। गौरीशंकर हीराचन्द ओझा ने उन्हें युवराज बताया है। उनके अनुसार, जिसे सभी इतिहासकारों ने भी मान्यता दी है, भोजराज का विवाह मेड़ते के राव वीरदमदेव के भाई रतनसिंह की पुत्री मीरां बाई के साथ हुआ। यह विवाह वि.सं. १५७३ में हुआ। पर विधि का विधान कुछ और था। महाराणा सांगा के जीवित दशा में ही भोजराज का देहावसान हो गया। विवाह के लगभग ७ वर्ष पश्चात् अर्थात् वि.सं. १५८० में ही यह दुर्घटना घटी। मीरां तो पूर्व में ही कृष्ण भक्ति में लीन थी, वह अब पूर्ण रूप से कृष्ण भक्ति में ही रम गई। उसके लिये तो सर्वस्व था-’मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरो न काई।’
महाराणा सांगा का देहावसान भी वि.सं. १५८४ में हो गया। सांगा के बाद रत्नसिंह भी चार वर्ष तक शासन कर सका। वि.सं. १५८८ में विक्रम मेवाड़ के महारणा बने। उसने मीरां को बड़े कष्ट दिये जिसका वर्णन मीरां के पदों में भी मिलता है। मीरां तो इन तकलीफों से ऊ पर उठ चुकी थी अत: वि.सं. १५९१ में वह चित्तौड़ छोड़ कर मेड़ता चली गई। यहां वह तब तक रही जब तक मेड़ता पर जोधपुर के राजा मालदेव ने अधिकार नहीं कर लिया। मालदेव ने वीरमदेव से वि.सं. १५९३-९४ मेड़ता छीन लिया। मीरां बाई तब तीर्थ यात्रा पर निकल गई। वह अजमेर होती हुई वृन्दावन पहुंची वहां उसका प्रवास वि.सं. १५९५ से १५९७ तक रहा। यहां से यात्रा करती हुई मीरां बाई द्वारिका में वि.सं. १५९७ में पहुंची। ऐसी मान्यता है कि मीरां वि.सं. १६०४ में द्वारिकाधीश के विग्रह में विलीन हो गई।
मीरा के पिता का देहान्त तो पहले ही हो चुका था अत: मीरां का ध्यान विवाह के बाद वीरमदेव ने ही रखा। वह प्रबल पराक्रमी, सुदृढ़-देहधारी, बुद्धिमान, निपुण राजनीतिज्ञ व प्रतापी नरेश था। उसने अपने पराक्रम से अजमेर को वि.सं. १५९२ में तथा वि.सं. १५९३-९४ में चाटस् पर अधिकार कर लिया। अपने जीवन काल में उसने मालदेव से मेड़ता को अपने अधिकार में ले लिया था। वि.सं. १६०० में वीरमदेव के देहावसान के पश्चात् उसका जेष्ठ पुत्र जयमल गद्दी पर बैठा।

गोडवाड़ की गौरव गाथा-७४

जुलाई 16, 2009

मीरां के आराध्य मुरलीधर मंदिर-घाणेराव
डा. भंवरसिंह राठौड़  ‘घाणेराव’ (पाली)

मीरां अपने पितृवंश के कारण ‘मेड़तणी’ रूप में प्रसिद्धि पा ली। मीरा का जन्म समय, मीरा के तत्कालीन मेड़ता सियासत के शासक एवं मेड़तिया शाखा के संस्थापक राव दूदा के चौथे पुत्र रतनसिंह (रतनसी) की संतान थी। कुछ का मत है (इतिहासकार की दृष्टि से) कि मीरां के पिता रतनसिंह राव दूदा के द्वितीय संतान थे। मीरां का जन्म वि.सं. १५५६ वैशाख सुद बीज को रतनसिंह की जागीरी के प्रमुख गांव  बाजोली में हुआ था। अधिकतर विद्वानों ने वि.सं. १५५५ (१४०८ ई.) को मीरां का जन्म स्वीकार किया है। मीरां का विवाह वि.सं. १५७३ में हुआ था। विद्वान हरिनारायण पुरोहित के मतानुसार मीरां के एक भाई (उनके जन्म पूर्व) होने के प्रमाण मिले थे जिसका नाम कहीं गोपाल अन्यत्र दुरजनसाल मिलता है। इस बालक का बाल्यकाल में निधन हो गया था। बाद में मीरां का जन्म हुआ। कुल गुरूओं, राणी मंगा, राव, भाटो, चारणों की बहियों से भी इस तथ्य की सूचना मिलती है।
राव दूदा व परिवार – राव दूदा मीरां के दादा थे। दूदा जोधपुर के शासक राव जोधा (रिडमलोत) के पुत्र थे। माने तो राव जोधा की मीरां प्रपौत्री थी। राव दूदा के पांच पुत्र थे- १. वीरमदेव २.रायमल ३, रायसल ४. रतनसी ५, पिच्यासानी। ये पांचों पुत्र वीर, पितृभक्त, साहसी व स्वाभिमानी थे। कवि ने कहा है-
दुसमण दल देखि सिखे नहीं डारण
रिण गिरमेर उठावे रीठ।
दूदा आधा पग दे जाजे
पाछी फेर न जाणे पीठ।।
सरम कटे सिर देवे सोवत
स्याम धरम भुज लिया सधीर।
वागा ले जोणे वरदाई
वागा घरे न जाणो वीर।।
खाग तणो खाटयो धन खावे
सत्रवां दिये अमावे सूल।
भिडंणा री पौसाल भणीजे
मडणो परे नहीं अै मुल।।
पुत्र भोजराज के बारे में लिखना प्रासंगिक होगा, गौरी हीराचंद ओझा भोजराज को महाराणा संग्रामसिंह का श्रेष्ठ युवराज मानते है तथा उसका जन्म सोलंकी रायमल की पुत्री कुबेरबाई से होना सिद्ध करते है। ओझा ने बडने देवीदान की एकांत व वीरविनोद के आधार पर अपनी यह गाह्यता प्रतिपादित की है। गोपालसिंह मेड़तिया के अनुसार, राव दूदा मारवाड़ नरेश सुप्रसिद्ध अधिपति राव जोधा के चौथे पुत्र थे। इनकी माता जालोर के सोनिगरा चौहानवंशी राजा खीमा सतावत की पुत्री थी। दूदा का जन्म वि.सं. १४९६ आषाढ़ शुक्ला १५ बुधवार को मारवाड़ की प्रांत की तत्कालीन राजधानी मंडोर में हुआ था।
अपना मनोरथ सिद्ध करने के लिए वि.सं. १५१८ (१४१६ ई.) में अपने सहोदर कनिष्ठ भ्राता वरसिंह को साथ लेकर दूदा ने मेड़ता पर आक्रमण किया। मेड़ता उन दिनों मालवे के सुल्तान महमुद के अधिकार में था। मुसलमानों को परास्त कर दूदा जी ने मेड़ते पर अपना आधिपत्य स्थापित किया।
आयु सम्बन्धी भी इतिहासकार मानते है कि वरसिंह, दूदा से बड़े थे। परन्तु जयमल वेश प्रकाश में उन्हें कनिष्ठ लिखा गया है। (क्रमश:)

गोडवाड़ की गौरव गाथा-७३

जुलाई 16, 2009

मीरां के आराध्य मुरलीधरजी मंदिर-घाणेराव
डा. भंवरसिंह राठौड़  ‘घाणेराव’ (पाली)

वर्तमान में कुड़की दुर्ग में राव दूदा के वंशज चांदावत मेड़तिया राठौड़ों का निवास है। मीरांबाई के बड़े पिता वीरमदेव के पुत्र चांदा के वंशज चांदावत मेड़तिया राठौड़ों का निवास है। मीरां के बड़े पिता राव वीरम के पुत्र चांदा के वंशज चांदावत कहलाए। चांदा ने मेड़ता के शत्रु, मारवाड़ के शासक राव मालदेव की सेवा में रहते हुए अपने ही भाई मेड़ता के शासक राव जयमल का विरोध किया था। चांदा अंत में नागौर के सुबायत हुसैन अली के साथ युद्ध करता हुआ मारा गया था। कुड़की इसके वंशजों के पास आज भी है। कुड़की के स्वर्गवासी ठा. जोजावर सिंह और उनके परिवार का मीरांबाई के प्रति अत्यन्त आदर भाव था और वे मीरां से प्रत्येक विरासत को सुरक्षित रखते थे। १९७५ ई. के आस-पास कुड़की गया सो ठा. का देहान्त का सुना था। उनकी (वंश) की गढ़ में एक काली घोड़ी विद्यमान है, जिसका संबंध मीरां बाई से है। मीरांबाई के उपास्यदेव ‘गिरधर नागर’ की जब सवारी निकलती थी तब इस घोड़ी की पूर्व पीढ़ी वाली घोड़ी की पीठ पर निकला करती थी। यह घोड़ी केवल उनकी सवारी के अतिरिक्त वह घोड़ी घुड़साल में ही बंधी रहती थी। उसकी संतान को ना ही बेचना तथा कहीं देने की भी मनाही थी। अचम्भे की बात तो यह थी कि वि.सं. १५७३ पूर्व से लेकर २०२३ तक उस तेजरूप घोड़ी से एक ही घोड़ी जन्म लेती रही जिसका उपयोग उपास्यदेव की सवारी के लिये होता रहा। उस घोड़ी के ‘ठाण’ में एक शिलालेख भी था जिसकी छाप अभी तक मौजूद है।

‘ठीकाणा कुड़की राज मारवाड़’
शपथ :- पुराना शिलालेख में १५७३ का देख कर नया कायम किया गया। तेज रूप घोड़ी की औलाद से मादा जो हो उसको ठीकाणे में ही रखा जावे। ना तो औलाद को दी जावे न बेची जावे। इसके लिये ठा. बहादुरसिंहजी साहब के समय से तलाक दी हुई है। इस शपथ को जो तोड़ेगा वह अपने धरम से विमुख होगा।………मगसद वदि १२ सं. २०२३ जोजावरसिंह।

मीरांबाई का पितृ परिवार
जगत विख्यात सगुण वैष्णव भक्त मीरांबाई तत्कालीन मारवाड़ सियासत अथवा जोधपुर राजा के शासक राव जोधा राठौड़ की परपौत्री, मेड़ता राज्य के संस्थापक नरेश राव दूदा की पौत्री तथा मेवाड़ के सिसोदिया महाराणा सांगा (संगामसिंह) पुत्रवधु, मेवाड़ के ज्येष्ठ राजकुमार भोजराज की पत्नी थी। मीरां को तत्कालीन राजपरिवार की राजकन्या और राजवधू होने का सम्मान प्राप्त था।
मीरांबाई का पितृ परिवार क्षत्रियों में राठौड़ शाखा से संबंधित है। वीरवर राव दूदा एवं वरसिंह ने जिस मेड़ता रियासत की स्थापना की थी, उसकी राजधानी मेड़ता नगर को बनाया और उसी के कारण राव दूदा के वंशज मेड़तिया राठौड़ कहलाने लगे। मेड़तिया राठौड़ों की राजकुमारी होने के कारण ही मीरांबाई को   ‘मीरा मेड़तणी’ भी कहा जाता है। राजस्थान के क्षत्रिय समाज की परम्परा के अनुसार विवाह के पश्चात् भी कन्या अपने पितृ परिवार के वंश से ही संबोधित की जाती है पति के वंश से नहीं। इसी कारण मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश में विवाह होने के बाद भी मीरां अपने पितृवंश मेड़तिया के कारण ‘मेड़तणी’ के रूप में प्रसिद्धि पा ली। (क्रमश:)


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